श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ प्रकरण सुखदुःखविवेक सुखमात्यंतिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतींद्रियम् । * — गीता ६. २१ हमारे शास्त्रकारोंको यह सिद्धान्त मान्य है, कि इस संसारका प्रत्येक मनुष्य सुख- प्राप्तिके लिये या प्राप्त सुखकी वृद्धिके लिये, दुःखको टालने या कम करनेके लिये ही सदैव प्रयत्न किया करता है। भृगुजी भरद्वाजसे शांतिपर्व (मभा. शां. १९०. ९) में कहते हैं, कि “ इह खलु अमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधी- यंते। न ह्यतःपरं त्रिवर्गफलं विशिष्टतरमस्ति।” अर्थात् इस लोक तथा परलोकमें सारी प्रवृत्ति केवल सुखके लिये है; और धर्म, अर्थ, कामका इसके अतिरिक्त कोई अन्य फल नहीं है। परंतु शास्त्रकारोंका कथन है, कि मनुष्य यह न समझकर कि सच्चा सुख किसमें है — मिथ्या सुखहीको सत्य सुख मान बैठता है; और इस आशासे, कि आज नहीं तो कल सुख अवश्य मिलेगा — वह अपनी आयुके दिन व्यतीत किया करता है। अकस्मात, एक दिन मृत्युके झपेटेमें पड़कर वह इस संसारको छोड़कर चल बसता है। परंतु उसके उदाहरणसे अन्य लोक सावधान होनेके बदले उसीका अनुकरण करते हैं। इस प्रकार यह भव-चक्र चलता रहा है, और कोई मनुष्य सच्चे और नित्य सुखका विचार नहीं करता ! इस विषयमें पूर्वी और पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंमें बड़ाही मतभेद है, कि यह संसार केवल दुःखमय है, या सुखप्रधान अथवा दुःखप्रधान है। परंतु इन पक्षवालोंमेंसे सभीको यह बात मान्य है, कि मनुष्यका कल्याण अपने दुःखका अत्यंत निवारण करके अत्यंत सुख-प्राप्ति करनेहीमें है। ‘सुख’ शब्दके बदले प्रायः ‘हित’, ‘श्रेय’ और कल्याण शब्दोंका अधिक उपयोग हुआ करता है। इनका भेद आगे चलकर बतलाया जायगा। यदि यह मान लिया जाय, कि सुख शब्दमेंही सब प्रकारके सुख और कल्याणका समावेश हो जाता है, तो सामान्यतः कहा जा सकता है, कि प्रत्येक मनुष्यका प्रयत्न केवल सुखके लिये हुआ करता है। परंतु इस सिद्धान्तके आधारपर सुख-दुःखका जो लक्षण महाभारतांतर्गत पराशरगीता (मभा. शां. २९५. २७) में दिया गया है, कि “ यदिष्टं तत्सुखं प्राहुः द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते ” — जो कुछ हमें इष्ट है वही सुख है; और जिसका हम द्वेष करते हैं, अर्थात् जो हमें नहीं चाहिये, वही दुःख है — उसे शास्त्रकी दृष्टिसे पूर्ण निर्दोष नहीं कह * “ जो केवल बुद्धिसे ग्राह्य हो और इंद्रियोंसे परे हो, उसे आत्यंतिक सुख कहते हैं।”