श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकते । क्योंकि इस व्याख्याके 'इष्ट' शब्दका अर्थ इष्ट वस्तु या पदार्थभी हो सकता है, और इस अर्थको माननेसे इष्ट पदार्थकोभी सुख कहना पड़ेगा । उदाहरणार्थ, प्यास लगनेपर पानी इष्ट होता है; परंतु इस बाह्य पदार्थ 'पानी' को 'सुख' नहीं कहते । यदि ऐसा होगा, तो नदीके पानीमें डूबनेवालेके बारेमें कहना पड़ेगा, कि वह सुखमें डूबा है । सच बात यह है, कि पानी पीनेसे जो इंद्रियतृप्ति होती है, उसे सुख कहते हैं। इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य इस इंद्रियतृप्ति या सुखको चाहता है; परंतु इससे यह व्यापक सिद्धान्त नहीं बताया जा सकता, कि जिसकी चाह होती है वह सब सुखही है। इसी लिये नैयायिकोंने सुखदुःखको वेदना कह कर उसकी व्याख्या इस तरहसे की है, 'अनुकूलवेदनीयं सुखं' जो वेदना हमारे अनुकूल है, वह सुख है; और 'प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं' जो वेदना हमारे प्रतिकूल है, वह दुःख है । ये वेदनाएँ जन्मसिद्ध अर्थात् मूलहीकी और अनुभवगम्य मात्र हैं। इसलिये नैयायिकोंकी उक्त व्याख्यासे बढ़कर सुखदुःखका अधिक उत्तम लक्षण बतलाया नहीं जा सकता । ये वेदनात्मक सुख-दुःख केवल मनुष्यके व्यापारोंसेही उत्पन्न नहीं होते हैं, तो कभी कभी कुछ देवताओंके कोपसेभी बड़े बड़े रोग और दुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, जिन्हें मनुष्यको अवश्य भोगना पड़ता है। इसीलिये वेदान्त-ग्रंथोंमें सामान्यतः इन सुख- दुःखोंके तीन भेद-आधिदैविक, आधि भौतिक और आध्यात्मिक किये गये हैं। देवता- ओंकी कृपा या कोपसे जो सुख-दुःख मिलते हैं, उन्हें 'आधिदैविक' कहते हैं। बाह्य- सृष्टिके - पृथ्वी आदि पंचमहाभूतात्मक पदार्थोंका मनुष्यकी इंद्रियोंसे संयोग होनेपर - शीतोष्ण आदिके कारण जो सुखदुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, उन्हें 'आधिभौतिक' कहते हैं। और, ऐसे बाह्यसंयोगके बिना उत्पन्न होनेवाले अन्य सब सुखदुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहते हैं। यदि सुख-दुःखका यह वर्गीकरण स्वीकार किया जाय, तो शरीरहीके वात- पित्त आदि दोषोंके परिमाणके बिगड़ जानेसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर आदि दुःखोंको - तथा उन्हीं दोषोंका परिणाम यथोचित रहनेसे अनुभवमें आनेवाले शारीरिक स्वास्थ्यको - आध्यात्मिक सुख-दुःख कहना पड़ता है। क्योंकि, यद्यपि ये सुखदुःख पंचमहाभूतात्मक शरीरसे संबंध रखते हैं - अर्थात् ये शारीरिक हैं - तथापि हमेशा यह नहीं कहा जा सकता, कि ये शरीरसे बाहर रहनेवाले पदार्थोंके संयोगसे पैदा हुए हैं। और इसलिये आध्यात्मिक सुख-दुःखोंके, वेदान्तकी दृष्टिसे फिर भी दो भेद - शारीरिक और मानसिक - करने पड़ते हैं। परंतु इस प्रकार सुख-दुःखोंके 'शारीरिक' और 'मानसिक' दो भेद कर दें, तो फिर आधिदैविक सुख-दुःखोंको भिन्न माननेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। क्योंकि, यह तो स्पष्टही है कि देवताओंकी कृपा अथवा क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले सुख-दुःखोंकोभी आखिर मनुष्य अपनेही शरीर या मनके द्वारा भोगता है। अतएव हमने इस ग्रंथमें वेदान्त-ग्रंथोंकी परिभाषाके अनुसार सुख-दुःखोंका त्रिविध वर्गीकरण नहीं किया है। किंतु उनके दोही वर्ग (बाह्य या शारीरिक और आभ्यन्तर या मानसिक) किये हैं, और इसी