भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

संन्यास और कर्मयोग ३२५ जानेपर) उसको अपना कर्तव्यनिरपेक्ष बुद्धिसे करना चाहिये। आगे १९ वें श्लोकके आरंभमें कारणबोधक 'तस्मात्' पदका प्रयोगकर, अर्जुनको इसी अर्थका उपदेश यों दिया है : “तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर ।” (गीता ३ १९) - इसीसे तू शास्त्रसे प्राप्त अपने कर्तव्यको आसक्ति न रखकर करना जा; कर्मका त्याग मत कर । तीसरे अध्यायके १७ से १९ तकके तीन श्लोकोंमें जो कार्यकारणभाव व्यक्त होता है, उसपर और अध्यायके समूचे प्रकरणके संदर्भपर ठीक ठीक ध्यान देनेसे दीख पड़ेगा कि संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार " तस्य कार्य न विद्यते" इसे स्वतंत्र सिद्धान्त मान लेना उचित नहीं। आगे दिये हुए उदाहरण इसके लिये उत्तम प्रमाण हैं। “ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् कोई कर्तव्य न रहनेपरभी शास्त्रसे प्राप्त समस्त व्यवहार करने पड़ते हैं" - इस सिद्धान्तकी पुष्टिमें भगवान् कहते हैं :- न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ "हे पार्थ ! 'मेरा' इस त्रिभुवनमें कुछभी कर्तव्य (बाकी) नहीं है, अथवा कोई अप्राप्त वस्तु पानेकी (वासना) नहीं रही है। तथापि मैं कर्मही करता हूँ" (गीता ३. २२)। “न मे कर्तव्यमस्ति” - मुझे कर्तव्य नहीं रहा है- ये शब्द पूर्वोक्त श्लोकके "तस्य कार्य न विद्यते" - उसको कुछ कर्तव्य नहीं रहता (गीता ३. १७) – इन्हीं शब्दोंको लक्ष्य करके कहे गये हैं। इससे सिद्ध होता है, कि इन चारपांच श्लोकोंमें प्रतिपाद्य अर्थ यही है “ज्ञानसे कर्तव्यके शेष न रहनेपरभी (बल्कि इसी कारणसे) शास्त्रतः प्राप्त समस्त व्यवहार अनासक्त बुद्धिसे करनेही चाहिये।” यदि ऐसा न हो, तो “तस्य कार्य न विद्यते" इत्यादि श्लोकोंमें बतलाये हुए सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये भगवान्ने जो अपना उदाहरण दिया है, वह (अलग) असंबद्धसा हो जायगा; और यह अनवस्था प्राप्त हो जायगी, कि सिद्धान्त तो कुछ और है, और उदाहरण ठीक उसके विरुद्ध, कुछ औरही है। उस अनवस्थाको टालनेके लिये संन्यासमार्गीय टीकाकार "तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर” के 'तस्मात्' शब्दका अर्थभी निराली रीतिसे किया करते हैं। उनका कथन है, कि गीताका मुख्य सिद्धान्त तो यही है, कि “ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ दे।” परंतु अर्जुन ऐसा ज्ञानी था नहीं; इसलिये - "तस्मात् - भगवान्ने उसे कर्म करनेके लिये कहा है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि “गीताके उपदेशके पश्चात्भी अर्जुन अज्ञानीही था" यह युक्ति ठीक नहीं है। उसके अतिरिक्त, यदि 'तस्मात्' शब्दका, अर्थ इस प्रकार खींचातानी कर लगाभी लिया, तो "न मे पार्थास्ति कर्तव्यम्" प्रभृति श्लोकोंमें भगवान्ने - "अपने किसी कर्तव्यके न रहनेपरभी मैं कर्म करता हूँ" - यह जो अपना उदाहरण मुख्य सिद्धान्तके समर्थनमें दिया है, उसका मेलभी इस पक्षमें अच्छा नहीं जमता। इसलिये “तस्य कार्य न विद्यते" वाक्यमें, "कार्य न विद्यते" शब्दोंको मुख्य न मानकर 'तस्य' शब्द-