भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

३२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मान्य है, कि ज्ञानके पश्चात् कर्म तो आप-ही-आप छूट जाते हैं। परंतु हमारी समझमें गीताके वाक्योंके ये अर्थ और उपर्युक्त युक्तिवादभी ठीक नहीं हैं। इसीसे इसके विरुद्ध हमें जो कुछ कहना है, उसे अब संक्षेपमें कहते हैं। 'सुखदुःख-विवेक' प्रकरणमें हमने दिखलाया है, कि गीता इस बातको नहीं मानती, कि “ज्ञानी हो जानेसे मनुष्यकी सब प्रकारकी इच्छाएँ या वासनाएँ छूटही जानी चाहिये।” सिर्फ़ इच्छा या वासनाके रहनेमें कोई दुःख नहीं, दुःखकी सच्ची जड़ है उसकी आसक्ति। इससे गीताका सिद्धान्त है, कि सब प्रकारकी वासनाओंको नष्ट करनेके बदले ज्ञाताको उचित है, कि वह केवल आसक्तिको छोड़कर कर्म करे। यह आवश्यक नहीं, कि इस आसक्तिके छूटनेसे उसके साथ कर्मभी छूटही जावें। और तो क्या? वासनाके छूट जानेपरभी सब कर्मोंका छूटना शक्य नहीं। वासना हो या न हो, हम देखते हैं, कि श्वासोच्छ्वास प्रभृति कर्म नित्य लगातार हुआ करते हैं। और आखिर क्षणभर जीवित रहनाभी तो कर्मही है, एवं पूर्ण ज्ञान होनेपरभी, अपनी वासनासे अथवा वासनाके क्षयसे वह छूट नहीं सकता। यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है, कि वासनाके छूट जानेसे कोई ज्ञानी पुरुष अपने प्राण नहीं खो बैठता, और इसीसे गीतामें यह वचन आया है, कि “न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” (गीता ३. ५) — कोई क्यों न हो, बिना कर्म किये, रह नहीं सकता। गीताशास्त्रके कर्म- योगका पहला सिद्धान्त यह है, कि इस कर्मभूमिमें कर्म तो निसर्गतोही प्राप्त, प्रवाह- पतित और अपरिहार्य हैं, वे मनुष्यकी वासनापर अवलंबित नहीं हैं। इस प्रकार यह सिद्ध हो जानेपर, कि कर्म और वासनाका परस्पर नित्य संबंध नहीं है, वासनाके क्षयके साथही कर्मकाभी क्षय मानना निराधार हो जाता है। फिर यह प्रश्न सहजही उत्पन्न होता है, कि वासनाका क्षय हो जानेपरभी ज्ञानी पुरुषको प्राप्त कर्म किस रीतिसे करने चाहिये? इस प्रश्नका उत्तर गीताके तीसरे अध्यायमें दिया गया है (गीता ३ १७-१९ और उसपर हमारी टीका देखो)। गीताको यह मत मान्य है, कि ज्ञानी पुरुषको ज्ञानके पश्चात् उसका अपना कोई कर्तव्य नहीं रह जाता। परंतु इसके आगे बढ़कर गीताका यहभी कथन है; कि कोईभी क्यों न हो, वह कर्मसे छुट्टी नहीं पा सकता। कई लोगोंको ये दोनों सिद्धान्त परस्परविरोधी जान पड़ते हैं, कि ज्ञानी पुरुषको कर्तव्य नहीं रहता और कर्म नहीं छूट सकते। परंतु गीताकी बात ऐसी नहीं है। गीताने उनका यों मेल मिलाया है :- जब कि कर्म अपरिहार्य हैं, तब ज्ञान-प्राप्तिके बादभी ज्ञानी पुरुषको कर्म करनाही चाहिये, पर चूंकि उसको स्वयं अपने लिये कोई कर्तव्य नहीं रह जाता, इसलिये अब उसे अपने सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करनाही उचित है। सारांश, तीसरे अध्यायके १७ वें श्लोकके “तस्य कार्यं न विद्यते” वाक्यमें, “कार्यं न विद्यते” इन शब्दोंकी अपेक्षा, 'तस्य' (अर्थात् उस ज्ञानी पुरुषके लिये) शब्द अधिक महत्त्वका है और उसका भावार्थ यह है, कि “स्वयं उसको” अपने लिये कुछ प्राप्त नहीं करना होता। इसीलिये अब (ज्ञान हो