भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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सुखदुःखविवेक ९७ वर्गीकरणके अनुसार, हमने इस ग्रंथमें सब प्रकारके शारीरिक सुख-दुःखोंको 'आधिभौतिक' और सब प्रकारके मानसिक सुख-दुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहा है। वेदान्तग्रंथमें जैसे तीसरा वर्ग 'आधिदैविक' दिया गया है, वैसे हमने नहीं किया है। क्योंकि, हमारे मतानुसार सुख-दुःखोंका शास्त्रीय रीतिसे विवेचन करनेके लिये यह द्विविध वर्गीकरणही अधिक सुभीतेका है। सुखदुःखका जो विवेचन आगे किया गया है, उसे पढ़ते समय यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि वेदान्त-ग्रंथोंके और हमारे वर्गीकरणमें भेद है। सुख-दुःखोंको चाहे आप द्विविध मानिये अथवा त्रिविध, इसमें संदेह नहीं, कि दुःखकी चाह किसीभी मनुष्यको नहीं होती। इसीलिये वेदान्त और सांख्यशास्त्र (सां. का. १; गीता ६. २१, २२) में कहा गया है, कि सब प्रकारके दुःखोंकी अत्यंत निवृत्ति करना और आत्यंतिक तथा नित्य सुखकी प्राप्ति करनाही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। जब यह बात निश्चित हो चुकी, कि मनुष्यका परम साध्य या उद्देश्य आत्यंतिक सुखही है, तब ये प्रश्न मनमें सहजही उत्पन्न होते हैं, कि अत्यंत सत्य और नित्य सुख किसको कहना चाहिये ? उसकी प्राप्ति होना संभव है या नहीं ? यदि संभव है तो कब और कैसे ? इत्यादि। और जब हम इन प्रश्नोंपर विचार करने लगते हैं, तब सबसे पहले यही प्रश्न उठता है, कि नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणके अनुसार सुख और दुःख दोनों भिन्न भिन्न स्वतंत्र वेदनाएँ, "अनुभव या वस्तुएँ हैं" अथवा "जो उजेला नहीं वह अँधेरा" इस न्यायके अनुसार इन दोनों वेदनाओं- मेंसे एकका अभाव होनेपर दूसरी संज्ञाका उपयोग किया जाता है। भर्तृहरिने कहा है, कि "प्याससे जब मुँह सूख जाता है, तब हम उस दुःखका निवारण करनेके लिये पानी पीते हैं। भूखसे जब हम व्याकुल हो जाते हैं, तब मिष्टान्न खाकर उस व्यथाको हटाते हैं; और काम-वासनाके प्रदीप्त होनेपर उसको स्त्रीसंग द्वारा तृप्त करते हैं। इतना कहकर अंतमें कहा है कि :- प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः । "किसी व्याधि अथवा दुःखके उत्पन्न होनेपर उसका जो निवारण या प्रतिकार किया जाता है, उसीको लोक भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं।" दुःखनिवारणके अतिरिक्त 'सुख' कोई भिन्न वस्तु नहीं है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उक्त सिद्धान्त मनुष्योंके सिर्फ़ उन्हीं व्यवहारोंके विषयमें उपयुक्त होता है, जो स्वार्थहीके लिये किये जाते हैं। पिछले प्रकरणमें आनंदगिरिका यह मत बतलायाही गया है, कि जब हम किसीपर कुछ उपकार करते हैं, तब उसका कारण यही होता है, कि उसके दुःखको देखनेसे हमारी कारुण्यवृत्ति हमारे लिये असह्य हो जाती है; और इस दुःसहत्वकी व्यथाको दूर करनेके लियेही हम परोपकार किया करते हैं। इस पक्षके स्वीकृत करनेपर हमें महाभारतके अनुसार यह मानना पड़ेगा कि :- गी. र. ७