श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इंद्रियगम्य बाह्यसुखोंकी अपेक्षा बुद्धिगम्य अंतःसुखकी - अर्थात् आध्या- त्मिक सुखकी - योग्यता अधिक तो हैही; परंतु इसके साथ साथ एक बात यहभी है, कि विषय-सुख अनित्य है। वह दशा नीति-धर्मकी नहीं है। इस बातको सभी मानते हैं, कि अहिंसा, सत्य आदि धर्म कुछ बाहरी उपाधियों अर्थात् बाह्य सुखदुःखों- पर अवलंबित नहीं हैं; किंतु ये सभी अवसरोंके लिये और सब कामोंमें एकसमान उपयोगी हो सकते हैं। अतएव ये नित्य हैं। बाह्य बातोंपर अवलंबित न रहनेवाली, नीति-धर्मोंकी यह नित्यता उनमें कहांसे और कैसे आई - अर्थात् इस नित्यताका कारण क्या है ? इस प्रश्नका आधिभौतिक-वादसे हल होना असंभव है। कारण यह है, कि यदि बाह्यसृष्टिके सुख-दुःखोंके अवलोकनसे कुछ सिद्धान्त निकाला जाय, तो सब सुख-दुःखोंके स्वभावतः अनित्य होनेके कारण, उनके अपूर्ण आधार- पर बने हुए नीति-सिद्धान्तभी वैसेही अनित्य होंगे। और, ऐसी अवस्थामें सुख- दुःखोंकी कुछभी परवाह न करके सत्यके लिये जान दे देनेकी सत्य-धर्मकी जो त्रिकालाबाधित नित्यता है, वह "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख"के तत्त्वसे सिद्ध नहीं हो सकेगी। इसपर यह आक्षेप किया जाता है, कि जब सामान्य व्यवहारोंमें सत्यके लिये प्राण देनेका समय आ जाता है, तो बड़े बड़े लोगभी असत्य पक्ष ग्रहण करनेमें संकोच नहीं करते; और उस समय हमारे शास्त्रकारभी जादा सख्ती नहीं करते; तब सत्य आदि धर्मोंकी नित्यता क्यों माननी चाहिये ? परंतु यह आक्षेप या दलील ठीक नहीं है; क्योंकि जो लोग सत्यके लिये जान देनेका साहस नहीं कर सकते, वेभी अपने मुंहसे इस नीति-धर्मकी नित्यताको मानाही करते हैं। इसी लिये महाभारतमें अर्थ, काम आदि पुरुषार्थोंकी सिद्धि करनेवाले सब व्याव- हारिक धर्मोंका विवेचन करके, अंतमें भारत-सावित्रीमें (और विदुरनीतिमेंभी) व्यासजीने सब लोगोंकों यही उपदेश किया है :- न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नि यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।। अर्थात् “सुख-दुःख अनित्य हैं; परंतु (नीति) धर्म नित्य हैं। इसलिये सुखकी इच्छासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण-संकट आनेपरभी धर्मको कभी नहीं त्यागना चाहिये। यह जीव नित्य है; और सुखदुःख आदि विषय अनित्य हैं।" इसीलिये व्यासजी उपदेश करते हैं, कि अनित्य सुखदुःखोंका विचार न करके नित्य-जीवका संबंध नित्य-धर्मसेही जोड़ देना चाहिये । (महा. स्व. ५. ६; उ. ३९. १२, १३)। यह देखनेके लिये, व्यासजीका उक्त उपदेश उचित है या नहीं, हमें अब इस बातका वचार करना चाहिये, कि सुख-दुःखका यथार्थ स्वरूप क्या है, और नित्य सुख किसे कहते हैं।