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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

आधिभौतिक सुखवाद ८५

है, तो वही दूसरेको दुःखदायक हो जाती है। परंतु जैसे घुग्घूको प्रकाश नापसंद होनेके कारण कोई प्रकाशहीको त्याज्य नहीं कहता, उसी तरह यदि किसी विशिष्ट संप्रदायको कोई बात लाभदायक मालूम न हो तो कर्मयोगशास्त्रमेभी यह नहीं कहा जा सकता, कि वह सभी लोगोंको हितावह नहीं है। और, इसी लिये “सब लोगोंका सुख” इन शब्दोंका अर्थभी “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” करना पड़ता है। इस पंथके मतका सारांश यह है, कि “जिसमें, अधिकांश लोगोंका अधिक सुख हो, उसी बातको नीतिकी दृष्टिसे उचित और ग्राह्य मानना चाहिये, और उसी प्रकारका आचरण करना इस संसारमें मनुष्यका सच्चा कर्तव्य है।” आधिभौतिक सुखवादियोंका उक्त तत्त्व आध्यात्मिक पंथको मंजूर है। यदि यह कहा जाय तोभी कोई आपत्ति नहीं कि आध्यात्मिकवादियोंनेही इस तत्त्वको अत्यंत प्राचीन कालमें ढूंढ निकाला था। और भेद इतनाही है, कि अब आधिभौतिकवा- दियोंने उसका एक विशिष्ट रीतिसे उपयोग किया है। तुकाराममहाराजने कहा है, कि “संतजनोंकी विभूतियाँ केवल जगतके कल्याणके लिये हैं - वे लोग परोपकार करनेमें अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।” अर्थात् इस तत्त्वकी सच्चाई और योग्यताके विषयमें कुछभी संदेह नहीं है। स्वयं श्रीमद्भगवद्गीतामेंभी, पूर्ण योगयुक्त अर्थात् कर्मयोगयुक्त ज्ञानी पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करते हुए, यह बात दो बार स्पष्ट कही गई है, कि वे लोग ‘सर्वभूतहिते रताः’ अर्थात् सब प्राणियोंका कल्याण करनेहीमें निमग्न रहा करते हैं (गी. ५. २५; १२. ४)। इस बातका पता दूसरे प्रकरणमें दिये हुए महाभारतके “यद्भूतहितमत्यंतं तत् सत्यमिति धारणा” वचनसे स्पष्टतया चलता है, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये हमारे शास्त्रकार इस तत्त्वको हमेशा ध्यानमें रखते थे। परंतु हमारे शास्त्रकारोंके कथनानुसार ‘सर्वभूतहित’ को ज्ञानी पुरुषोंके आचरणका बाह्य लक्षण समझ कर धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके किसी विशेष प्रसंगपर स्थूलमानसे उस तत्त्वका उपयोग करना एक बात है, और उसीको नीतिमत्ताका सर्वस्व मान कर - दूसरी किसी बातका विचार न करके - केवल इसी नींव पर नीतिशास्त्रका भव्य भवन निर्माण करना दूसरी बात है। इन दोनोंमें बहुत भिन्नता है। आधिभौतिक पंडित दूसरे मार्गको स्वीकार करके प्रतिपादन करते हैं, कि नीतिशास्त्रका अध्यात्मविद्यामें कुछभी संबंध नहीं है। इसलिये अब यह देखना चाहिये, कि उनका कहना कहाँ तक युक्तिसंगत है। 'सुख' और 'हित' दोनों शब्दोंके अर्थमें बहुत भेद है। परंतु यदि इस भेदपर ध्यान न दें; और 'सर्वभूतहितका अर्थ 'अधिकांश लोगोंका अधिक सुख' मान लें, और कार्य-अकार्य-निर्णयके काममें केवल इसी तत्त्वका उपयोग करें; तो यह साफ़ दीख पड़ेगा कि बड़ी बड़ी अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। मान लीजिये, कि इस तत्त्वका कोई आधिभौतिक पंडित अर्जुनको उपदेश देने लगता, तो वह अर्जुनसे क्या कहता? यही न; कि यदि युद्धमें जय मिलनेपर अधिकांश

लोगोंका अधिक सुख होना संभव है तो भीष्म पितामहकोभी मारकर युद्ध करना तेरा कर्तव्य है। दीखनेमें तो यह उपदेश बहुत सीधा और सहज दीख पडता है; परंतु कुछ विचार करनेपर इसकी अपूर्णता और कठिनाई समझमें आ जाती है। पहले यही सोचिये, कि अधिक यानी कितना? पांडवोंकी सात अक्षौहिणियाँ थीं और कौरवोंकी ग्यारह। इसलिये यदि पांडवोंकी हार हुई होती तो कौरवोंको सुख हुआ होता। क्या, इसी युक्तिवादसे पांडवोंका पक्ष अन्याय्य कहा जाता? भारतीय युद्धहीकी बात कौन कहे; औरभी अनेक अवसर ऐसे हैं कि जहाँ नीतिका निर्णय केवल संख्यासे कर बैठना बडी भारी भूल हैं। व्यवहारमें सब लोग यही समझते हैं कि लाखों दुर्जनोंको सुख होनेकी अपेक्षा एकही सज्जनको जिससे सुख हो, वही सच्चा सत्कार्य है। इस समझको सच बतलानेके लिये एकही सज्जनके सुखको लाख दुर्जनोंके सुखकी अपेक्षा अधिक मूल्यवान् मानना पडेगा; और ऐसा करनेपर "अधिकांश लोगोंका अधिक बाह्य" मुखवाला (जो कि नीतिमत्ताकी परीक्षाका एकमात्र साधन माना गया है) सिद्धान्त उतनाही शिथिल हो जायगा। इसलिये कहना पड़ता है कि, लोकसंख्याकी न्यूनाधिकताका नीतिमत्ताके साथ कोई नित्य-संबंध नहीं हो सकता। यह बातभी ध्यानमें रखनेयोग्य है, कि कभी जो बात साधारण लोगोंको सुखदायक मालूम होती है, वही बात किसी दूरदर्शी पुरुषको परिणाममें सबके लिये हानिप्रद दीख पड़ती है। उदाहरणार्थ, साक्रेटीज और ईसामसीहकोही लीजिये। दोनों अपने अपने मतसे परिणाममें कल्याणकारक समझ करही अपने देशबंधुओंको उपदेश करते थे; परंतु इनके देशबंधुओंने इन्हें “समाजके शत्रु” समझकर मौतकी सजा दी। इस विषयमें "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इसी तत्त्वके अनुसार उस समय लोगोंने और उनके नेताओने मिल कर आचरण किया था; परंतु अब हम नहीं कह सकते कि उन लोगोंका बर्ताव न्याययुक्त था। सारांश, यदि “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख” को ही क्षणभरके लिये नीतिका मूलतत्त्व मान लें, तोभी उससे ये प्रश्न हल नहीं हो सकते, कि लाखों-करोडों मनुष्योंका सुख किसमें है; उसका निर्णय कौन और कैसे करे? साधारण अवसरोंपर निर्णय करनेका यह काम उन्हीं लोगोंको सौंप दिया जा सकता है, कि जिनके बारेमें सुख-दुःखका प्रश्न उपस्थित हो। परंतु साधारण अवसरपर इतना प्रयत्न करनेकी कोई आवश्यकताही नहीं रहती। और जब विशेष कठिनाईका कोई समय आता है, तब साधारण मनुष्योंमें यह अचूक विचार-शक्ति नहीं रहती, कि हमारा सुख किस बातमें है। ऐसी अवस्थामें यदि इन साधारण और अनधिकारी लोगोंके हाथ यह नीतिका एकमेव तत्त्व “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” लग जाय, तो वही भयानक परिणाम होगा; जो सैतानके हाथमें मशाल देनेसे होता है। यह बात उक्त दोनों उदाहरणों (साक्रेटीज और ईसामसीह) से भली भाँति प्रकट हो जाती है। इस उत्तरमें कुछ जान नहीं, कि “नीतिधर्मका

आधिभौतिक सुखवाद ८७ हमारा तत्त्व शुद्ध और सच्चा है; मूर्ख लोगोंने उसका दुरुपयोग किया तो हम क्या कर सकते हैं?" कारण यह है, कि यद्यपि तत्त्व शुद्ध और सच्चा हो, तथापि उसका उपयोग करनेके अधिकारी कौन हैं, वे उसका उपयोग कब और कैसे करते हैं, इत्यादि बातोंकी मर्यादाभी, उसी तत्त्वके साथ देनी चाहिये। नहीं तो संभव है, कि हम अपनेको साक्रेटीजके सदृश्य नीति-निर्णय करनेमें समर्थ मानकर अर्थका अनर्थ कर बैठें। केवल संख्याकी दृष्टिसे नीतिका उचित निर्णय नहीं हो सकता; और इस तर्कका निश्चय करनेके लिये कोईभी बाहरी साधन नहीं कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है। इन दो आक्षेपोंके सिवा इस पंथपर औरभी बड़े बड़े आक्षेप किये जा सकते हैं। जैसे, विचार करनेपर यह अपने आप ही मालूम हो जायगा, कि किसी कामके केवल बाहरी परिणामसेही उसके न्याय्य अथवा अन्याय्य होनेका निर्णय करना बहुधा असंभव हो जाता है। हम लोग किसी घड़ीको, उसके ठीक ठीक समय बतलाने न बतलाने पर, अच्छी या खराब कहा करते हैं। परंतु इसी नीतिका उपयोग मनुष्यके कार्योंके संबंधमें करनेके पहले हमें यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि मनुष्य केवल घड़ी या यंत्र नहीं है। यह बात सच है, कि सब सत्पुरुष जगत्के कल्याणार्थ प्रयत्न किया करते हैं। परंतु इससे यह उलटा अनुमान निश्चयपूर्वक नहीं किया जा सकता, कि जोभी कोई लोगोंके कल्याणार्थ प्रयत्न करता है, उसे सत्पुरुषही होना चाहिये। इसलिये यह देखना चाहिये, कि मनुष्यका अंतः- करण कैसा है। यंत्र और मनुष्यमें यदि कुछ भेद है तो यही, कि एक हृदयहीन है, और दूसरा हृदययुक्त है; और इसीलिये अज्ञानसे या भूलसे किये गये अपराधको कायदेमें क्षम्य मानते हैं। तात्पर्य, कोई काम अच्छा है या बुरा, धर्म्य है या अधर्म्य, नीतिका है अथवा अनीति का, इत्यादि बातोंका सच्चा निर्णय उस कामके केवल बाहरी फल या परिणाम - अर्थात् वह अधिकांश लोगोंको अधिक सुख देगा कि नहीं इतनेही - से नहीं किया जा सकता। उसीके साथ साथ यहभी जानना चाहिये, कि उस कामको करनेवालेकी बुद्धि, वासना या हेतु कैसा है। एक समयकी बात है, कि अमरीकाके एक बड़े शहरमें सब लोगोंके सुख और उपयोगके लिये ट्रामवेकी बहुत आवश्यकता थी। परंतु सरकारी अधिकारियोंकी आज्ञा पाये बिना ट्रामवे नहीं बनाई जा सकती थी। सरकारी मंजूरी मिलनेमें बहुत देरी हुई। तब ट्रामवेके व्यवस्थापकने अधिकारियोंको रिश्वत देकर जल्द मंजूरी ले ली। ट्रामवे बन गई और उससे शहरके सब लोगोंकी सुभीता और फ़ायदा हुआ। कुछ दिनोंके बाद रिश्वतकी बात प्रकट हो गई; और उस व्यवस्थापकपर फ़ौजदारी मुकदमा चलाया गया। पहली ज्यूरी (पंचायत) का एकमत नहीं हुआ; इसलिये दूसरी ज्यूरी चुनी गई। दूसरी जूरीने व्यवस्थापकको दोषी ठहराया। अतएव उसे सज़ा दी गई। इस उदाहरणमें "अधिक लोगोंके अधिक सुख" वाले नीतितत्त्वसे काम

८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चलने का नहीं। क्योंकि यद्यपि "घूस देनेसे ट्रामवे बन गई" यह बाहरी परिणाम अधिक सुखदायक था; तथापि इतनेहीसे घूस देना न्या य हो नहीं सकता।* दान करनेको अपना धर्म (दातव्य) समझ कर निष्काम-बुद्धिसे दान करना, और कीर्तिके लिये या अन्य फलकी आशासे दान करना, इन दो कृत्योंका बाहरी परिणाम यद्यपि एक-सा हो, तथापि श्रीमद्भगवद्गीतामें पहले दानको सात्त्विक और दूसरेको राजस कहा है (गीता १७. २०, २१)। और यहभी कहा गया है, कि यदि वही दान कुपात्रोंको दिया जाय, तो वह तामस अथवा गर्ह्य है। यदि किसी गरीबने एक- आध धर्म-कार्यके लिये चार पैसे दिये और किसी अमीरने उसीके लिये सौ रुपये दिये, तो लोगोंमें दोनोंकी नैतिक योग्यता एकही समझी जाती है। परंतु यदि केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" किसमें है, इसी बाहरी साधनद्वारा विचार किया जाय तो ये दोनों दान नैतिक दृष्टिसे समान योग्यताके नहीं कहे जा सकते। "अधि- कांश लोगोंका अधिक सुख" इस आधिभौतिक नीति-तत्त्वमें जो बहुत बड़ा दोष है, वह यही है, कि इसमें कर्ताके मनके हेतु या भावका कुछभी विचार नहीं किया जाता। और यदि अंतःस्थ हेतुपर ध्यान दें, तो इस प्रतिज्ञासे विरोध खड़ा हो जाता है, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुखही नीतिमत्ताकी एकमात्र कसौटी है। कायदा- कानून बनानेवाली सभा अनेक व्यक्तियोंके समूहसे बनी होती है। इसलिये उक्त मतके अनुसार इस सभाके बनाये हुए कायदों या नियमोंकी योग्यता-अयोग्यता पर विचार करते समय यह जाननेकी कुछ आवश्यकताही नहीं, कि सभासदोंके अंतः- करणोंमें कैसा भाव था - हम लोगोंको अपना निर्णय केवल इस बाहरी विचारके आधारपर कर लेना चाहिये, कि इनके कायदोंसे अधिकोंको अधिक सुख हो सकेगा या नहीं। परंतु, उक्त उदाहरणसे यह साफ़ साफ़ ध्यानमें आ सकता है, कि सभी स्थानोंमें यह न्याय उपयुक्त हो नहीं सकता। हमारा यह कहना नहीं है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख या हित" वाला तत्त्व बिलकुलही निरुपयोगी है। केवल बाह्य परिणामोंका विचार करना होता तो उससे बढ़कर दूसरा तत्त्व कहीं नहीं मिलेगा। परंतु हमारा यह कथन है, कि जब नीतिकी दृष्टिसे किसी बातको न्याय्य अथवा अन्याय्य कहना हो, तब केवल बाह्य परिणामोंको देखनेसे काम नहीं चल सकता। उसके लिये औरभी कई बातोंपर विचार करना पड़ता है। अतएव नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये पूर्णतया इसी तत्त्वपर अवलंबित नहीं रह सकते। इसलिये इससेभी अधिक निश्चित और निर्दोष तत्त्वको खोज निकालना आवश्यक है। गीताके प्रारंभमें जो यह कहा गया है, कि "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है।" (गीता २. ४९) उसकाभी यही अभिप्राय है। यदि केवल बाह्य

  • यह उदाहरण डॉक्टर पॉल केरसकी The Ethical Problem (pp. 58, 59, 2nd Ed.) नामक पुस्तकसे लिया है।

कर्मोंपर ध्यान दें, तो वे बहुधा भ्रामक होते हैं। "स्नान-संध्या, तिलक-माला" इत्यादि बाह्य कर्मोंके होते हुएभी 'पेटमें क्रोधाग्नि'का भड़कते रहना असंभव नहीं है, परंतु यदि हृदयका भाव शुद्ध हो, तो बाह्यकर्मोंका महत्त्व नहीं रहता।" "सुदामाके मुट्ठीभर चावल" सरीखे अत्यंत अल्पबाह्य कर्मकी धार्मिक और नैतिक योग्यता, अधिकांश लोगोंको अधिक सुख देनेवाले हजारों मन अनाजके बरा- बरही समझी जाती है। इसी लिये प्रसिद्ध जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने * कर्मके बाह्य और दृश्य परिणामोंके तारतम्य-विचारको गौण माना है। एवं नीतिशास्त्रके अपने विवेचनका प्रारंभकर्ताकी शुद्ध बुद्धि (शुद्ध भाव) हीसे किया है। यह नहीं समझना चाहिये, कि आधिभौतिक सुखवादकी यह न्यूनता बड़े बड़े आधिभौतिकवादियोंके ध्यानमें नहीं आई। ह्यूमने † स्पष्ट लिखा है - जब कि मनुष्यका कर्म (काम या कार्य) ही उसके शीलका द्योतक है, और जब लोगोंमें वही नीतिमत्ताका दर्शक भी माना जाता है, तब केवल बाह्य परिणामोंहीसे उस कर्मको प्रशंसनीय या गर्हणीय मान लेना असंभव है। यह बात मिल साहबको भी मान्य है, कि "किसी कर्मकी नीतिमत्ता कर्ताके हेतुपर अर्थात् वह उसे जिस बुद्धि या भावसे करता है, उसपर पूर्णतया अवलंबित रहती है!" परंतु अपने पक्षमंडनके लिये मिलसाहबने यह युक्तिवाद किया है, कि "जबतक बाह्य कर्मोंमें कोई भेद नहीं होता तबतक कर्मकी नीतिमत्तामें कुछ फ़र्क नहीं हो सकता, चाहे कर्ताके मनमें उस कामको करनेकी वासना किसी भावसे हुई हो।" § मिलके इस युक्तिवादमें सांप्रदायिक आग्रह दीख पड़ता है; क्योंकि बुद्धि या भावमें भिन्नता होनेपर यद्यपि दो कर्म दीखनेमें एकहीसे हों, तोभी वे तत्त्वतः एक योग्यताके कभी नहीं हो सकते। और इसी लिये मिलसाहबकी कही हुई 'जब तक (बाह्य) कर्मोंमें भेद नहीं होता, इत्यादि' मर्यादाको ग्रीनसाहब ‡ निर्मूल बतलाते हैं। गीताकाभी यही अभिप्राय है। इसका

  • Kant's Theory of Ethics, (trans. by Abbott) 6th Ed. p. 6. † "For as actions are objects of our moral sentiment, so far only as they are indications of the internal character, passions and affections, it is impossible that they can give rise either to praise or blame, where they proceed not from these principles, but are derived altogether from external objects." Hume's Inquiry concerning Human Understanding, Section VIII, part II (p. 368 of Hume's Eassys - The World Library Edition). § "Morality of the action depends entirely upon the intention, that is, upon what the agent wills to do, But the motive, that is, the feeling which makes him will so to do, when makes no difference in the act, makes none in the morality." Mill's Utilitarianism, p. 27. ‡ Green's Prolegomena to Ethics § 292 note p. 348. 5th Chea- per Edition.

९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण गीतामें यह बतलाया गया है, कि यदि एकही धर्म-कार्यके लिये दो मनुष्य समान धन प्रदान करें, तोभी अर्थात् दोनोंके बाह्य कर्म एकसमान होनेपरभी, दोनोंकी बुद्धि या भावकी भिन्नताके कारण एक दान सात्त्विक और दूसरा राजस या तामसभी हो सकता है। इस विषयपर अधिक विचार पूर्वी और पश्चिमी मतोंकी तुलना करते समय करेंगे। अभी केवल इतनाही देखना है, कि कर्मके केवल बाहरी परिणामपरही अवलंबित रहनेवाली आधिभौतिक सुखवादकी श्रेष्ठ श्रेणीभी नीति- निर्णयके काममें कैसे अपूर्ण सिद्ध हो जाती है; और इसे सिद्ध करनेके लिये हमारी समझमें मिलसाहबकी उक्त स्वीकृति काफ़ी है। “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” वाले आधिभौतिक पंथमें सबसे भारी दोष यह है, कि उसमें कर्ताकी बुद्धि या भावका कुछभी विचार नहीं किया जाता। मिलसाहबके लेखहीसे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि उस (मिल) के युक्ति- वादको सच मानकरभी इस तत्त्वका उपयोग सब स्थानोंपर एकसमान नहीं किया जा सकता। क्यों कि वह केवल बाह्य फलके अनुसार नीतिका निर्णय करता है, अर्थात् उसका उपयोग किसी विशेष मर्यादाके भीतरही किया जा सकता है; या यों कहिये कि वह एकदेशीय है। इसके सिवा इस मतपर एक औरभी आक्षेप किया जा सकता है, कि स्वार्थकी अपेक्षा परार्थ क्यों और कैसे श्रेष्ठ है? – इस प्रश्नकी कुछ भी उपपत्ति न बतलाकर ये लोग इस तत्त्वको सच मान लिया करते हैं। फल यह यह होता है, कि बुद्धिमान स्वार्थकी बेरोक वृद्धि होने लगती है। यदि स्वार्थ और परार्थ ये दोनों बातें मनुष्यके जन्मसेही विद्यमान रहती हैं, अर्थात् स्वाभाविक हैं; तो प्रश्न होता है, कि मैं स्वार्थकी अपेक्षा लोगोंके सुखको अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों समझूं? यह उत्तर तो संतोषदायक होही नहीं सकता, कि तुम अधिकांश लोगोंके अधिक सुखको देखकर ऐसा करो। क्यों कि मूल प्रश्नही यह है, कि मैं अधिकांश लोगोंके अधिक सुखके लिये यत्न क्यों करूं? यह बात सच है, कि अन्य लोगोंके हितमें अपनाभी हित सम्मिलित रहता है, इस लिये यह प्रश्न, हमेशा नहीं उठता। परंतु आधिभौतिक पंथके उक्त तीसरे वर्गकी अपेक्षा इस अंतिम (चौथे) वर्गकी यही विशेषता है, कि इस आधिभौतिक पंथके लोग यह मानते हैं, कि जब स्वार्थ और परार्थमें विरोध खड़ा हो जाय, तब बुद्धिमान स्वार्थका त्याग करके परार्थ-साधन- हीके लिये यत्न करना चाहिये। इस पंथकी उक्त विशेषताकी कुछभी उपपत्ति नहीं दी गई है। इस अभावकी ओर एक विद्वान् आधिभौतिक पंडितका ध्यान आकर्षित हुआ। उसने छोटे कीड़ोंसे लेकर मनुष्यतक सब सजीव प्राणियोंके व्यवहारोंका खूब निरीक्षण किया; और अंतमें यह सिद्धान्त निकाला, कि जब कि छोटे कीड़ोंसे लेकर मनुष्यों तकमें यही गुण अधिकाधिक बढ़ता और प्रकट होता चला आ रहा है, कि वे स्वयं अपनेही समान अपनी संतानों और जातियोंकी रक्षा करते हैं; और किसीको दुःख न देते हुए अपने बंधुओंकी यथासंभव सहायता

करते हैं; तब हम कह सकते हैं, कि सजीव सृष्टिके आचरणका यही परस्पर-सहा- यताका गुण - प्रधान नियम है। सजीव सृष्टिमें यह नियम पहले पहल संतानोत्पादन और संतानके लालन-पालनके बारेमें दीख पड़ता है। ऐसे अत्यंत सूक्ष्म कीड़ोंकी सृष्टिको देखनेसे - कि जिसमें स्त्री-पुरुषका कुछ भेद नहीं है - ज्ञात होगा कि एक कीड़ेकी देह बढ़ते बढ़ते फट जाती है; और उससे दो कीड़े बन जाते हैं। अर्थात् यही कहना पड़ेगा कि संतानके लिये - दूसरेके लिये - यह कीड़ा अपने शरीरकोभी त्याग देता है। इसी तरह सजीव सृष्टिमें इस कीड़ेसे ऊपरके दर्जेके स्त्री-पुरुषात्मक प्राणीभी अपनी अपनी संतानके पालन-पोषणके लिये स्वार्थत्याग करनेमें आनंदित हुआ करते हैं। यही गुण बढ़ते बढ़ते मनुष्य जातिके असभ्य और जंगली समाजमेंभी इस रूपमें पाया जाता है, कि वे लोग न केवल अपनी संतानोंकी रक्षा करनेमें - वरन अपने जाति-भाइयोंकी सहायता करनेमेंभी सुखसे प्रवृत्त हो जाते हैं। इसलिये मनुष्यको - जो कि सजीव सृष्टिका शिरोमणि है - स्वार्थके समान परार्थमेंभी सुख मानते हुए सृष्टिके उपर्युक्त नियमकी उन्नति करने तथा स्वार्थ और परार्थके वर्तमान विरोधको समूल नष्ट करनेके उद्योगमें लगे रहना चाहिये। बस इसीमें उसकी इतिकर्तव्यता है।* यह युक्तिवाद तो ठीक है; परंतु यह तत्त्व कुछ नया नहीं है, कि परोपकार करनेका सद्गुण मूक सृष्टिमेंभी पाया जाता है, इसलिये उसे परमावधि तक पहुँचानेके प्रयत्नमें ज्ञानी मनुष्योंको सदैव लगे रहना चाहिये। इस तत्त्वमें विशेषता सिर्फ यही है, कि आजकल आधिभौतिक शास्त्रोंके ज्ञानकी बहुत वृद्धि होनेके कारण इस तत्त्वकी आधिभौतिक उपपत्ति उत्तम रीतिसे बतलाई गई है। यद्यपि हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टि आध्यात्मिक है, तथापि हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें कहा है कि :- अष्टादशपुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ “ परोपकार करना पुण्यकर्म है और दूसरोंको पीडा देना पापकर्म है। वह यही अठा- रह पुराणोंका सार है।” भर्तृहरिनेभी कहा है, कि “ स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः ” - परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है। अच्छा, अब यदि छोटे कीड़ोंसे मनुष्यतककी सृष्टिकी उत्तरोत्तर क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंको देखें, तो एक और भी प्रश्न उठता है। वह यह है - क्या, मनुष्योंमें केवल परोपकारबुद्धिहीका उत्कर्ष हुआ है, या उसीके


  • यह उपपत्ति स्पेन्सरके Data of Ethics नामक ग्रंथमें दी हुई है। स्पेन्सरने मिलको एक पत्र लिखकर स्पष्ट कह दिया था, कि मेरे और आपके मतमें क्या भेद है। उस पत्रके अवतरण उक्त ग्रंथमें दिये गये हैं। pp. 57, 123. Also see Bain's Mental and Moral Science, pp. 721, 722 (Ed. 1875.)

९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र साथ उनमें न्याय-बुद्धि, दया, समानपन, दूरदृष्टि, तर्क, शूरता, धृति, क्षमा, इंद्रिय- निग्रह इत्यादि अनेक अन्य सात्त्विक सद्गुणोंकीभी वृद्धि हुई है ? जब इसपर विचार किया जाता है, तब कहना पड़ता है, कि अन्य सब सजीव प्राणियोंकी अपेक्षा मनुष्योंमें सभी सद्गुणोंका उत्कर्ष हुआ है। इन सब सात्त्विक गुणोंके समूहको 'मनुष्यत्व' नाम दीजिये। अब यह बात सिद्ध हो चुकी है, कि परोपकारकी अपेक्षा मनुष्यत्वको हम श्रेष्ठ मानते हैं। ऐसी अवस्थामें किसीभी कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचार या नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये उस कर्मकी परीक्षा केवल परोपकारहीकी दृष्टिसे नहीं की जा सकती - अब उस कर्मकी परीक्षा मनुष्यत्वकी दृष्टिसे - अर्थात् मनुष्यजातिमें अन्य प्राणियोंकी अपेक्षा जिन जिन गुणोंका उत्कर्ष हुआ है, उन सबको ध्यान रखकरही - की जानी चाहिये। अकेले परोपकारको ध्यानमें रखकर कुछ-न-कुछ निर्णय कर लेनेके बदले अब तो यही मानना पड़ेगा, कि जो कर्म सब मनुष्योंके 'मनुष्यत्व' या 'मनुष्यपन'को शोभा दें, या जिस कर्मसे 'मनुष्यत्व'की वृद्धि हो, वही सत्कर्म और वही नीति-धर्म है। यदि एक बार इस व्यापक दृष्टिको स्वीकार कर लिया जाय, तो "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" उक्त दृष्टिका एक अत्यंत छोटा भाग हो जायगा और इस मतका कोई स्वतंत्र महत्त्व नहीं रह जायगा, कि सब कर्मोंके धर्म-अधर्म या नीतिमत्ताका विचार केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" तत्त्वके अनुसार किया जाना चाहिये - और तब तो धर्म- अधर्मका निर्णय करनेके लिये मनुष्यत्वकाभी विचार करना आवश्यक होगा। और जब हम इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगेंगे, कि 'मनुष्यपन' या मनुष्य- त्वका यथार्थ स्वरूप क्या है, तब हमारे मनमें याज्ञवल्क्यके अनुसार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" यह विषय आप-ही-आप उपस्थित हो जायगा। नीतिशास्त्रका विवेचन करनेवाले एक अमेरिकन ग्रंथकारने इस समुच्चयात्मक मनुष्यत्वके धर्मकोही 'आत्मा' कहा है। उपर्युक्त विवेचनसे यह मालूम हो जायगा, कि केवल स्वार्थ या अपनेही विषय-सुखकी कनिष्ठ श्रेणीसे बढ़ते बढ़ते आधिभौतिक सुखवादियोंकोभी परोप- कारकी श्रेणी तक और अंतमें मनुष्यत्वकी श्रेणीतक कैसे आना पड़ता है। परंतु मनुष्यत्वके विषयमेंभी और आधिभौतिकवादियोंके मनमें प्रायः सब लोगोंके बाह्य विषय-सुखहीकी कल्पना प्रधान होती है, अतएव आधिभौतिकवादियोंकी यह अंतिम श्रेणीभी जिसमें - अंतःशुद्धि, और अंतःसुखका कुछ विचार नहीं किया जाता - हमारे अध्यात्मवादी शास्त्रकारोंके मतानुसार निर्दोष नहीं है। यद्यपि इस बातको साधारण- तया मानभी लें, कि मनुष्यके सब प्रयत्न सुख-प्राप्तिके तथा दुःख-निवारणकेही लिये हुआ करते हैं; तथापि जबतक पहलें इस बातका निर्णय न हो जाय, कि सच्चा सुख किसमें है - आधिभौतिक अर्थात् सांसारिक विषयभोगोंमें है, अथवा और किसीमें बात है - तबतक कोईभी आधिभौतिक पक्ष ग्राह्य नहीं समझा जा सकता।

आधिभौतिक सुखवाद ९३ इस बातको आधिभौतिक सुखवादीभी मानते हैं, कि शारीरिक सुखसे मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है। पशुको जितने सुख मिल सकते हैं, वे सब किसी मनुष्यको देकर उससे पूछो कि “क्या, तुम पशु होना चाहते हो ?” तो वह कभी इस बातके लिये राजी न होगा। इसी तरह, ज्ञानी पुरुषोंको यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि तत्त्वज्ञानके गहन विचारोंसे बुद्धिमें जो एक प्रकारकी शांति उत्पन्न होती है, उसकी योग्यता सांसारिक संपत्ति अथवा बाह्योपभोगसे हज़ार गुना बढ़ कर है। अच्छा, यदि लोकमतको देखें, तोभी यही ज्ञात होगा, की नीतिका निर्णय करना केवल संख्यापर अवलंबित नहीं है। लोग जो कुछ किया करते हैं, वह सब केवल आधिभौतिक सुखकेही लिये नहीं किया करते - वे आधिभौतिक सुखहीको अपना परम उद्देश्य नहीं मानते । बल्कि हम लोग यही कहा करते हैं, कि बाह्य सुखोंकी कौन कहे, विशेष प्रसंग आनेपर अपनी जानकीभी परवाह नहीं करनी चाहिये । क्योंकि ऐसे समयमें आध्यात्मिक दृष्टिके अनुसार जिन सत्य आदि नीति-धर्मोंकी योग्यता अपनी जानसेभी अधिक है, उनका पालन करनेके लिये मनोनिग्रह करनेमेंही मनुष्यका मनुष्यत्व है। यही हाल अर्जुनका था। उसकाभी प्रश्न यह नहीं था, कि लड़ाई करनेपर किसको कितना सुख होगा। उसका श्रीकृष्णसे यही प्रश्न था, कि “मेरा, अर्थात् मेरे आत्माका श्रेय किसमें है सो मुझे बतलाइये” (गीता. २.७; ३.२) आत्माका यह नित्यका श्रेय और सुख आत्माकी शांतिमें है। इसी लिये बृहदारण्य- कोपनिषद् (बृ. २. ४. २) में कहा गया है, कि “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन” अर्थात् सांसारिक सुखसंपत्तिके यथेष्ट मिल जानेपरभी आत्मसुख और शांति नहीं मिल सकती । इसी तरह कठोपनिषद्‌में लिखा है, कि जब मृत्यु नचिकेताको पुत्र, पौत्र, पशु, धान्य, द्रव्य इत्यादि अनेक प्रकारकी सांसारिक संपत्ति देने सिद्ध हुआ तो उसने साफ़ जवाब दिया, कि “मुझे आत्मविद्या चाहिये, संपत्ति नहीं।” और 'प्रेय' अर्थात् इंद्रियोंको प्रिय लगनेवाले सांसारिक सुखमें तथा 'श्रेय' अर्थात् आत्माके सच्चे कल्याणमें भेद दिखलाते हुए (कठ. १. २. २ में) कहा है, कि :- श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मंदो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ “जब प्रेय (तात्कालिक बाह्य इंद्रियसुख) और श्रेय (सच्चा और चिर- कालिक कल्याण) ये दोनों मनुष्यके सामने उपस्थित होते हैं, तब बुद्धिमान् मनुष्य उन दोनों में किसी एकको चुन लेता है। जो मनुष्य यथार्थमें बुद्धिमान् होता है, वह प्रेयकी अपेक्षा श्रेयको अधिक पसंद करता है; परंतु जिसकी बुद्धि मंद होती है, उसको आत्मकल्याणकी अपेक्षा प्रेय अर्थात् बाह्य सुखही अधिक अच्छा लगता है।” इस लिये यह मान लेना उचित नहीं, कि संसारमें इंद्रियजन्य विषय-सुखही मनुष्यका ऐहिक परम उद्देश्य है; तथा मनुष्य जो कुछ करता है वह सब केवल बाह्य अर्थात् आधिभौतिक सुखहीके लिये अथवा अपने दुःखोंको दूर करनेके लियेही करता है।

९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इंद्रियगम्य बाह्यसुखोंकी अपेक्षा बुद्धिगम्य अंतःसुखकी - अर्थात् आध्या- त्मिक सुखकी - योग्यता अधिक तो हैही; परंतु इसके साथ साथ एक बात यहभी है, कि विषय-सुख अनित्य है। वह दशा नीति-धर्मकी नहीं है। इस बातको सभी मानते हैं, कि अहिंसा, सत्य आदि धर्म कुछ बाहरी उपाधियों अर्थात् बाह्य सुखदुःखों- पर अवलंबित नहीं हैं; किंतु ये सभी अवसरोंके लिये और सब कामोंमें एकसमान उपयोगी हो सकते हैं। अतएव ये नित्य हैं। बाह्य बातोंपर अवलंबित न रहनेवाली, नीति-धर्मोंकी यह नित्यता उनमें कहांसे और कैसे आई - अर्थात् इस नित्यताका कारण क्या है ? इस प्रश्नका आधिभौतिक-वादसे हल होना असंभव है। कारण यह है, कि यदि बाह्यसृष्टिके सुख-दुःखोंके अवलोकनसे कुछ सिद्धान्त निकाला जाय, तो सब सुख-दुःखोंके स्वभावतः अनित्य होनेके कारण, उनके अपूर्ण आधार- पर बने हुए नीति-सिद्धान्तभी वैसेही अनित्य होंगे। और, ऐसी अवस्थामें सुख- दुःखोंकी कुछभी परवाह न करके सत्यके लिये जान दे देनेकी सत्य-धर्मकी जो त्रिकालाबाधित नित्यता है, वह "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख"के तत्त्वसे सिद्ध नहीं हो सकेगी। इसपर यह आक्षेप किया जाता है, कि जब सामान्य व्यवहारोंमें सत्यके लिये प्राण देनेका समय आ जाता है, तो बड़े बड़े लोगभी असत्य पक्ष ग्रहण करनेमें संकोच नहीं करते; और उस समय हमारे शास्त्रकारभी जादा सख्ती नहीं करते; तब सत्य आदि धर्मोंकी नित्यता क्यों माननी चाहिये ? परंतु यह आक्षेप या दलील ठीक नहीं है; क्योंकि जो लोग सत्यके लिये जान देनेका साहस नहीं कर सकते, वेभी अपने मुंहसे इस नीति-धर्मकी नित्यताको मानाही करते हैं। इसी लिये महाभारतमें अर्थ, काम आदि पुरुषार्थोंकी सिद्धि करनेवाले सब व्याव- हारिक धर्मोंका विवेचन करके, अंतमें भारत-सावित्रीमें (और विदुरनीतिमेंभी) व्यासजीने सब लोगोंकों यही उपदेश किया है :- न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नि यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।। अर्थात् “सुख-दुःख अनित्य हैं; परंतु (नीति) धर्म नित्य हैं। इसलिये सुखकी इच्छासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण-संकट आनेपरभी धर्मको कभी नहीं त्यागना चाहिये। यह जीव नित्य है; और सुखदुःख आदि विषय अनित्य हैं।" इसीलिये व्यासजी उपदेश करते हैं, कि अनित्य सुखदुःखोंका विचार न करके नित्य-जीवका संबंध नित्य-धर्मसेही जोड़ देना चाहिये । (महा. स्व. ५. ६; उ. ३९. १२, १३)। यह देखनेके लिये, व्यासजीका उक्त उपदेश उचित है या नहीं, हमें अब इस बातका वचार करना चाहिये, कि सुख-दुःखका यथार्थ स्वरूप क्या है, और नित्य सुख किसे कहते हैं।

पाँचवाँ प्रकरण सुखदुःखविवेक सुखमात्यंतिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतींद्रियम् । * — गीता ६. २१ हमारे शास्त्रकारोंको यह सिद्धान्त मान्य है, कि इस संसारका प्रत्येक मनुष्य सुख- प्राप्तिके लिये या प्राप्त सुखकी वृद्धिके लिये, दुःखको टालने या कम करनेके लिये ही सदैव प्रयत्न किया करता है। भृगुजी भरद्वाजसे शांतिपर्व (मभा. शां. १९०. ९) में कहते हैं, कि “ इह खलु अमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधी- यंते। न ह्यतःपरं त्रिवर्गफलं विशिष्टतरमस्ति।” अर्थात् इस लोक तथा परलोकमें सारी प्रवृत्ति केवल सुखके लिये है; और धर्म, अर्थ, कामका इसके अतिरिक्त कोई अन्य फल नहीं है। परंतु शास्त्रकारोंका कथन है, कि मनुष्य यह न समझकर कि सच्चा सुख किसमें है — मिथ्या सुखहीको सत्य सुख मान बैठता है; और इस आशासे, कि आज नहीं तो कल सुख अवश्य मिलेगा — वह अपनी आयुके दिन व्यतीत किया करता है। अकस्मात, एक दिन मृत्युके झपेटेमें पड़कर वह इस संसारको छोड़कर चल बसता है। परंतु उसके उदाहरणसे अन्य लोक सावधान होनेके बदले उसीका अनुकरण करते हैं। इस प्रकार यह भव-चक्र चलता रहा है, और कोई मनुष्य सच्चे और नित्य सुखका विचार नहीं करता ! इस विषयमें पूर्वी और पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंमें बड़ाही मतभेद है, कि यह संसार केवल दुःखमय है, या सुखप्रधान अथवा दुःखप्रधान है। परंतु इन पक्षवालोंमेंसे सभीको यह बात मान्य है, कि मनुष्यका कल्याण अपने दुःखका अत्यंत निवारण करके अत्यंत सुख-प्राप्ति करनेहीमें है। ‘सुख’ शब्दके बदले प्रायः ‘हित’, ‘श्रेय’ और कल्याण शब्दोंका अधिक उपयोग हुआ करता है। इनका भेद आगे चलकर बतलाया जायगा। यदि यह मान लिया जाय, कि सुख शब्दमेंही सब प्रकारके सुख और कल्याणका समावेश हो जाता है, तो सामान्यतः कहा जा सकता है, कि प्रत्येक मनुष्यका प्रयत्न केवल सुखके लिये हुआ करता है। परंतु इस सिद्धान्तके आधारपर सुख-दुःखका जो लक्षण महाभारतांतर्गत पराशरगीता (मभा. शां. २९५. २७) में दिया गया है, कि “ यदिष्टं तत्सुखं प्राहुः द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते ” — जो कुछ हमें इष्ट है वही सुख है; और जिसका हम द्वेष करते हैं, अर्थात् जो हमें नहीं चाहिये, वही दुःख है — उसे शास्त्रकी दृष्टिसे पूर्ण निर्दोष नहीं कह * “ जो केवल बुद्धिसे ग्राह्य हो और इंद्रियोंसे परे हो, उसे आत्यंतिक सुख कहते हैं।”

९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकते । क्योंकि इस व्याख्याके 'इष्ट' शब्दका अर्थ इष्ट वस्तु या पदार्थभी हो सकता है, और इस अर्थको माननेसे इष्ट पदार्थकोभी सुख कहना पड़ेगा । उदाहरणार्थ, प्यास लगनेपर पानी इष्ट होता है; परंतु इस बाह्य पदार्थ 'पानी' को 'सुख' नहीं कहते । यदि ऐसा होगा, तो नदीके पानीमें डूबनेवालेके बारेमें कहना पड़ेगा, कि वह सुखमें डूबा है । सच बात यह है, कि पानी पीनेसे जो इंद्रियतृप्ति होती है, उसे सुख कहते हैं। इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य इस इंद्रियतृप्ति या सुखको चाहता है; परंतु इससे यह व्यापक सिद्धान्त नहीं बताया जा सकता, कि जिसकी चाह होती है वह सब सुखही है। इसी लिये नैयायिकोंने सुखदुःखको वेदना कह कर उसकी व्याख्या इस तरहसे की है, 'अनुकूलवेदनीयं सुखं' जो वेदना हमारे अनुकूल है, वह सुख है; और 'प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं' जो वेदना हमारे प्रतिकूल है, वह दुःख है । ये वेदनाएँ जन्मसिद्ध अर्थात् मूलहीकी और अनुभवगम्य मात्र हैं। इसलिये नैयायिकोंकी उक्त व्याख्यासे बढ़कर सुखदुःखका अधिक उत्तम लक्षण बतलाया नहीं जा सकता । ये वेदनात्मक सुख-दुःख केवल मनुष्यके व्यापारोंसेही उत्पन्न नहीं होते हैं, तो कभी कभी कुछ देवताओंके कोपसेभी बड़े बड़े रोग और दुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, जिन्हें मनुष्यको अवश्य भोगना पड़ता है। इसीलिये वेदान्त-ग्रंथोंमें सामान्यतः इन सुख- दुःखोंके तीन भेद-आधिदैविक, आधि भौतिक और आध्यात्मिक किये गये हैं। देवता- ओंकी कृपा या कोपसे जो सुख-दुःख मिलते हैं, उन्हें 'आधिदैविक' कहते हैं। बाह्य- सृष्टिके - पृथ्वी आदि पंचमहाभूतात्मक पदार्थोंका मनुष्यकी इंद्रियोंसे संयोग होनेपर - शीतोष्ण आदिके कारण जो सुखदुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, उन्हें 'आधिभौतिक' कहते हैं। और, ऐसे बाह्यसंयोगके बिना उत्पन्न होनेवाले अन्य सब सुखदुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहते हैं। यदि सुख-दुःखका यह वर्गीकरण स्वीकार किया जाय, तो शरीरहीके वात- पित्त आदि दोषोंके परिमाणके बिगड़ जानेसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर आदि दुःखोंको - तथा उन्हीं दोषोंका परिणाम यथोचित रहनेसे अनुभवमें आनेवाले शारीरिक स्वास्थ्यको - आध्यात्मिक सुख-दुःख कहना पड़ता है। क्योंकि, यद्यपि ये सुखदुःख पंचमहाभूतात्मक शरीरसे संबंध रखते हैं - अर्थात् ये शारीरिक हैं - तथापि हमेशा यह नहीं कहा जा सकता, कि ये शरीरसे बाहर रहनेवाले पदार्थोंके संयोगसे पैदा हुए हैं। और इसलिये आध्यात्मिक सुख-दुःखोंके, वेदान्तकी दृष्टिसे फिर भी दो भेद - शारीरिक और मानसिक - करने पड़ते हैं। परंतु इस प्रकार सुख-दुःखोंके 'शारीरिक' और 'मानसिक' दो भेद कर दें, तो फिर आधिदैविक सुख-दुःखोंको भिन्न माननेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। क्योंकि, यह तो स्पष्टही है कि देवताओंकी कृपा अथवा क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले सुख-दुःखोंकोभी आखिर मनुष्य अपनेही शरीर या मनके द्वारा भोगता है। अतएव हमने इस ग्रंथमें वेदान्त-ग्रंथोंकी परिभाषाके अनुसार सुख-दुःखोंका त्रिविध वर्गीकरण नहीं किया है। किंतु उनके दोही वर्ग (बाह्य या शारीरिक और आभ्यन्तर या मानसिक) किये हैं, और इसी

सुखदुःखविवेक ९७ वर्गीकरणके अनुसार, हमने इस ग्रंथमें सब प्रकारके शारीरिक सुख-दुःखोंको 'आधिभौतिक' और सब प्रकारके मानसिक सुख-दुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहा है। वेदान्तग्रंथमें जैसे तीसरा वर्ग 'आधिदैविक' दिया गया है, वैसे हमने नहीं किया है। क्योंकि, हमारे मतानुसार सुख-दुःखोंका शास्त्रीय रीतिसे विवेचन करनेके लिये यह द्विविध वर्गीकरणही अधिक सुभीतेका है। सुखदुःखका जो विवेचन आगे किया गया है, उसे पढ़ते समय यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि वेदान्त-ग्रंथोंके और हमारे वर्गीकरणमें भेद है। सुख-दुःखोंको चाहे आप द्विविध मानिये अथवा त्रिविध, इसमें संदेह नहीं, कि दुःखकी चाह किसीभी मनुष्यको नहीं होती। इसीलिये वेदान्त और सांख्यशास्त्र (सां. का. १; गीता ६. २१, २२) में कहा गया है, कि सब प्रकारके दुःखोंकी अत्यंत निवृत्ति करना और आत्यंतिक तथा नित्य सुखकी प्राप्ति करनाही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। जब यह बात निश्चित हो चुकी, कि मनुष्यका परम साध्य या उद्देश्य आत्यंतिक सुखही है, तब ये प्रश्न मनमें सहजही उत्पन्न होते हैं, कि अत्यंत सत्य और नित्य सुख किसको कहना चाहिये ? उसकी प्राप्ति होना संभव है या नहीं ? यदि संभव है तो कब और कैसे ? इत्यादि। और जब हम इन प्रश्नोंपर विचार करने लगते हैं, तब सबसे पहले यही प्रश्न उठता है, कि नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणके अनुसार सुख और दुःख दोनों भिन्न भिन्न स्वतंत्र वेदनाएँ, "अनुभव या वस्तुएँ हैं" अथवा "जो उजेला नहीं वह अँधेरा" इस न्यायके अनुसार इन दोनों वेदनाओं- मेंसे एकका अभाव होनेपर दूसरी संज्ञाका उपयोग किया जाता है। भर्तृहरिने कहा है, कि "प्याससे जब मुँह सूख जाता है, तब हम उस दुःखका निवारण करनेके लिये पानी पीते हैं। भूखसे जब हम व्याकुल हो जाते हैं, तब मिष्टान्न खाकर उस व्यथाको हटाते हैं; और काम-वासनाके प्रदीप्त होनेपर उसको स्त्रीसंग द्वारा तृप्त करते हैं। इतना कहकर अंतमें कहा है कि :- प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः । "किसी व्याधि अथवा दुःखके उत्पन्न होनेपर उसका जो निवारण या प्रतिकार किया जाता है, उसीको लोक भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं।" दुःखनिवारणके अतिरिक्त 'सुख' कोई भिन्न वस्तु नहीं है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उक्त सिद्धान्त मनुष्योंके सिर्फ़ उन्हीं व्यवहारोंके विषयमें उपयुक्त होता है, जो स्वार्थहीके लिये किये जाते हैं। पिछले प्रकरणमें आनंदगिरिका यह मत बतलायाही गया है, कि जब हम किसीपर कुछ उपकार करते हैं, तब उसका कारण यही होता है, कि उसके दुःखको देखनेसे हमारी कारुण्यवृत्ति हमारे लिये असह्य हो जाती है; और इस दुःसहत्वकी व्यथाको दूर करनेके लियेही हम परोपकार किया करते हैं। इस पक्षके स्वीकृत करनेपर हमें महाभारतके अनुसार यह मानना पड़ेगा कि :- गी. र. ७

९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तृष्णार्त्तिप्रभवं दुःखं दुःखातिप्रभवं सुखम् । “ पहले जब कोई तृष्णा उत्पन्न होती है, तब उसकी पीड़ासे दुःख होता है; और उस दुःखकी पीड़ासे फिर सुख उत्पन्न होता है ” ( मभा. शां. २५. २२; १७४. १९ ) । संक्षेपमें इस पंथका यह कहना है, कि मनुष्यके मनमें पहले एक-आध आशा, वासना या तृष्णा उत्पन्न होती है; और जब उससे दुःख होने लगे, तब उस दुःखका जो निवारण किया जाता है, वही सुख कहलाता है। सुख कोई दूसरी भिन्न वस्तु नहीं है। अधिक क्या कहें उस पंथके लोगोंने यहभी अनुमान निकाला है, कि मनुष्यकी सब सांसारिक प्रवृत्तियाँ केवल वासनात्मक या तृष्णात्मकही हैं, और जबतक सब सांसारिक कर्मोंका त्याग नहीं किया जायगा, तबतक वासना या तृष्णाकी जड़ उखड़ नहीं सकती; और जबतक तृष्णा या वासनाकी जड़ नष्ट नहीं हो जाती, तबतक सत्य और नित्य सुखका मिलनाभी संभव नहीं है। वृहदारण्यक ( वृ. ४. ४. २२; वे. सू. ३. ४. १५ ) में विकल्पसे और जाबाल-संन्यास आदि उपनिषदोंमें प्रधानतासे उसीका प्रतिपादन किया गया है; तथा अष्टावक्र-गीता ( ९. ८; १०. ३-८) एवं अवधूत-गीता ( ३. ४६ ) में इसीका अनुवाद है। इस पंथका अंतिम सिद्धान्त यही है, कि जिस किसीको आत्यंतिक सुख या मोक्ष प्राप्त करना है, उसे उचित है, कि वह जितना जल्द हो सके उतना जल्द संसारको छोड़कर संन्यास ले ले। स्मृति-ग्रंथोंमें जिसका वर्णन किया गया है, और श्रीशंकराचार्यने कलियुगमें जिसकी स्थापना की है, वह श्रौत-स्मार्त संन्यासमार्ग इसी तत्त्वपर चलाया गया है। सच है; यदि सुख कोई स्वतंत्र वस्तुही नहीं है, जो कुछ है, सो दुःखही है; और वहभी तृष्णामूलक है, तो इन तृष्णा आदि विकारोंकोही पहले समूल नष्ट कर देनेपर फिर स्वार्थ और परार्थकी सारी झंझटें आप-ही-आप दूर हो जायगी; और तब मनकी जो मूल साम्यावस्था या शांति है, वही रह जायगी। इसी अभिप्रायसे महा- भारतान्तर्गत शांतिपर्वकी, पिंगलगीतामें, और मंकिगीतामें भी, कहा गया है, कि :- यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ “ सांसारिक काम अर्थात् वासनाकी तृप्ति होनेसे जो सुख होता है और जो सुख स्वर्गमें मिलता है, उन दोनों सुखोंकी योग्यता तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवें हिस्सेके बराबरभी नहीं है” ( मभा. शां. १७४. ४८; १७७. ४९ ) । वैदिक संन्यासमार्गकाही आगे चलकर जैन और बौद्ध-धर्ममें अनुकरण किया गया है। इसीलिये इन दोनों धर्मोंके ग्रंथोंमें तृष्णाके दुष्परिणामोंका और उसकी त्याज्यताका वर्णन, उपर्युक्त वर्णनोंहीके समान और कहीं कही तो उससेभी बढ़ा चढ़ा किया गया है (उदाहरणार्थ, 'धम्मपद'के 'तृष्णा-वर्ग'को देखिये)। तिब्बतके

सुखदुःखविवेक ९९ बौद्ध-धर्मग्रंथोंमें तो यहाँतक कहा गया है, कि महाभारतका उक्त श्लोक, बुद्धत्व प्राप्त होनेपर गौतम बुद्धके मुखसे निकला था। * तृष्णाके जो दुष्परिणाम ऊपर बतलाये गये हैं, वे श्रीमद्भगवद्गीताकोभी मान्य हैं। परंतु गीताका यह सिद्धान्त है, कि उन्हें दूर करनेके लिये कर्मका त्याग नहीं कर बैठना चाहिये। अतएव यहाँ सुख-दुःखकी उक्त उपपत्तिपर कुछ सूक्ष्म विचार करना आवश्यक है। संन्यासमार्गके लोगोंका यह कथन सर्वथा सत्य नहीं माना जा सकता, कि सब सुख तृष्णा आदि दुःखोंके निवारण होनेपरही उत्पन्न होते हैं। एकबार अनुभवकी हुई (देखी हुई, सुनी हुई, इत्यादि) वस्तुकी जब फिर चाह होती है तब उसे काम, वासना या इच्छा कहते हैं। जब इच्छित वस्तु जल्द नहीं मिलती, तब दुःख होता है; जिससे वह इच्छा तीव्र होने लगती है, अथवा जब इच्छित वस्तुके मिलनेपरभी पूरा सुख नहीं मिलता; और उसकी चाह अधिकाधिक बढ़ने लगती है, तब उसी इच्छाको तृष्णा कहते हैं; परंतु इस प्रकार केवल इच्छाके तृष्णा- स्वरूपमें बदल जानेके पहलेही, यदि वह इच्छा पूर्ण हो जाय, तो उससे प्राप्त होने- वाले सुखके बारेमें हम यह नहीं कह सकेंगे, कि वह तृष्णा-दुःखके क्षय होनेसे उत्पन्न हुआ है। उदाहरणार्थ, प्रतिदिन नियत समयपर भोजन मिलता है, उसके बारेमें अनुभव यह नहीं है, कि भोजन करनेके पहले हमें दुःखही होता हो। यदि नियत समयपर भोजन न मिले तो हमारा जी भूखसे व्याकुल हो जाया करता है - अन्यथा नहीं। अच्छा, यदि हम मान लें, कि तृष्णा और इच्छा एकही अर्थके द्योतक हैं; तोभी यह सिद्धान्त सच नहीं माना जा सकता, कि सब सुख तृष्णामूलकही हैं। उदा- हरणके लिये, एक छोटे बच्चेके मुंहमें अचानक यदि, एक मिश्रीकी डली डाल दो तो यह कहा नहीं जा सकेगा, कि उस बच्चेको मिश्री खानेसे जो सुख हुआ वह पूर्व- तृष्णाके क्षयसे हुआ है। इसी तरह मान लो, कि राह चलते चलते हम किसी रमणीय बागमें जा पहुँचे; और वहाँ कोयलका मधुर गान एकाएक सुन पड़ा, अथवा किसी मंदिरमें भगवान्‌की मनोहर छबि दीख पड़ी; तब ऐसी अवस्थामें यह नहीं कहा जा सकता, कि उस गानके सुननेसे, या उस छबिके दर्शनसे होनेवाले सुखकी हम पहलेहीसे इच्छा किये बैठे थे। सच बात तो यही है, कि सुखकी इच्छा किये बिनाही उस समय हमें सुख मिला। इन उदाहरणोंपर ध्यान देनेसे यह अवश्यही मानना पड़ेगा, कि संन्यास-मार्गवालोंकी सुखकी उक्त व्याख्या ठीक नहीं है; और यहभी मानना पड़ेगा, कि इंद्रियोंमें भलीबुरी वस्तुओंका उपभोग करनेकी स्वाभाविक शक्ति होनेके कारण जब वे अपना व्यापार करती रहती हैं; और जब

  • Rockhill's Life of Buddha p. 33 यह श्लोक 'उदान'नामक पाली ग्रंथ (२. २) में है। परंतु उसमें ऐसा वर्णन नहीं है कि यह श्लोक बुद्धके मुखसे, उसे 'बुद्धत्व' प्राप्त होनेके समय निकला था। इससे यह साफ़ मालूम हो जाता है, कि यह श्लोक पहले पहल बुद्धके मुखसे न निकला हो।

१०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कभी उन्हें अनुकूल या प्रतिकूल विषयकी प्राप्ति हो जाती है, तब पहले तृष्णा या इच्छाके न रहनेपरभी हमें सुख-दुःखका अनुभव हुआ करता है। इसी बातकी ध्यान रखकर गीता (२. १४) में कहा गया है, कि 'मात्रास्पर्शोंसे शीत-उष्ण आदिका अनुभव करनेपर सुख-दुःख उत्पन्न हुआ करता है। सृष्टिके बाह्य पदार्थोंको 'मात्रा' कहते हैं। गीताके उक्त पदोंका अर्थ यह है, कि जब उन बाह्य पदार्थोंका इंद्रियोंसे स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, तब सुख या दुःखकी वेदना उत्पन्न होती है। यही कर्मयोगशास्त्रकाभी सिद्धान्त है। कानको कर्कश आवाज़ अप्रिय क्यों मालूम होती है ? जिह्वाको मधुर रस प्रिय क्यों लगता है ? आँखोंको पूर्ण चंद्रका प्रकाश आल्हादकारक क्यों प्रतीत होता है ? इत्यादि बातोंका कारण कोईभी नहीं बतला सकता। हम लोग केवल इतनाही जानते हैं, कि जीभको मधुर रस मिलनेसे वह संतुष्ट हो जाती है। इससे प्रकट होता है, कि आधिभौतिक सुखका स्वरूप केवल इंद्रियोंके अधीन है; और इसलिये कभी कभी इन इंद्रियोंके व्यापारोंको जारी रखनेमेंही सुख मालूम होता है - चाहे इसका परिणाम भविष्यमें कुछभी हो। उदा- हरणार्थ, कभी कभी ऐसा होता है, कि मनमें कुछ विचार आनेसे उस विचारके सूचक शब्द आप-ही-आप मुंहसे बाहर निकल पड़ते हैं। ये शब्द कुछ इस इरादेसे बाहर नहीं निकाले जाते, कि इनको कोई जान लें; बल्कि कभी कभी तो इन स्वाभाविक व्यापारोंसे हमारे मनकी गुप्त बातभी प्रकट हो जाया करती है, जिससे हमको, उल्टे नुकसान हो सकता है। छोटे बच्चे जब चलना सीखते हैं, तब वे दिनभर यहाँ वहाँयोंही चलते फिरते हैं। इसका कारण यह है, कि उन्हें चलते रहनेकी क्रियामेंही उस समय आनंद मालूम होता है। इसलिये सब सुखोंको दुःखाभावरूपही न कहकर यही कहा गया है, कि "इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ" (गीता ३. ३४) अर्थात् इंद्रियोंमें और उनके शब्दस्पर्शा आदि विषयोंमें जो राग (प्रेम) और द्वेष हैं, वे दोनों पहलेहीसे 'व्यवस्थित' अर्थात् स्वतंत्र-सिद्ध हैं। और अब हमें यही जानना है, कि इंद्रियोंके ये व्यापार आत्माके लिये कल्याणदायक कैसे होंगे या करलिये जा सकेंगे। इसके लिये श्रीकृष्ण भगवान्‌का यही उपदेश है, इंद्रियों और मनकी वृत्तियोंका नाश करनेका प्रयत्न करनेके बदले उनको अपने आत्माके लिये लाभ- दायक बनानेके अर्थ अपने अधीन रखना चाहिये - उन्हे स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिये। भगवान्के इस उपदेशमें, तृष्णा तथा उसीके साथ सब मनोवृत्तियोंकोभी समूल नष्ट करनेके लिये कहनेमें, जमीन-आसमानका अंतर है। गीताका यह तात्पर्य नहीं है, कि संसारके सब कर्तृत्व और पराक्रमका बिलकुल नाश कर दिया जाय; बल्कि उसके अठारहवें अध्याय (गीता १८. २६) में तो कहा है, कि कार्य-कर्तामें समबुद्धिके साथ धृति और उत्साहके गुणोंका होनाभी आवश्यक है। इस विषयपर विस्तृत विवेचन आगे किया जायगा। यहाँ हमको केवल यही जानना है, कि 'सुख' और 'दुःख' दोनों भिन्न वृत्तियां हैं, या उनमेंसे एक दूसरीका अभाव मात्रही है।

सुखदुःखविवेक १०१ इस विषयमें गीताका मत उपर्युक्त विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। 'क्षेत्र'का अर्थ बतलाते समय 'सुख' और 'दुःख'की अलग अलग गणना की गई है (गीता १३. ६); बल्कि यहभी कहा गया है, 'सुख' सत्त्वगुणका और 'तृष्णा' रजोगुणका लक्षण है (गीता १४. ६, ७); और सत्त्वगुण तथा रजोगुण दोनों अलग हैं। इससेभी भगवद्गीताका यह मत साफ़ मालूम हो जाता है, कि सुख और दुःख दोनों एक दूसरेके प्रतियोगी हैं; और भिन्न भिन्न दो वृत्तियाँ हैं। अठारहवें अध्यायमें राजस त्यागकी जो न्यूनता दिखलाई है, कि “कोईभी काम यदि दुःखकारक है, तो उसे छोड़ देनेसे त्यागफल नहीं मिलता; किंतु ऐसा त्याग राजस कहलाता है” (गीता १८. ८), वहभी इस सिद्धान्तके विरुद्ध है, कि “सब सुख तृष्णा-क्षयमूलकही हैं।” अब यदि यहमान लें, कि सब सुख तृष्णा-क्षयरूप अथवा दुःखाभावरूप नहीं हैं, और यहभी मान लें, कि सुख-दुःख दोनों स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; तोभी - इन दोनों वेदनाओंके परस्पर-विरोधी या प्रतियोगी होनेके कारण - यह दूसरा प्रश्न उपस्थित होता है, कि जिस मनुष्यको दुःखका कुछभी अनुभव नहीं है, उसे सुखका स्वाद मालूम हो सकता है या नहीं ? कई लोगोंका तो यहाँतक कहना है, कि दुःखका अनुभव किये बिना सुखका स्वादही नहीं मालूम हो सकता। इसके विपरीत, स्वर्गके देवताओंके नित्यसुखका उदाहरण देकर कुछ पंडित प्रतिपादन करते हैं, कि सुखका स्वाद मालूम होनेके लिये दुःखके पूर्वानुभवकी कोई आवश्यकता नहीं है। जिस तरह किसीभी खट्टे पदार्थको पहले चखे बिनाही शहद, गुड़, शक्कर, आम, केला इत्यादि पदार्थोंका भिन्न भिन्न प्रकारका मीठापन मालूम हो जाया करता है, उसी तरह सुखकेभी अनेक प्रकार होनेके कारण पूर्व-दुःखानुभवके बिनाही भिन्न भिन्न प्रकारके सुखों (जैसे, रूईदार गद्दीपरसे उठकर परोंकी गद्दीपर बैठना इत्यादि) का सदैव अनुभव करते रहनाभी सर्वथा संभव है। परंतु सांसारिक व्यव- हारोंको देखनेसे मालूम हो जायगा, कि यह वादही निरर्थक है। पुराणोंमें देवताओं- परभी संकट पड़नेके कई उदाहरण हैं; और पुण्यका अंश घटतेही कुछ समयके बाद स्वर्ग-सुखकाभी नाश हो जाया करता है। इसलिये स्वर्गीय सुखका उदाहरण ठीक नहीं है। और, यदि ठीकभी हो, तो स्वर्गीय सुखका उदाहरण हमारे किस काम का ? यदि यह सत्य मान लें, कि “नित्यमेव सुखं स्वर्गे” तो इसीके आगे (मभा. शां. १९०. १४) यहभी कहा है, कि “सुखं दुःखमिहोभयम्” - अर्थात् इस संसारमें सुख और दुःख दोनों मिश्रित हैं। इसीके अनुसार समर्थ श्रीरामदास स्वामीनेभी कहा है, “हे विचारवान् मनुष्य, इस बातको अच्छी तरह सोचकर देख ले, कि इस संसारमें पूर्ण सुखी कौन है ?” इसके सिवा द्रौपदीने सत्यभामाको यह उपदेश दिया है कि :-

१०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं दुःखेन साध्वी लभते सुखानि । अर्थात् “ सुख सुखसे कभी नहीं मिलता; साध्वी स्त्रीको सुख-प्राप्तिके लिये दुःख या कष्ट सहना पड़ता है" (मभा. वन. २३३. ४)। इससे कहना पड़ेगा, कि यह उपदेश इस संसारके अनुभवके अनुसार सत्य है। देखिये, यदि जामुन किसीके होंठपर धर दिया जाय, तोभी उसको चबानेके लिये पहले मुंह खोलना पड़ता है; और यदि मुंहमें चला जाय, तो उसे खानेका कष्ट सहनाही पड़ता है। सारांश, यह बात सिद्ध है, कि दुःखके बाद सुख पानेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें, और हमेशा विषयोपभोगोंमेंही निमग्न रहनेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें बहुत भारी अंतर है। इसका कारण यह है, कि हमेशा सुखका उपभोग करते रहनेसे सुखका अनुभव करनेवाली इंद्रियांभी शिथिल-सी होती जाती हैं। कहाभी है कि :- प्रायेण श्रीमंतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ अर्थात् “ श्रीमानोंमें सुस्वादु अन्नका सेवन करनेकोभी शक्ति नहीं रहती; परंतु गरीब लोग काष्ठकोभी पचा जाते हैं" (मभा. शां. २८. २९)। अतएव जब कि हमको इस संसारकेही व्यवहारोंका विचार करना है, तब कहना पड़ता है, कि इस प्रश्नको अधिक हल करते रहनेमें कोई लाभ नहीं, कि बिना दुःख पाये हमेशा सुखका अनुभव किया जा सकता है या नहीं। इस संसारमें यही क्रम सदासे सुन पड़ रहा है, कि “ सुखस्यानंतरं दुःखं दुःखस्यानंतरं सुखम् " (मभा. वन. २६०. ४९; शां. २५. २३.) अर्थात् सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख मिलाही करता है। और महाकवि कालिदासनेभी मेघदूत (मे. १. १४) में वर्णन किया है :- कस्यैकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ “किसीकीभी स्थिति हमेशा सुखमय या हमेशा दुःखमय नहीं होती। सुख-दुःखकी दशा पहियेके समान ऊपर और नीचेकी ओर हमेशा बदलती रहती है।” फिर यह दुःख चाहे हमारे सुखकी मिठासको अधिक बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ हो या इस प्रकृतिके संसारमें उसका औरभी कुछ उपयोग होता हो; उक्त अनुभव-सिद्ध क्रमके बारेमें मतभेद हो नहीं सकता। यहाँ, यह बात कदाचित् असंभव न होगी, कि कोई मनुष्य हमेशाही विषय-सुखका उपभोग किया करे और उससे उसका जीभी न ऊबे। परंतु इस कर्मभूमि (मृत्युलोक या संसार)में यह बात सर्वथा असंभव है, कि दुःखका बिलकुल नाश हो जाय और हमेशा सुख-ही-सुखका अनुभव मिलता रहे। यदि यह बात सिद्ध है, कि संसार केवल सुखमय नहीं है, किंतु वह सुख- दुःखात्मक है, तो अब तीसरा प्रश्न आप-ही-आप मनमें पैदा होता है, कि संसारमें सुख अधिक है या दुःख ? जो पश्चिमी पंडित आधिभौतिक सुखकोही परम साध्य

सुखदुःखविवेक १०३ मानते हैं, उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि यदि संसारमें सुखसे दुःखही अधिक होता, तो (सब नहीं तो) अधिकांश लोग अवश्यही आत्महत्या कर डालते। क्योंकि जब उन्हें मालूम हो जाता, कि संसार दुःखमय है, तो वे फिर उसमें रहनेकी झंझटमें क्यों पड़ते ? बहुधा देखा जाता है, कि मनुष्य अपनी आयु अर्थात् जीवनसे नहीं ऊबता; इसलिये निश्चयपूर्वक यही अनुमान किया जा सकता है, कि इस संसारमें मनुष्यको दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक मिलता है; और इसलिये धर्म-अधर्मका निर्णयभी, सुखकोही सब लोगोंका परम साध्य समझ कर, किया जाना चाहिए। अब यदि उपर्युक्त मतकी अच्छी तरह जांचकी जाय तो मालूम हो जायगा, कि यहाँ आत्महत्याका जो संबंध सांसारिक सुखके साथ जोड़ दिया गया है, वह वस्तुतः सत्य नहीं है। हाँ, यह बात सच है, कि कभी कभी कोई मनुष्य संसारसे त्रस्त होकर आत्महत्या कर डालता है; परंतु सब लोग उसकी गणना 'अपवाद' में अर्थात् पागलोंमें किया करते हैं। इससे यही बोध होता है, कि सर्वसाधारण लोगभी 'आत्महत्या करने या न करने' का संबंध सांसारिक सुखके साथ नहीं जोड़ते किंतु उसे (अर्थात् आत्महत्या करने या न करनेको) एक स्वतंत्र बात समझते हैं। यदि असभ्य और जंगली मनुष्योंके उस 'संसार' या जीवनका विचार किया जावे, जो सुधरे हुए और सभ्य मनुष्योंकी दृष्टिसे अत्यंत कष्टदायक और दुःखमय प्रतीत होता है; तोभी वही अनुमान निष्पन्न होगा, जिसका उल्लेख ऊपरके वाक्यमें किया गया है। प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ चार्ल्स डार्विनने अपने प्रवास-ग्रंथमें कुछ ऐसे जंगली लोगोंका वर्णन किया है, जिन्हें उसने दक्षिण-अमेरिकाके अत्यंत दक्षिण प्रांतोंमें देखा था। उस वर्णनमें लिखा है, कि वे असभ्य लोग - स्त्री, पुरुष सब - कड़ाकेके जाड़ेके अपने देशमें बारहों महीने नंगे घूमते रहते हैं; इनके अपने पास अनाजका कुछभी संग्रह न करते रहनेसे इन्हें कभी कभी भूखों रहना पड़ता है; तथापि इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़तीही जाती है*। देखिये, ये जंगली मनुष्यभी अपनी जान नहीं देते; परंतु क्या इससे यह अनुमान किया जा सकता है, कि उनका संसार या जीवन सुखमय है ? कदापि नहीं। यह बात सच है, कि वे आत्महत्या नहीं करते; परंतु इसके कारणका यदि सूक्ष्म विचार किया जावे, तो मालूम होगा, कि हर एक मनुष्यको - चाहे वह सभ्य हो या असभ्य - केवल इसी बातमें अत्यंत आनंद मालूम होता है, कि "मैं पशु नहीं हूँ मनुष्य हूँ।" और अन्य सब सुखोंकी अपेक्षा मनुष्य होनेके सुखको वह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है, कि यह संसार कितनाभी कष्टमय क्यों न हो; तथापि वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता; और न वह अपने इस मनुष्यत्वके दुर्लभ सुखको खो देनेके लिये कभी तैयार रहता है। मनुष्यकी बात तो दूर रही, पशु-पक्षीभी आत्महत्या नहीं करते तो क्या इससे कह सकते हैं, कि उनकाभी संसार या जीवन सुखमय है ? तात्पर्य यह है, कि "मनुष्य या पशु-पक्षी आत्महत्या नहीं

  • Darwin's Naturalist's Voyage Round the World - Chap. X.

१०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करते” इस बातसे यह भ्रामक अनुमान नहीं करना चाहिये, कि उनका जीवन सुखमय है। सच्चा अनुमान यही हो सकता है, कि संसार कैसाभी हो, उससे कुछ अपेक्षा न रखते हुये; सिर्फ़ अचेतन अर्थात् जड़ अवस्थासे सचेतन यानी सजीव अवस्थामें आनेहीसे अनुपम आनंद मिलता है; और उसमेंभी मनुष्यत्वका आनंद तो सबमे श्रेष्ठ है। हमारे शास्त्रकारोंनेभी कहा है :- भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजोविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृता ॥ ब्राह्मणेषु च विद्वांसः विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ॥ अर्थात् “अचेतन पदार्थोंकी अपेक्षा सचेतन प्राणी श्रेष्ठ है। सचेतन प्राणियोंमें बुद्धिमान्, बुद्धिमानोंमें मनुष्य, मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि (वे मनुष्य जिनकी बुद्धि सुसंस्कृत हो), कृतबुद्धियोंमें कर्ता (काम करनेवाले), और कर्त्ताओंमें ब्रह्मवादी श्रेष्ठ हैं।” इस प्रकार शास्त्रों (मनु. १. ९६, ९७; मभा. उद्यो. ५. १ और २) में क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंका जो वर्णन है, उसकाभी रहस्य वही है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। और उसी न्यायसे प्राकृत भाषा-ग्रंथोंमेंभी कहा गया है, कि चौरासी लाख योनियोंमें नरदेह श्रेष्ठ है, नरोंमें मुमुक्षु श्रेष्ठ है और मुमुक्षुओंमें सिद्ध श्रेष्ठ है। संसारमें जो कहावत प्रचलित है, कि “सबको अपनी जान अधिक प्यारी होती है।” उसकाभी कारण वही है, जो ऊपर लिखा गया है। और इसी कारणसे संसारके दुःखमय होनेपरभी जब कोई मनुष्य आत्महत्या करता है, तो उसको लोग पागल कहते हैं; और धर्मशास्त्रके अनुसार वह पापी समझा जाता है (मभा. कर्ण. ७०. २८)। तथा आत्महत्याका प्रयत्नभी कानूनके अनुसार जुर्म माना जाता है। संक्षेपमें यह सिद्ध हो गया, कि “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता” – इस बातसे संसारके सुख- मय होनेका अनुमान करना उचित नहीं है। ऐसी अवस्थामें हमको, “यह संसार सुखमय है या दुःखमय?” इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये, पूर्वकर्मानुसार नरदेहप्राप्ति-रूप अपने नैसर्गिक भाग्यकी बातको छोड़कर, केवल उसके पश्चात् अर्थात् इस संसारहीकी बातोंका विचार करना चाहिये। “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता; बल्कि वह जीनेकी इच्छा करता रहता है” – यह तो सिर्फ़ संसारकी प्रवृत्तिका कारण है। आधिभौतिक पंडितोंके कथनानुसार संसारके सुखमय होनेका यह कोई सबूत या प्रमाण नहीं है। यह बात इस प्रकारभी कही जा सकती है, कि आत्महत्या न करनेकी बुद्धि स्वाभाविक है; वह संसारके सुखदुःखोके तारतम्यसे उत्पन्न नहीं हुई है; और, इसीलिये इससे यह सिद्ध हो नहीं सकता कि संसार सुखमय है।