श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
संन्यास और कर्मयोग ३२५ जानेपर) उसको अपना कर्तव्यनिरपेक्ष बुद्धिसे करना चाहिये। आगे १९ वें श्लोकके आरंभमें कारणबोधक 'तस्मात्' पदका प्रयोगकर, अर्जुनको इसी अर्थका उपदेश यों दिया है : “तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर ।” (गीता ३ १९) - इसीसे तू शास्त्रसे प्राप्त अपने कर्तव्यको आसक्ति न रखकर करना जा; कर्मका त्याग मत कर । तीसरे अध्यायके १७ से १९ तकके तीन श्लोकोंमें जो कार्यकारणभाव व्यक्त होता है, उसपर और अध्यायके समूचे प्रकरणके संदर्भपर ठीक ठीक ध्यान देनेसे दीख पड़ेगा कि संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार " तस्य कार्य न विद्यते" इसे स्वतंत्र सिद्धान्त मान लेना उचित नहीं। आगे दिये हुए उदाहरण इसके लिये उत्तम प्रमाण हैं। “ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् कोई कर्तव्य न रहनेपरभी शास्त्रसे प्राप्त समस्त व्यवहार करने पड़ते हैं" - इस सिद्धान्तकी पुष्टिमें भगवान् कहते हैं :- न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ "हे पार्थ ! 'मेरा' इस त्रिभुवनमें कुछभी कर्तव्य (बाकी) नहीं है, अथवा कोई अप्राप्त वस्तु पानेकी (वासना) नहीं रही है। तथापि मैं कर्मही करता हूँ" (गीता ३. २२)। “न मे कर्तव्यमस्ति” - मुझे कर्तव्य नहीं रहा है- ये शब्द पूर्वोक्त श्लोकके "तस्य कार्य न विद्यते" - उसको कुछ कर्तव्य नहीं रहता (गीता ३. १७) – इन्हीं शब्दोंको लक्ष्य करके कहे गये हैं। इससे सिद्ध होता है, कि इन चारपांच श्लोकोंमें प्रतिपाद्य अर्थ यही है “ज्ञानसे कर्तव्यके शेष न रहनेपरभी (बल्कि इसी कारणसे) शास्त्रतः प्राप्त समस्त व्यवहार अनासक्त बुद्धिसे करनेही चाहिये।” यदि ऐसा न हो, तो “तस्य कार्य न विद्यते" इत्यादि श्लोकोंमें बतलाये हुए सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये भगवान्ने जो अपना उदाहरण दिया है, वह (अलग) असंबद्धसा हो जायगा; और यह अनवस्था प्राप्त हो जायगी, कि सिद्धान्त तो कुछ और है, और उदाहरण ठीक उसके विरुद्ध, कुछ औरही है। उस अनवस्थाको टालनेके लिये संन्यासमार्गीय टीकाकार "तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर” के 'तस्मात्' शब्दका अर्थभी निराली रीतिसे किया करते हैं। उनका कथन है, कि गीताका मुख्य सिद्धान्त तो यही है, कि “ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ दे।” परंतु अर्जुन ऐसा ज्ञानी था नहीं; इसलिये - "तस्मात् - भगवान्ने उसे कर्म करनेके लिये कहा है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि “गीताके उपदेशके पश्चात्भी अर्जुन अज्ञानीही था" यह युक्ति ठीक नहीं है। उसके अतिरिक्त, यदि 'तस्मात्' शब्दका, अर्थ इस प्रकार खींचातानी कर लगाभी लिया, तो "न मे पार्थास्ति कर्तव्यम्" प्रभृति श्लोकोंमें भगवान्ने - "अपने किसी कर्तव्यके न रहनेपरभी मैं कर्म करता हूँ" - यह जो अपना उदाहरण मुख्य सिद्धान्तके समर्थनमें दिया है, उसका मेलभी इस पक्षमें अच्छा नहीं जमता। इसलिये “तस्य कार्य न विद्यते" वाक्यमें, "कार्य न विद्यते" शब्दोंको मुख्य न मानकर 'तस्य' शब्द-
३२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कोही प्रधान मानना चाहिये, और ऐसा करनेमे “ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ”का अर्थ यही करना पडता है, कि “ तू ज्ञानी है; इसलिये यह सच है, कि तुझे अपने स्वार्थके लिये कर्म अनावश्यक हैं; परंतु स्वयं तेरे लिये कर्म अनावश्यक हैं, इसीलिये अब तू उन कर्मोंको (जो शास्त्रसे प्राप्त हुए है) मुझे आवश्यक नहीं इस बुद्धिमे “ अर्थात् निष्काम बुद्धिमे कर ! ” थोड़ेमें यही अनुमान निकलता है, कि कर्म छोड़नेका यह कारण नहीं हो सकता, कि “ वह हमें अनावश्यक है। ” किंतु जब कर्म अपरिहार्य है तब शास्त्रमे प्राप्त अपरिहार्य कर्मोंको स्वार्थत्यागबुद्धिसे करतेही रहना चाहिये - यही गीताका कथन है और यदि प्रकरणकी समताकी दृष्टिसे देखें, तोभी यही अर्थ लेना पडता है। कर्मसंन्यास और कर्मयोग, इन दोनोंमें जो बड़ा अंतर है, वह यही है। संन्यासपक्षवाले कहते हैं, कि “ तुझे कुछ कर्तव्य शेष नहीं बचा है, इससे तू कुछभी न कर।” और गीताका (अर्थात् कर्मयोग) कथन है, कि “ तुझे कुछ कर्तव्य शेष नहीं बचा है इसीलिये तुझे जो कुछ करना है, वह सब स्वार्थसंबंधी वासना छोड़कर अनासक्त बुद्धिसे कर।” अब प्रश्न यह है, कि एकही हेतु वाक्यसे इस प्रकार भिन्न भिन्न दो अनुमान क्यों निकले? इसका उत्तर इतनाही है, कि गीता कर्मोंको अपरिहार्य मानती है, इसलिये गीताके तत्त्वविचारके अनुसार यह अनुमान निकलही नहीं सकता, कि “ कर्म छोड़ दे।” अतएव 'तुझे अनावश्यक है” इस हेतु- वाक्यसेही गीतामें यह अनुमान किया गया है, कि स्वार्थबुद्धि छोड़कर कर्म कर। वसिष्ठजीने योगवासिष्ठमें श्रीरामचंद्रको सब ब्रह्मज्ञान बतलाकर निष्कामकर्मकी ओर प्रवृत्त करनेके लिये जो युक्तियाँ बतलाईं है, वेभी इसी प्रकारकी हैं। योग- वासिष्ठके अंतमें भगवद्गीताका उपर्युक्त सिद्धान्तही अक्षरशः आ गया है (यो. ६ उ. १९९; २१६. १४; गीता ३. १९ के अनुवादपर हमारी टिप्पणी देखो)। योगवासिष्ठके समानही बौद्धधर्मके महायान पंथके ग्रंथोंमेंभी इस संबंधमें गीताका अनुवाद किया गया है। परंतु विषयांतर होनेके कारण उसकी चर्चा यहाँ नहीं हो जा सकती; हमने इसका विचार आगे परिशिष्ट प्रकरणमें कर दिया है। आत्मज्ञान होनेसे 'मैं' और 'मेरा' यह अहंकारकी भाषाही शेष नहीं रहती (गीता १८. १६, २६) एवं इसीसे ज्ञानी पुरुषको 'निर-मम' कहते हैं। निर्ममका अर्थ “ मेरा मेरा (मम) न कहनेवाला” है। ज्ञानी पुरुषका वर्णन करते हुए, श्रीज्ञानेश्वर महाराजने इसी अर्थको अपने काव्यम व्यक्त किया है। परंतु भूल न जाना चाहिये, कि यद्यपि ब्रह्मज्ञानसे 'मैं' और 'मेरा' यह अहंकारदर्शक भाव छूट जाता है, तथापि उन दों शब्दोंके बदले 'जगत्' और 'जगत्का' - अथवा भक्तिपक्षमें 'परमेश्वर' और 'परमेश्वरका' - ये शब्द आ जाते है। संसारका प्रत्येक सामान्य मनुष्य अपने समस्त व्यवहार 'मेरा' या 'मेरे लिये'ही समझकर किया करता है। परंतु ज्ञानी होनेपर, ममत्वकी वासना छूट जानेके कारण अब वह इस बुद्धिसे (निर्मम बुद्धिसे) उन व्यवहारोंको करने लगता है, कि ईश्वरनिर्मित संसारके समस्त व्यवहार परमेश्वरके
संन्यास और कर्मयोग ३२७ है; और उनको करनेके लियेही ईश्वरने हमें उत्पन्न किया है। अज्ञानी और ज्ञानीमें यही तो भेद है (गीता ३. २३, २८)। गीताके इस सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे ज्ञात हो जाता है, कि "योगारूढ पुरुषके लिये आगे शमही कारण होता है" (गीता ६. ३ और उसपर हमारी टिप्पणी देखो)। इस श्लोकका सरल अर्थ क्या होगा। गीताके टीकाकार कहते हैं, कि इस श्लोकमें कहा गया है, कि योगारूढ पुरुष आगे (ज्ञान हो जानेपर) शम अर्थात् शांतिको स्वीकार करे; और कुछ न करे। परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। शम मनकी शांति है और उसे अंतिम 'कार्य' न कहकर इस श्लोकमें यह कहा है, कि शम अथवा शांति दूसरे किसीका कारण है - शमः कारणमुच्यते। अब शमको 'कारण' मानकर देखना चाहिये, कि आगे उसका 'कार्य' क्या है ? पूर्वापर संदर्भपर विचार करनेसे यही निष्पन्न होता है, कि वह कार्य 'कर्म'ही है। और तब इस श्लोकका अर्थ ऐसे होता है, कि योगारूढ पुरुष अपने चित्तको शांत करें, तथा उस शांति या शमसेही अपने सब अगले व्यवहार करे, टीकाकारोंके कथनानुसार यह अर्थ नहीं किया जा सकता, कि "योगारूढ पुरुष कर्म छोड़ दे।" इसी प्रकार 'सर्वारंभ परित्यागी' और 'अनिकेतः' प्रभृति पदोंका अर्थभी कर्मत्याग- विषयक न करके, फलाशात्याग-विषयकही करना चाहिये। गीताके अनुवादमें (उन स्थलोंपर जहाँ ये पद आये हैं) हमने टिप्पणीमें यह बात खोल दी है। भगवानने यह सिद्ध करनेके लिये - कि ज्ञानी पुरुषकोभी फलाशा त्याग कर चातुर्वर्ण्य आदि सब कर्म यथाशास्त्र करते रहना चाहिये - अपने अतिरिक्त दूसरा उदाहरण जनकका दिया है। जनक एक बड़ेही कर्मयोगी थे। उनकी स्वार्थबुद्धिके छूटनेका परिचय उन्हींके मुखसे यों है - "मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन" (मभा. शां. २७५. ४; २१९. ५०) - मेरी राजधानी मिथिलाके जल जाने परभी मेरी कुछ हानि नहीं! इस प्रकार अपना स्वार्थ अथवा लाभालाभ किसी प्रकार न रहनेपरभी राज्यके समस्त व्यवहार करनेका कारण बतलाये हुए, जनक स्वयं कहते हैं :- देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह। इत्यर्थं सर्व एवैते समारम्भा भवन्ति वै ॥ "देव, पितर, सर्वभूत (प्राणी) और अतिथियोंके लिये ये समस्त व्यवहार जारी हैं, मेरे लिये नहीं" (मभा. अश्व. ३२. २४)। अपना कोई कर्तव्य शेष न रहनेपर, अथवा अपने लिये किसी वस्तुके पानेकी वासना न रहने परभी यदि जनक-श्रीकृष्ण जैसे महात्मा इस जगतका कल्याण करनेके लिये प्रवृत्त न होंगे, तो कहना न होगा कि यह संसार उत्सन्न (ऊजड़) हो जायगा - "उत्सीदेयुरिमे लोकाः" (गीता ३. २४)। कुछ लोगोंका कहना है, कि गीताके इस सिद्धान्तमें - कि "फलाशा छोड़नी चाहिये; सब प्रकारकी इच्छाओंको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं" - और वासना- क्षयके सिद्धान्तमें, बहुत भेद नहीं कर सकते। क्योंकि चाहे वासना छूटे, चाहे फलाशा
३२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र छूटे; दोनों ओर कर्म करनेकी प्रवृत्ति होनेके लिये कुछभी कारण नहीं दीख पड़ता; इससे चाहे जिस पक्षको स्वीकार करें, अंतिम परिणाम - कर्मका छूटना - ही है। परंतु यह आक्षेप अज्ञानमूलक है, क्योंकि 'फलाशा' शब्दका ठीक ठीक अर्थ न जाननेके कारणही यह उत्पन्न हुआ है। फलाशा छोड़नेका अर्थ यह नहीं, कि सब प्रकारकी इच्छाओंको छोड़ देना चाहिये अथवा यह बुद्धि या भाव होना चाहिये, कि मेरे कर्मोंका फल किसीको कभी न मिले, और यदि मिले तो उसे कोईभी न ले; प्रत्युत पाँचवें प्रकरणमे पहलेही हम कह चुके हैं, कि "अमुक फल पानेके लियेही मैं यह कर्म करता हूँ" - इस प्रकारकी फलविषयक ममतायुक्त आसक्तिको या बुद्धिके आग्रहको 'फलाशा', 'संग' या 'काम' ये नाम गीतामें दिये गये हैं। यदि कोई मनुष्य फल पाने- की इच्छा, आग्रह या वृथा आसक्ति न रखे; तो उससे यह मतलब नहीं पाया जाता, कि वह अपने प्राप्त कर्मको, केवल कर्तव्य समझकर, करनेकी बुद्धि और उत्साह- कोभी इस आग्रहके साथ-ही-साथ नष्ट कर डाले। अपने फायदेके सिवा इस संसारमें जिन्हें दूसरा कुछ नहीं दीख पड़ता और जो पुरुष केवल फलकी इच्छासेही कर्म करनेमें निमग्न रहते हैं, उन्हें सचमुच फलाशा छोड़कर कर्म करना शक्य न जँचेगा, परंतु जिनकी बुद्धि ज्ञानसे सम और विरक्त हो गई है, उनके लिये कुछ कठिन नहीं है। पहले तो यह समझही गलत है, कि हमें किसी कामका जो फल मिलता है, वह केवल हमारेही कर्मका फल होता है। यदि पानीकी द्रव्यता या अग्निकी उष्णताकी सहायता न मिले तो मनुष्य कितनाही सिर क्यों न खपावे, उसके प्रयत्नसे पाक-सिद्धि कभी हो नहीं सकेगी - भोजन पकेगाही नहीं; और अग्नि आदिमें इन गुणधर्मोंका होना या न होना मनुष्यके बस या उपायकी बात नहीं है। इसीमे कर्मसृष्टिके इन स्वयंसिद्ध विविध व्यापारों अथवा धर्मोंका पहले यथाशक्ति ज्ञान प्राप्त कर, मनुष्यको उसी ढंगसे अपने व्यवहार करने पड़ते हैं, जिसमे कि वे व्यापार अपने प्रयत्नके अनुकूल हों। इससे कहना चाहिये, कि मनुष्यको प्रयत्नोंके जो फल मिलता है, वह केवल उसकेही प्रयत्नोंका फल नहीं है; वरन् उसका कर्म और कर्म-सृष्टिके तदनुकूल अनेक स्वयंसिद्ध धर्म - इन दोनोंके संयोगका मात्र वह फल है। परंतु मनुष्यके प्रयत्नोंकी सफलताके लिये इस प्रकार जिन नानाविध सृष्टि-व्यापारोंकी अनुकूलता आवश्यक है, उन सबका कई बार मनुष्यको यथार्थ ज्ञान नहीं रहता; और कुछ स्थानोंपर तो वह होनाभी शक्य नही है - इसेही 'दैव' कहते हैं। यदि फल-सिद्धिके लिये ऐसे सृष्टि-व्यापारोंकी सहायता अत्यंत आवश्यक है, जो हमारे अधिकारमें नहीं और जिन्हें हम जानतेभी नहीं हैं; तो आगे कहना नहीं होगा, कि ऐसा अभिमान करना मूर्खता है, कि "केवल अपने प्रयत्नसेही मैं अमुक बात कर लूंगा" (गीता १८. १४-१६)। क्योंकि कर्मसृष्टिके ज्ञात और अज्ञात व्यापारोंका मानवी प्रयत्नोंसे संयोग होनेपर जो फल प्राप्त होता हो, वह केवल कर्मके नियमोंमेही हुआ करता है, इसलिये हम फलकी अभिलाषा करें या न करें - फलसिद्धिमें उसमे कोई फ़र्क
नहीं पड़ता; हमारी फलाशा निःसंदेह हमें दुःखकारक हो जाती है। परंतु स्मरण रहे, कि मनुष्यके लिये आवश्यक बात अकेले सृष्टिव्यापार स्वयं अपनी ओरसे संघटित होकर नहीं कर देते। चनेकी रोटीको स्वादिष्ट बनानेके लिये जिस प्रकार आटेमें थोड़ासा नमकभी मिलाना पड़ता है, उसी प्रकार कर्मसृष्टिके इन स्वयंसिद्ध व्यापारोंको मनुष्योंके लाभकारी होनेके लिये उनमें मानवी प्रयत्नकी थोड़ीसी मात्रा मिलानी पड़ती है। इसीसे ज्ञानी और विवेकी पुरुष सामान्य लोगोंके समान फलकी आसक्ति अथवा अभिलाषा तो नहीं रखते; किंतु वे लोग जगत्के व्यवहारकी सिद्धिके लिये प्रवाहपतित कर्मका (अर्थात् कर्मके अनादि प्रवाहमें शास्त्रसे प्राप्त यथाधिकार कर्मका) जो छोटा-बड़ा भाग मिले, उसेही शांतिपूर्वक, कर्तव्य समझ- कर किया करते हैं और फल पानेके लिये कर्मसंयोगपर अथवा भक्तिदृष्टिसे परमेश्वरकी इच्छापर निर्भर होकर निश्चिंत रहते हैं। "तेरा अधिकार केवल कर्म करनेका है, फल होना तेरे अधिकारकी बात नहीं" (गीता २. ४७) इत्यादि उपदेश जो अर्जुनको किया गया है, उसका रहस्यभी यही है। इस प्रकार फलाशा को त्यागकर कर्म करते रहनेपर आगे कुछ कारणोंसे कदाचित् वह कर्म निष्फल हो जाय तोभी निष्फलताका दुःख माननेके लिये हमें कोई कारणही नहीं रहता, क्योंकि हम तो अपने अधिकारका काम कर चुके हैं। उदाहरण लीजिये; वैद्यकशास्त्रका स्पष्ट मत है, कि आयुकी डोर (अर्थात् शरीरका पोषण करनेवाली नैसर्गिक धातुओंकी शक्ति) सबल रहे बिना निरी औषधियोंसे रोगीको कभी फायदा नहीं होता; और इस डोरकी सबलता अनेक प्राक्तन अथवा पुश्तैनी संस्कारोंका फल है, अतः यह बात वैद्यके हाथों होने योग्य नहीं; और उसे इसका निश्चयात्मक ज्ञान होभी नहीं सकता कि वह कितनी सबल है। ऐसा होते हुएभी हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि रोगी लोगोंको औषधि देना अपना कर्तव्य समझ कर केवल परोपकारकी बुद्धिसे वैद्य अपनी बुद्धिके अनुसार हजारों रोगियोंको दवाई दिया करता है। इस प्रकार निष्काम बुद्धिसे अपना काम करनेपर यदि कोई रोगी चंगा न हो, तो उससे वह वैद्य उद्विग्न नहीं होता, बल्कि बड़े शांत चित्तसे यह शास्त्रीय नियम ढूंढ निकालता है, कि अमुक रोगमें अमुक औषधिसे सैंकडों इतने रोगियोंको आराम होता है। परंतु इसी वैद्यका लड़का जब बीमार पड़ता है, तब उसे औषधि देते समय वह आयुष्यकी डोरवाली बात भूल जाता है और इस ममतायुक्त फलाशासे उसका चित्त घबड़ा जाता है कि "मेरा लड़का अच्छा हो जाय।" इसीसे उसे या तो दूसरा वैद्य बुलाना पड़ता है, या कमसे कम दूसरे वैद्यकी सलाहकी आवश्यकता होती है। इस छोटे-से उदाहरणसे ज्ञात होगा, कि कर्मफलमें ममतारूप आसक्ति किसे कहना चाहिये, और फलाशा न रहने- परभी निरी कर्तव्यबुद्धिसे कोईभी काम किस प्रकार किया जा सकता है। इस प्रकार यह सच है कि फलाशाको नष्ट करनेके लिये ज्ञानकी सहायतासे मनमें वैराग्यका भाव अटल होना चाहिये, परंतु किसी कपड़ेका रंग (राग) दूर करनेके लिये जिस
३३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकार कोई कपड़ेको फाड़ना उचित नहीं समझता, उसी प्रकार यह कहनेसे, कि "किसी कर्ममें आसक्ति, काम, संग वा राग अथवा प्रीति न रखो " उस कर्मकोही छोड़ देना ठीक नहीं। वैराग्यसे कर्म करनाही यदि अशक्य हो, तो बात निराली है। परंतु हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि वैराग्यसे भली भांति कर्म किये जा सकते हैं; इतनाही क्यों ? यहभी प्रकट है, कि कर्म किसीसे छूटतेही नहीं। इसीलिये अज्ञानी लोग जिन कर्मोंको फलाशासे किया करते हैं, उन्हेंही ज्ञानी पुरुष ज्ञानप्राप्तिके बादभी लाभ- अलाभ तथा सुखदुःखको एकसा मान कर (गीता २. ३८) धैर्य एवं उत्साहसे, किंतु शुद्ध बुद्धिसे अर्थात् फलके विषयमें विरक्त या उदासीन रहकर (गीता १८. २६), केवल कर्तव्य मान कर, अपने अपने अधिकारानुसार शांत चित्तसे करते रहें (गीता ६. ३) - यही नीति और मोक्षकी दृष्टिसे उत्तम जीवनक्रमका सच्चा तत्त्व है। अनेक स्थितप्रज्ञ, महाभगवद्भक्त और परम ज्ञानी पुरुषोंने - एवं स्वयं भगवान्नेभी इसी मार्गका स्वीकार किया है और भगवद्गीता पुकारकर कहती है, कि इस कर्मयोग-मार्गमेंही पराकाष्ठाका पुरुषार्थ है, इसी 'योग'से परमेश्वरका भजनपूजन होता है; और अतमें सिद्धिभी मिलती है (गीता १८. ४६)। इतने परभी यदि कोई स्वयं जानबूझ कर गैरसमझ कर ले, तो उसे दुर्दैवी कहना चाहिये। स्पेन्सरसाहबको यद्यपि अध्यात्म दृष्टि संमत न थी, तथापि उन्होंनेभी अपने "समाज- शास्त्रका अभ्यास" नामक ग्रंथके अंतमें गीताके समानही यह सिद्धान्त किया है:- यह बात आधिभौतिक रीतिसेभी सिद्ध है, कि इस जगतमें किसीभी कामको एकदम कर गुजरना शक्य नहीं, उसके लिये कारणभूत और आवश्यक दूसरी हजारों बातें पहले जिस प्रकार हुई होंगी, उसी प्रकार मनुष्यके प्रयत्न सफल, निष्फल या न्यूना- धिक सफल हुआ करते हैं। इस कारण यद्यपि साधारण मनुष्य किसीभी कामके करनेमें फलाशासेही प्रवृत्त होते हैं. तथापि बुद्धिमान् पुरुषको शांति और उत्साहसे, फलसंबंधी आग्रह छोड़कर अपना कर्तव्य करते रहना चाहिये।* यद्यपि यह सिद्ध हो गया, कि ज्ञानी पुरुष इस संसारमें अपने प्राप्त कर्मोंको, फलाशा छोड़कर निष्काम बुद्धिसे आमरण अवश्य करता रहे; तथापि यह बतलाये विना कर्मयोगका विवेचन पूरा नहीं होता, कि ये कर्म किससे और किस लिये प्राप्त होते हैं ? अतएव भगवानने कर्मयोगके समर्थनार्थ अर्जुनको अंतिम और महत्त्वका उपदेश दिया है, कि "लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि" (गीता ३. २०)
- लोकसंग्रहकी ओर दृष्टि दे करभी तुझे कर्म करनाही उचित है। लोकसंग्रहका यह अर्थ नहीं, कि कोई ज्ञानी पुरुष "मनुष्योंका केवल जमघट इकट्ठा करे" अथवा
- " Thus admitting that for the fanatic, some wild anticipa- tion is needful as a stimulus, and recognizing the usefulness of his delusion as adapted to his particular nature and his particular function, the man of higher type must be content with greatly
संन्यास और कर्मयोग ३३१ यहभी अर्थ नहीं, कि “स्वयं कर्मत्यागका अधिकारी होनेपरभी इसलिये कर्म करनेका ढोंग करे, कि अज्ञानी मनुष्य कहीं कर्म न छोड़ बैठें; और उन्हें अपनी (ज्ञानी पुरुष- की) कर्मतत्परता अच्छी लगे।” क्योंकि, गीताका यह सिखलानेका हेतु नहीं, कि लोग अज्ञानी या मूर्ख बने रहें; अथवा उन्हें अज्ञानी बनाये रखनेके लिये ज्ञानी पुरुष कर्म करनेका ढोंग किया करे। ढोंग तो दूरही रहा; परंतु “लोग तेरी अपकीर्ति गावेंगें” (गीता २. ३४) इत्यादि सामान्य लोगोंको जँचनेवाली युक्तियोंसे जब अर्जुनका समाधान न हुआ, तब भगवान्, उन युक्तियोंसेभी अधिक जोरदार और तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे अधिक बलवान् कारण, अब कह रहे हैं। इसलिये कोशमें 'संग्रह' शब्दके जमा करना, इकट्ठा करना, रखना, पालना, नियमन करना प्रभृति जो अर्थ दिये हैं, उन सबको यथासंभव ग्रहण करना पड़ता है। और ऐसा करनेसे “लोगोंका संग्रह करना” या यह अर्थ होता है, कि “उन्हें एकत्र संबद्ध कर, इस रीतिसे उनका पालनपोषण और नियमन करे, कि उनकी परस्पर अनुकूलतासे उत्पन्न होनेवाली सामर्थ्य उनमें आ जावे; एवं उसके द्वारा उनकी सुस्थितिको स्थिर रखकर आगे उन्हें श्रेयःप्राप्तिके मार्गमें लगा दे।” “राष्ट्रका संग्रह” ये शब्द इसी अर्थमें मनुस्मृतिमें (मनु. ७. ११४) आये हैं; शांकरभाष्यमें उपरोक्त शब्दकी व्याख्या यों है- “लोकसंग्रह = लोकस्योन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणम्।” इससे दीख पड़ेगा, कि संग्रह शब्दका जो हम ऐसा अर्थ करते हैं कि अज्ञानसे मनमाना बर्ताव करनेवाले लोगोंको ज्ञानवान् बनाकर सुस्थितिमें एकत्र रखना और आत्मोन्नतिके मार्गमें लगाना; वह अपूर्व या निराधार नहीं है। यह संग्रह शब्दका अर्थ हुआ; परंतु यहाँ यहभी बतलाना चाहिये कि 'लोकसंग्रह' में 'लोक' शब्द केवल मनुष्यवाची नहीं है। यद्यपि यह सच है, कि जगत्के अन्य प्राणियोंकी अपेक्षा मनुष्य श्रेष्ठ है; और इसीसे मानवजातिके कल्याणकाही प्रधानतासे 'लोकसंग्रह' शब्दमें समावेश होता है, तथापि भगवान्कीही ऐसी इच्छा है, कि भूलोक, मर्तृलोक, पितृलोक और देवलोक प्रभृति जो अनेक लोक अर्थात् जगत् भगवान्ने बनाये हैं, उनकाभी भली भाँति धारण- पोषण हो; और वे सभी अच्छी रीतिसे चलते रहें; इसलिये कहना पड़ता है, कि moderated expectations, while he perseveres with undiminished efforts. He has to see how comparatively little can be done, and yet to find it worthwhile to do that little: so uniting philanthropic enegry with philosophic calm.”- Spencer’s Study of Sociology,- 8th Ed., p. 403. (The italics are ours.) इस वाक्यमें fanatics के स्थान में “प्रकृतिके गुणोंसे विमूढ” (गीता ३. २९) या 'अहंकारविमूढ' (गीता ३. २७) अथवा भास कविक़ा 'मूर्ख' शब्द और man of higher type के स्थानमें 'विद्वान्' (गीता ३. २५) एवं greatly moderated expectations के स्थानमें 'फलो- दासीन्य' अथवा 'फलाशात्याग' इन समानार्थी शब्दोंकी योजना करनेसे ऐसा दीख पड़ेगा कि स्पेन्सरसाहबने मानो गीताकेही सिद्धान्तका अनुवाद कर दिया है।
३३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इतना सब व्यापक अर्थ 'लोकसंग्रह' पदसे यहाँ विवक्षित है, कि मनुष्यलोकके साथही इन सब लोकोंके व्यवहारभी सुस्थितिसे चलें ( लोकानां संग्रहः ) । जनकके किये अपने कर्तव्यके वर्णनमें - जो पहले लिखा जा चुका है - देव और पितरोंका उल्लेख है, एवं भगवद्गीताके तीसरे अध्यायमें तथा महाभारतके नारायणीयोपाख्यानमें जिस यज्ञचक्रका वर्णन है, उसमेंभी कहा है, कि देवलोक और मनुष्यलोक, दोनों- हीके धारणा-पोषणके लिये ब्रह्मदेवने यज्ञ उत्पन्न किया ( गीता ३. १०-१२ ) । इससे स्पष्ट होता है, कि भगवद्गीतामें 'लोकसंग्रह' पदमें इतना अर्थ विवक्षित है, कि अकेले मनुष्य-लोककाही नहीं; किंतु देवलोक आदि सब लोकोंकाभी उचित धारण-पोषण होवें और वे परस्पर एक दूसरेका श्रेय संपादन करें । सारी सृष्टिका पालन-पोषण करके लोकसंग्रह करनेका यह जो भगवानका अधिकार है, वही पुरुषके ज्ञानी हो जानेपर उसे अपने ज्ञानके कारण प्राप्त हुआ करता है। ज्ञानी पुरुषको जो बात प्रामाणिक जँचती है, अन्य लोगभी उसीही प्रमाण मान कर तदनुकूल व्यव- हार किया करते हैं ( गीता ३. २१) । क्योंकि साधारण लोगोंकी समझ है, कि शांत चित्त और समबुद्धिसे यह विचारनेका काम ज्ञानीहीका है, कि संसारका धारण और पोषण कैसे होगा ? एवं तदनुसार धर्म-प्रबंधकी मर्यादा बना देनाभी उसीका काम है। इस समझमें कुछ भूलभी नहीं है। और यहभी कह सकते हैं, कि सामान्य लोगोंकी समझमें ये बातें भली भांति नही आ सकतीं, तो इसीलिये वे ज्ञानी पुरुषोंके भरोसे रहते हैं। इसी अभिप्रायको मनमें लाकर शांतिपर्वमें युधिष्ठिरसे भीष्मने कहा है :- लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ॥ “ लोकसंग्रहकारक और सूक्ष्म प्रसंगोंपर धर्मार्थका निर्णय कर देनेवाला साधु पुरुषोंका उत्तम चरित्र स्वयं ब्रह्मदेवनेही बनाया है” ( मभा. शां. २५८. २५) । 'लोकसंग्रह' कुछ ठाले बैठेकी बेगार, ढकोसला या लोगोंको अज्ञानमें डाले रखनेकी तरकीब नहीं है; ज्ञानयुक्त कर्मके संसारसे नष्ट हो जानेसे जगत्के नष्ट हो जानेकी संभावना है, इसलिये यही सिद्ध होता है, कि ब्रह्मदेवर्निर्मित साधुपुरुषोंके कर्तव्योंमें 'लोक- संग्रह' एक प्रधान कर्तव्य है। और इस भगवद्वचनका भावार्थभी यही है, कि “ मैं यह काम न करूँ, तो ये समस्त लोक अर्थात् जगत् नष्ट हो जावेंगे” (गी. ३. २४)। ज्ञानी पुरुष सब लोगोंके नेत्र हैं और यदि वे अपना काम छोड़ देंगे, तो सारी दुनिया अंधी हो जायगी; और इस संसारका सर्वतः नाश हुए बिना न रहेगा । ज्ञानी पुरुषों- कोही उचित है, कि लोगोंको ज्ञानवान् कर उन्नत बनावें । परन्तु यह काम सिर्फ जीभ हिला देनेसे अर्थात् कोरे उपदेशसे कभी नहीं होता। क्योंकि, जिन्हें सदाचरणकी आदत नहीं और जिनकी बुद्धिभी पूर्ण शुद्ध नहीं रहती, उन्हें यदि कोरा ब्रह्मज्ञान सुनाया जाय, तो वे लोग उस ज्ञानका दुरुपयोग इस प्रकार करते देखे गये हैं, कि
संन्यास और कर्मयोग [दाहिनी ओर: ३३३]
तेरासो मेरा, और मेरा तो मेरा है ही।" इसके सिवा, किसीके उपदेशकी सत्यताकी जाँचभी तो लोग उसके आचरणमेही किया करते हैं। इसलिये यदि ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म न करेगा, तो वह सामान्य लोगोंको आलसी बनानेका एक बहुत बड़ा कारण हो जायगा। इसेही 'बुद्धिभेद' कहते हैं; और यह बुद्धिभेद न होने पावे, तथा सब लोग सचमुच निष्काम होकर अपना कर्तव्य करनेके लिये जागृत हो जावें, इसी हेतु संसारमेंही रहकर अपने कर्मोंसे सब लोगोंको सदाचरणकी – निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेकी – प्रत्यक्ष शिक्षा देनाही ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य (ढोंग नहीं) हो जाता है। अतएव गीताका कथन है, कि उसे (ज्ञानी पुरुषको) कर्म छोड़नेका अधिकार कभी प्राप्त नहीं होता और अपने लिये न सही, परंतु लोकसंग्रहार्थ चातुर्वर्ण्यके सब कर्म अधिकारानुसार उसे करनेही चाहिये। किंतु संन्यासमार्ग- वालोंका मत है, कि ज्ञानी पुरुषको चातुर्वर्ण्यके कर्म निष्काम बुद्धिसेभी करनेकी कुछ जरूरत नहीं – यही क्यों ? करनेभी नहीं चाहिये; इसलिये इस संप्रदायके टीका- कार गीताके – "ज्ञानी पुरुषको लोकसंग्रहार्थ कर्म करने चाहिये" – इस सिद्धान्तका कुछ गड़बड़ अर्थ लगाकर – यहाँतक कहनेके लिये तैयारसे हो गये हैं, कि स्वयं भगवान्भी प्रत्यक्ष नहीं, तो पर्यायसे ढोंगका, उपदेश करते हैं। परंतु पूर्वापर संदर्भसे प्रकट है, कि गीताके लोकसंग्रह शब्दका यह ढुलमुल या पोचा अर्थ सच्चा नहीं। गीताको तो यह मतही मंजूर नहीं, कि ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़नेका अधिकार प्राप्त होता है; और इसके प्रमाणमें गीतामें जो कारण दिये गये हैं, उनमें लोकसंग्रह एक मुख्य कारण है। इसलिये पहले यह मान कर, कि ज्ञानी पुरुषके कर्म छूट जाते हैं, लोकसंग्रह पदका ढोंगी अर्थ करना सर्वथा अन्याय्य है। इस जगत्में मनुष्य केवल अपनेही लिये उत्पन्न नहीं हुआ है। यह सच है, कि सामान्य लोग अज्ञानतः स्वार्थमेंही फँसे रहते हैं। परंतु "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) – मैं सब भूतोंमें हूँ; और सब भूत मुझमें हैं – इस रीतिसे जिसको समस्त संसारही आत्मभूत हो गया है, उसका यह कहना अपने मुखसे अपने ज्ञानमें बट्टा लगाना है, कि "मुझे तो मोक्ष मिल गया, अब यदि लोग दुःखी हों, तो मुझे इसकी क्या परवाह ?" ज्ञानी पुरुषका आत्मा क्या कोई स्वतंत्र व्यक्ति है? उसके आत्मापर जबतक अज्ञानका पर्दा पड़ा था, तबतक 'मैं' और 'लोग' यह भेद कायम था। परंतु ज्ञानप्राप्तिके बाद सब लोगोंका आत्माही उसका आत्मा है। इसीसे योग- वासिष्ठमें रामसे वसिष्ठने कहा है :- यावल्लोकपरामर्शो निरूढो नास्ति योगिनः । तावद्रूढसमाधित्वं न भवत्येव निर्मलम् ॥ "जबतक लोगोंके परामर्श लेनेका (अर्थात् लोकसंग्रहका) काम थोड़ाभी बाकी है – समाप्त नहीं हुआ है – तबतक यह कभी नहीं कह सकते, कि योगारूढ पुरुषकी स्थिति निर्दोष है" (यो. ६; पृ. १२८. ९७)। उसका केवल अपनेही समाधि-
३३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखमें डूब जाना मानो एक प्रकारसे अपनाही स्वार्थ साधना है। संन्यासमार्गवाले इस बातकी ओर दुर्लक्ष करते हैं यही उनकी युक्ति-प्रयुक्तियोंका मुख्य दोष है। भगवान्की अपेक्षा किसीकाभी अधिक ज्ञानी, अधिक निष्काम या अधिक योगारूढ होना शक्य नहीं। परंतु जब स्वयं भगवान्भी "साधुओंका संरक्षण, दुष्टोंका नाश और धर्म-संस्थापना" ऐसे लोकसंग्रहके काम करनेके लियेही समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता ४. ८), तब लोकसंग्रहके कर्तव्यको छोड़ देनेवाले ज्ञानी पुरुषका यह कहना सर्वथा अनुचित है, कि "जिस परमेश्वरने इन सब लोगोंको उत्पन्न किया है, वह उनका जैसे चाहेगा वैसे धारण-पोषण करेगा, उधर देखना मेरा काम नहीं है।" क्योकि ज्ञानप्राप्तिके बाद 'परमेश्वर', 'मैं' और 'लोग' - यह भेदही नहीं रहता; और यदि रहे, तो उसे ढोंगी कहना चाहिये; ज्ञानी नहीं। यदि ज्ञानसे ज्ञानी पुरुष परमेश्वररूपी हो जाता है, तो परमेश्वर जो काम करता है, उसे परमे- श्वरके समान अर्थात् निस्संगबुद्धिसे करनेकी आवश्यकतासे ज्ञानी पुरुष कैसे छूटेगा (गीता ३. २२; ४. १४, १५) ; इसके अतिरिक्त, परमेश्वरको जो कुछ करना है, वहभी ज्ञानी पुरुषके रूपसे या उसके द्वाराही करेगा। अतएव जिसे परमे- श्वरके स्वरूपका ऐसा अपरोक्ष ज्ञान हो गया है, कि "सब प्राणियोंमें एक आत्मा है" उसके मनमें सर्वभूतानुकंपा आदि उदात्त वृत्तियाँ पूर्णतासे जागृत रह कर स्वभावसेही उसके मनकी प्रवृत्ति लोककल्याणकी ओर हो जानी चाहिये। इसी अभिप्रायसे तुकाराममहाराज साधुपुरुषके लक्षण इस प्रकार बतलाते हैं- "जो दीनदुखियोंको अपनाता है, वही साधु है- ईश्वरभी वहीं (उसीके पास) है" (तु. गा. ९६०. १, २)। अथवा "जिसने परोपकारमें अपनी शक्तियोंका व्यय किया है, उसीने आत्मस्थितिको जाना है" (तु. गा. ४५६२)।* और अंतमें, संत- जनोंका (अर्थात् भक्तिसे परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान पानेवाले महात्माओंका) वर्णन इस प्रकार किया है- "संतोंकी विभूतियाँ जगत्के कल्याणहीके लिये हुआ करती हैं। वे लोग परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" भर्तृहरिनेभी इस प्रकार वर्णन किया है, कि परार्थही जिसका स्वार्थ हो गया है, वही पुरुष साधुओंमें श्रेष्ठ है - "स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः।" क्या मनु आदि शास्त्रप्रणेता ज्ञानी न थे? परंतु उन्होंने तृष्णादुःखको बड़ा भारी हौवा मानकर तृष्णाके साथ-ही-साथ परोपकार-बुद्धि आदि सभी उदात्त वृत्तियोंको नष्ट नहीं कर दिया - उन्होंने तो लोकसङ्ग्रहकारक चातुर्वर्ण्य प्रभृति शास्त्रीय मर्यादा बना देनेका
- इसी भावको कविवर बाबू मैथिलीशरण गुप्तने यों व्यक्त किया है :- वास उसीमें है विभुवरका है बस सच्चा साधु वही - जिसने दुखियोको अपनाया, बढ़ कर उनकी बाह गही। आत्मस्थिति जानी उसनेही परहित जिसने व्यथा सही, परहितार्थ जिनका वैभव है, है, उनमेही धन्य मही॥
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उपयोगी काम किया है, ब्राह्मणको ज्ञान, क्षत्रियको युद्ध, वैश्यको खेती, गोरक्षा और व्यापार अथवा शूद्रको सेवा - ये जो गुण-कर्म और स्वभावके अनुरूप भिन्न भिन्न धर्म शास्त्रोंमें वर्णित हैं, वे केवल किसी व्यक्तिकेही हितके लिये नहीं हैं; प्रत्युत मनुस्मृति ( मनु. १. ८७ ) में कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्यके व्यापारोंका विभाग लोकसंग्रहके लियेही इस प्रकार प्रवृत्त हुआ है कि सारे समाजके बचावके लिये कुछ पुरुषोंको प्रतिदिन युद्धकलाका अभ्यास करके सदा तैयार रहना चाहिये; और कुछ लोगोंको खेती, व्यापार एवं ज्ञानार्जन प्रभृति उद्योगोंसे समाजकी अन्यान्य आवश्य- कताएँ पूर्ण करनी चाहिये। गीताका (गीता ४. १३; १८. ४१) अभिप्रायभी ऐसाही है। यह पहले कहाही जा चुका है, कि इस चातुर्वर्ण्य धर्ममेंसे यदि कोई एकभी धर्म डूब जाय, तो समाज उतनाही पंगु हो जायगा; और अंतमें उसका नाश हो जानेकीभी संभावना रहती है। तथापि स्मरण रहे, कि उद्योगोंके विभागकी यह व्यवस्था एकही प्रकारकी नहीं रहती है। प्राचीन यूनानी तत्त्वज्ञ प्लेटोने एतद्विषयक अपने ग्रंथमें और अर्वाचीन फ्रेंच शास्त्रज्ञ कोंटने अपने 'आधि- भौतिक तत्त्वज्ञान' में, समाज-धारणके लिये जो व्यवस्था सूचित की है, वह यद्यपि चातुर्वर्ण्यके सदृश्य है; तथापि इन ग्रंथोंको पढ़नेसे कोईभी जान सकेगा, कि उस व्यवस्थामें धर्मकी चातुर्वर्ण्य व्यवस्थासे कुछ-न-कुछ भिन्नता है। इनमेंसे कौन-सी समाज-व्यवस्था अच्छी है ? अथवा यह अच्छापन सापेक्ष है, और युगमानसे उसमें कुछ.फेरफार हो सकता है या नहीं ? - इत्यादि अनेक प्रश्न यहाँ उठते हैं; और आजकल तो पश्चिमी देशोंमें 'लोकसंग्रह' एक महत्त्वका शास्त्र बन गया है। परंतु गीताका तात्पर्य-निर्णयही हमारा प्रस्तुत विषय है, इसलिये यहाँ उन प्रश्नोंपर विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह बात निर्विवाद है, कि गीताके समयमें चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्था अनिवार्य रूपसे प्रचलित थी; और मूलतः 'लोकसंग्रह' करनेके हेतुसेही वह प्रवृत्ति की गई थी। इसलिये यही बात मुख्यतः यहाँ बतलानी है। गीताके 'लोकसंग्रह' पदका अर्थ यही होता है, कि लोगोंको प्रत्यक्ष दिखला दिया जावे, कि चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्थाके अनुसार प्राप्त अपने कर्म निष्काम बुद्धिसे किस प्रकार करने चाहिये ? ज्ञानी पुरुष समाजके न केवल नेत्रही हैं; वरन् गुरुभी हैं। इससे आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि उपर्युक्त प्रकारका लोकसंग्रह करनेके लिये, उन्हें अपने समयकी समाज-व्यवस्थामें यदि कोई न्यूनता जँचे, तो वे उसे श्वेतकेतुके समान देशकालानुरूप परिमार्जित करें; और सनमाजके धारण तथा पोषण शक्तिकी रक्षा करते हुए उसको उन्नतावस्थामें ले जानेका प्रयत्न करते रहें। इसी प्रकारका लोकसंग्रह करनेके लिये राजा जनक संन्यास न लेकर जीवनपर्यंत राज्य करते रहे; और मनुने पहला राजा बनना स्वीकार किया। एवं इसी कारणसे "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि" (गीता २. ३१) - स्वधर्मके अनुसार जो कर्म प्राप्त ह, उनके लिये रोना तुझे उचित नहीं - अथवा "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति
प्रकरण ७-९: क्षराक्षर विचार, मायावाद व कर्मविपाक
३३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किल्बिषम् ” (गीता १८. ४७) - स्वभाव और गुणोंके अनुरूप निश्चित चातु- र्वर्ण्य-व्यवस्थाके अनुसार नियमित कर्म करनेसे तुझे कोई पाप नहीं लगेगा - इत्यादि प्रकारसे चातुर्वर्ण्य कर्मके अनुसार प्राप्त युद्धको करनेके लिये गीतामें अर्जुनको बार- बार उपदेश किया गया है। यह कोईभी नहीं कहता, कि परमेश्वरका यथाशक्ति ज्ञान प्राप्त न करो। गीताकाभी सिद्धान्त है, कि इस ज्ञानको संपादन करनाही मनुष्यका इस जगदमें इतिकर्तव्य है। परंतु इससे आगे बढ़कर गीताका विशेष कथन यह है, कि अपने आत्माके कल्याणमेंही समाष्टिरूप आत्माके कल्याणार्थ यथाशक्ति प्रयत्न करनेकाभी समावेश होता है, इसलिये लोकसंग्रह करनाही ब्रह्मात्मैक्यज्ञानका सच्चा पर्यवसान है। तथापि यह बात नहीं, कि किसी पुरुष केवल ब्रह्मज्ञानी होनेसेही सब प्रकारके व्यावहारिक व्यापार अपनेही हाथसे कर डालने योग्य हो जाता हो। भीष्म और व्यास, दोनों महाज्ञानी और परम भगवद्भक्त थे। परंतु यह कोई नहीं कहता, कि भीष्मके समान व्यासनेभी लड़ाईका काम किया होता। अथवा देवताओंकी ओर देखें, तो वहांभी संसारके संहार करनेका काम शंकरके बदले विष्णुको सौंपा हुआ नहीं दीख पड़ता। मनकी निर्विषयताकी, सम और शुद्ध बुद्धिकी तथा आध्यात्मिक उन्नतिकी अंतिम सीढ़ी जीवन्मुक्तावस्था है, वह आधिभौतिक उद्योगोंकी दक्षताकी परीक्षा नहीं है। गीताके इसी प्रकरणमें यह विशेष उपदेश दुबारा किया गया है, कि स्वभाव और गुणोंके अनुरूप प्रचलित चातुर्वर्ण्य आदि व्यवस्थाओंके अनुसार जिस कर्मको हम जीवनभर करते चले आ रहे हैं, स्वभावके अनुसार उसी कर्म अथवा व्यवसायको ज्ञानोत्तरभी ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रहके निमित्त करता रहे; क्योंकि उसीमें उसके निपुण होनेकी संभावना है। यदि वह कोई औरही व्यापार करने लगेगा, तो उससे समाजकी हानि होगी (गीता ३. ३५; १८. ४७)। प्रत्येक मनुष्यमें ईश्वरनिर्मित प्रकृति, स्वभाव और गुणोंके अनुरूप जो भिन्न भिन्न प्रकारकी योग्यता होती है, उसेही अधिकार कहते हैं। और वेदान्तसूत्रमें कहा है, कि "इस अधिकारके अनुसार प्राप्त कर्मोंको, पुरुष ब्रह्मज्ञानी हो जानेपर भी, लोकसंग्रहार्थ मरणपर्यंत करता जावे, छोड़ न दे - यावदधिकारमवस्थितिरधिकारिणाम्" (वे. सू. ३. ३. ३२)। कुछ लोगोंका कथन है, कि वेदान्तसूत्रकर्ताकी यह उपपत्ति केवल बड़े अधिकारी पुरुषोंकोही उपयोगी है; और इस सूत्रके भाष्यमें उसके समर्थनार्थ जो उदाहरण दिये गये हैं, उनसे जान पड़ेगा, कि वे सभी उदाहरण व्यास प्रभृति बड़े बड़े अधिकारी पुरुषोंकेही हैं। परंतु मूल-सूत्रमें अधिकारकी छुटाई-बड़ाईके संबंधमें कुछभी उल्लेख नहीं है, इससे 'अधिकार' शब्दका मतलब छोटे-बड़े सभी अधिकारोंसे है। और यदि इस बातका सूक्ष्म तथा स्वतंत्र विचार करें, कि ये अधिकार किसको और किस प्रकार प्राप्त होते हैं, तो ज्ञात होगा, कि मनुष्यके साथही समाज और समाजके साथही मनुष्यको परमेश्वरने उत्पन्न किया है, इसलिये जिसे जितना बुद्धिबल, सत्ताबल, द्रव्यबल या शरीरबल स्वभावसेही हो अथवा स्वधर्मसे प्राप्त कर लिया जा सके,
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उसी हिसाबसे यथाशक्ति संसारके धारण और पोषण करनेका थोड़ा-बहुत अधिकार
- चातुर्वर्ण्य आदि अथवा अन्य गुण और कर्मविभागरूप सामाजिक व्यवस्थामे - प्रत्येकको जन्मसेही प्राप्त रहता है। किसी कलको, अच्छी रीतिसे चलानेके लिये बड़े चक्केके समानही, जिस प्रकार छोटे-से पहियेकीभी आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार समस्त संसारकी अपार घटनाओं अथवा कार्योंके सिलसिलेको व्यवस्थित चलाते रखनेके लिये व्यास आदिकोंके बड़े अधिकारके समानही इस बातकीभी आवश्यकता है, कि अन्य मनुष्योंके छोटे अधिकारभी पूर्ण और योग्य रीतिसे अमलमें लाये जावें। क्योंकि, यदि कुम्हार घड़े और जुलाहा कपड़े तैयार न करेगा, तो राजाके द्वारा योग्य रक्षण होनेपरभी लोकसंग्रहका काम पूरा न हो सकेगा; अथवा यदि रेलका कोई सामान्य झंडीवाला या पाइंट्समन अपना कर्तव्य न करे, तो जो रेल- गाड़ी आजकल वायुकी चालसे रात-दिन बेखटके दौड़ा करती है, वह फिर ऐसा न कर सकेगी। अतः वेदान्तसूत्रकर्ताकी उल्लिखित युक्ति-प्रयुक्तियोंसेही अब यह निष्पन्न हुआ, कि व्यास प्रभृति बड़े बड़े अधिकारियोंकोही नहीं; प्रत्युत अन्य पुरुषों- कोभी - फिर चाहे वह राजा हो या रंक - लोकसंग्रह करनेके लिये जो छोटेबड़े अधिकार यथान्याय प्राप्त हुए हैं, उनको ज्ञानके पश्चात्भी छोड़ नहीं देना चाहिये; किंतु उन्हीं अधिकारोंको निष्काम बुद्धिसे अपना कर्तव्य समझ यथाशक्ति, यथामति और यथासंभव जीवनपर्यंत करते जाना चाहिये। यह कहना ठीक नहीं, कि मैं न सही, तो कोई दूसरा उस कामको करेगा ! क्योंकि ऐसा करनेसे संपूर्ण कामके लिये जितने पुरुषोंकी आवश्यकता है, उनमेंसे एक घट जाता है और संघशक्ति कमही नहीं हो जाती; बल्कि ज्ञानी पुरुष उसे जितनी अच्छी रीति करेगा, उतनी अच्छी रीतिमे औरोंके द्वारा उसका होना शक्य नहीं; फलतः इस हिसाबसे लोकसंग्रहभी अधूरा रह जाता है। इसके अतिरिक्त यह कह चुके आये हैं, कि ज्ञानी पुरुषके कर्म- त्यागरूपी उदाहरणसे लोगोंकी बुद्धिभी बिगड़ती है। कभी कभी संन्यास-मार्गवाले कहा करते हैं, कि कर्मसे चित्तकी शुद्धि जानेके पश्चात् केवल अपने आत्माकी मोक्षप्राप्तिसेही संतुष्ट रहना चाहिये, संसारका नाश भलेही हो जावे; पर उसकी कुछ परवाह नहीं करनी चाहिये - “लोकसंग्रहधर्म च नैव कुर्यान्न कारयेत्” न तो लोकसंग्रह करे और न करावे (मभा. अश्व. अनुगीता ४६. ३९) परंतु ये लोक व्यासप्रमुख महात्माओके व्यवहारकी जो उपपत्ति बतलाते हैं, उसमे - और वसिष्ठ एवं पंचशिख प्रभृतिने राम तथा जनक आदिको अपने अपने अधिकारके अनुसार समाजके धारण-पोषण इत्यादिके कामही मरणपर्यंत करनेके लिये जो कहा है, उससे - यही प्रकट होता है, कि कर्म छोड़ देनेका संन्यास-मार्गवालोंका उपदेश एकदेशीय है - सर्वथा सिद्ध होनेवाला शास्त्रीय सत्य नहीं। अतएव कहना चाहिये, कि ऐसे एकपक्षीय उपदेशकी ओर ध्यान देकर, स्वयं भगवानकेही उदाहरणके अनुसार ज्ञानप्राप्तिके पश्चात्भी अपने अधि- कारको परखकर, तदनुसार लोकसंग्रहकारक कर्म जीवनभर करते जानाही शास्त्रोक्त गी. र. २२
और उत्तम मार्ग है । तथापि यह लोकसंग्रहभी फलाशा रखकर न करें । क्योंकि, लोक- संग्रहकीही क्यो न हो, पर फलाशा रखनेसे कर्म यदि निष्फल हो जाय, तो दुःख हुए बिना न रहेगा । इसीसे मैं लोकसंग्रह करूँगा इस अभिमान या फलाशाकी बुद्धिको मनमें न रखकर लोकसंग्रहभी केवल कर्तव्य बुद्धिसेही करना पड़ता है । इसलिये गीतामें यह नही कहा, कि 'लोकसंग्रहार्थ' अर्थात् लोकसंग्रहस्वरूप फल पानेके लिये तुझे कर्म करने चाहिये । किंतु यह कहा है, कि लोकसंग्रहकी ओर दृष्टि देकर ( संपश्यन् ) तुझे कर्म करने चाहिये- “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् ” (गीता ३.२०) । इस प्रकार गीतामें जो जरा लंबी-चौड़ी शब्दयोजना की गई है, उसका रहस्यभी वही है; जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। लोकसंग्रह सचमुच महत्त्वपूर्ण कर्तव्य हैही; पर यह न भूलना चाहिये, कि इसके पहले श्लोकमें (गीता ३.१९) अनासक्त बुद्धिसे कर्म करनेका भगवानने अर्जुनको जो उपदेश दिया है, वह लोकसंग्रहके लियेभी उपयुक्त है । ज्ञान और कर्मका जो विरोध है, वह ज्ञान और काम्य-कर्मोंका है । ज्ञान और निष्काम कर्मोंमें आध्यात्मिक दृष्टिसेभी कुछ विरोध नहीं है । कर्म अपरिहार्य हैं; और लोकसंग्रहकी दृष्टिसे उनकी आवश्यकताभी बहुत है, इसलिये ज्ञानी पुरुषको, जीवनपर्यंत निस्संग बुद्धिसे यथाधिकार चातुर्वर्ण्यके कर्मही करते रहना चाहिये- यही बात शास्त्रीय युक्ति-प्रयुक्तियोंसे सिद्ध है और यदि गीताकाभी यही इत्यर्थ है, तो मनमें यह शंका सहजही होती है, कि वैदिक धर्मके स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित चार आश्रमोंमेंसे संन्यास आश्रमकी क्या दशा होगी ? मनु आदि सब स्मृतियोंमें ब्रह्मचारी गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी- ये चार आश्रम बतलाकर कहा है, कि अध्ययन, यज्ञयाग, दान या चातुर्वर्ण्य-धर्मके अनुसार प्राप्त अन्य कर्मोंके शास्त्रोक्त आचरण द्वारा पहले तीन आश्रमोंमें धीरे धीरे चित्तकी शुद्धि हो जानेपर अंतमें समस्त कर्मोंको स्वरूपतः छोड़ देना चाहिये, तथा संन्यास लेकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये (मनु. ६. १, ३३-३७) । इससे सब स्मृतिकारोंका यह अभिप्राय प्रकट होता है, कि यज्ञयाग और दान प्रभृति कर्म गृहस्थाश्रममें यद्यपि विहित हैं, तथापि वे सर्व चित्तकी शुद्धिके लिये हैं-अर्थात् उनका यही उद्देश्य है, कि विषयासक्ति या स्वार्थपरायण बुद्धि छूटकर परोपकार-बुद्धि इतनी बढ़ जावे, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्माको पहचाननेकी शक्ति प्राप्त हो जाय; और यह स्थिति प्राप्त होनेपर, मोक्षकी प्राप्तिके लिये अंतमें सब कर्मोंका स्वरूपतः त्यागकर संन्यासाश्रमही लेना चाहिये । श्रीशंकराचार्यने कलियुगमें जिस संन्यास-धर्मकी स्थापना की, वह मार्ग यही है; और स्मार्त-मार्गवाले कालिदासनेभी रघुवंशके आरंभमें- शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥ "बालपनमें अभ्यास ( ब्रह्मचर्य ) करनेवाले, तरुणावस्था में विषयोपभोगरूपी संसार
संन्यास और कर्मयोग ३३९ ( गृहस्थाश्रम ) करनेवाले, उतरती अवस्थामें मुनिवृत्तिसे या वानप्रस्थ धर्मसे रहने- वाले और अंतमें ( पातंजल ) योगसे संन्यास-धर्मके अनुसार ब्रह्मांडमें आत्माको ले जाकर प्राण छोड़नेवाले” - ऐसा सूर्यवंशके पराक्रमी राजाओंका वर्णन किया है ( रघु. १. ८ ) । ऐसेही महाभारतके शुकानुप्रश्नमें यह कहकर कि - चतुष्पदी हि निःश्रेणी ब्रह्मप्येषा प्रतिष्ठिता । एतामारुह्य निःश्रेणीं ब्रह्मलोके महीयते ॥ “( चार आश्रमरूपी ) चार सीढ़ियोंका यह जीना अंतमें ब्रह्मपदको जा पहुँचा है । इस जीनेसे ऊपर - अर्थात् एक आश्रमसे ऊपरके दूसरे आश्रममें - इस प्रकार चढ़ते जानेपर, अंतमें मनुष्य ब्रह्मलोकमें बड़प्पन पाता है” ( शां. २४१. १५ ); आगे इस क्रमका वर्णन किया है :- कषायं पाचयित्वाशु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु । प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् ॥ “इस जीनेकी तीन सीढ़ियोंमें मनुष्यको अपने किल्मिष ( पाप ) का अर्थात् स्वार्थ- परायण आत्मबुद्धिका अथवा विषयासक्तिरूप दोषका शीघ्रही क्षय करके फिर संन्यास लेना चाहिये । पारिव्राज्य अर्थात् संन्यासही सबसे श्रेष्ठ स्थान है” ( मभा. शां. २४४. ३ ) । एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जानेका यही सिलसिला मनुस्मृति- मेंभी दिया है ( मनु. ६. ३४ ) । परंतु यह बात मनुके ध्यानमें अच्छी तरह आ गई थी, कि इनमेंसे अंतिम अर्थात् संन्यास आश्रमकी ओर लोगोंकी आवश्यकतासे अधिक प्रवृत्ति होनेसे संसारका कर्तृत्व नष्ट हो जायगा; और समाजभी पंगु हो जायगा । इसीसे मनुने स्पष्ट मर्यादा बना दी है, कि पूर्वाश्रममें गृह-धर्मके अनुसार पराक्रम और लोकसंग्रहके सब कर्म अवश्य करने चाहिये; उसके पश्चात् - गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ “जब शरीरमें झुर्रियां पड़ने लगें; और नाती-पोतोंका मुंह दीख पड़े; तब गृहस्थ वानप्रस्थ होकर संन्यास ले लें” ( मनु. ६. २ ) । इस मर्यादाका पालन इसलिये करना चाहिये, क्योंकि मनुस्मृतिमेंही लिखा है, कि प्रत्येक मनुष्य जन्मके साथही अपनी पीठपर ऋषियों, पितरों और देवताओंके ( तीन ) ऋण ( कर्तव्य ) लेकर उत्पन्न हुआ है। इसलिये वेदाध्ययनसे ऋषियोंका, पुत्रोत्पादनसे पितरोंका और यज्ञकर्मोंसे देवताओंका - इस प्रकार, पहले इन तीनों ऋणोंको चुकाये बिना मनुष्य संसार छोड़कर संन्यास नहीं ले सकता । यदि वह ऐसा न करेगा, तो जन्मसेही पाये हुए उपर्युक्त ऋणोंको चुकता न करनेके कारण वह अधोगतिको पहुँचेगा ( मनु. ६. ३५-३७ और पिछले प्रकरणका तै. सं. मंत्र देखो ) । प्राचीन हिंदु-धर्मशास्त्रके अनुसार बापका कर्ज नियत समयके गुजर जानेका कारण न बतलाकर बेटे या
३४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नातीकोभी चुकाना पड़ता था और किसीका कर्ज चुकानेसे पहलेही मर जानेमें बड़ी दुर्गति मानी जाती थी; इस बातपर ध्यान देनेसे पाठक सहजही जान जायँगे, कि जन्मसेही प्राप्त और उल्लिखित महत्त्वके सामाजिक कर्तव्योंको 'ऋण' कहनेमें हमारे शास्त्रकारोंका क्या हेतु था। कालिदासने रघुवंशमें कहा है, कि स्मृति- कारोंकी बतलाई हुई इस मर्यादाके अनुसार सूर्यवंशी राजा लोग चलते थे, और जब बेटा राज करने समर्थ हो जाता, तब उसे गद्दीपर बिठला कर, फिर ( पहलेसेही नहीं ) स्वयं गृहस्थाश्रमसे निवृत्त होते थे ( रघु. ७. ६८ ) । भागवतमें लिखा है, कि उक्त नियमका पालन न करके, पहले दक्ष प्रजापतिके हर्यश्वसंज्ञक पुत्रोंको और फिर शबलाश्वसंज्ञक दूसरे, अनेक पुत्रोंकोभी, उनके विवाहसे पहलेही, नारदने निवृत्तिमार्गका उपदेश देकर भिक्षु बना डाला; इससे इस अशास्त्र और गर्ह्य व्यवहारके कारण नारदकी निर्भर्त्सना करके दक्ष प्रजा- पतिने उन्हें शाप दिया ( भा ६. ५. ३५-४२ ) । इससे ज्ञात होता है, कि इस आश्रम-व्यवस्थाका मूल हेतु यह था, कि अपना गार्हस्थ्यजीवन यथाशास्त्र पूरा कर लड़कोंके गृहस्थी चलानेयोग्य सयाने हो जानेपर या, बुढ़ापेके निरर्थक हस्त- क्षेपसे उनकी उमंगके आड़े न आ, निरे मोक्षपरायण हो मनुष्य स्वयं आनंदपूर्वक संसारसे निवृत्त हो जावे । इसी हेतुसे विदुरनीतिमें धृतराष्ट्रसे विदुरने कहा है :- उत्पाद्य पुत्राननृणांश्च कृत्वा वृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय कांचिद् । स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा अरण्यसंस्थोऽथ मुनिर्बुभूषेत् ॥ “गृहस्थाश्रममें पुत्र उत्पन्न कर, उनके लिये कोई ऋण न रख छोड़े और उनकी जीविकाके लिये कुछ थोड़ा-सा प्रबंध कर तथा सब लड़कियोंके योग्य रीतेसे विवाह करा देनेपर, वानप्रस्थ हो संन्यास लेनेकी इच्छा करे” ( महा. उ. ३६. ३९ ) । आजकल हमारे यहाँ साधारण लोगोंकी संसार-संबंधी समझभी प्रायः विदुरके कथना- नुसारही है। तोभी, कभी-न-कभी तो संसारको छोड़ संन्यास लेनाही मनुष्यमात्रका परम साध्य माननेके कारण, संसारके व्यवहारोंकी सिद्धिके लिये स्मृतिप्रणेताओंने जान-बूझकर जो पहले तीन आश्रमोंकी श्रेयस्कर मर्यादा कर दी थी, वह धीरे धीरे छूटने लगी; और यहाँतक स्थिति आ पहुँची, कि यदि किसीको पैदा होतेही अथवा अल्प अवस्था मेंही ज्ञानकी प्राप्ति हो जावे, तो उसे इन तीन सीढ़ियोंपर चढ़नेकी कोई आवश्यकता नहीं रही, वह एकदम संन्यास ले ले, तो कोई हानि नहीं - “ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा” ( जाबा. ४ ) ! इसी अभिप्रायसे महाभारतके गोकापिलीय संवादमें कपिलने स्यूमरश्मिसे कहा है :- शरीरपंक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः । कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥ *
- वेदान्तसूत्रोंपर जो शांकरभाष्य है (शां. भा. ३. ४. २६), उससे यह श्लोक
संन्यास और कर्मयोग ३४१ “ सारे कर्म शरीरके (विषयासक्तिरूप) रोग निकाल फेकनेके लिये हैं और ज्ञानही सबसे उत्तम और अंतिम गति है। जब कर्मोंसे शरीरका कषाय अथवा अज्ञानरूपी रोग नष्ट हो जाते हैं, तब रसज्ञानकी चाह उपजती है” (शां. २६९. ३८)। इसी प्रकार मोक्ष-धर्ममें पिंगला गीतामेंभी कहा है, कि “नैराश्यं परमं सुखम्” अथवा “योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्” - तृष्णारूप प्राणांतक रोग छूटे बिना सुख नहीं है (शां. १७४. ६५, ५८)। जाबाल और बृहदारण्यक उपनिषदोंके वचनोंके अतिरिक्त कैवल्य और नारायणोपनिषदमें वर्णन है, कि “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।” - कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे नहीं, किंतु त्यागसे (या न्यायसे) कुछ पुरुष मोक्ष प्राप्त करते हैं (कै. १. २; नारा. उ. १२. ३, ७८)। यदि गीताका यह सिद्धान्त है, कि ज्ञानी पुरुषकोभी अंततक कर्मही करते रहना चाहिये, तो अब बतलाना चाहिये, कि इन वचनोंकी व्यवस्था कैसे लगाई जावे ? इस शंकाके होनेसेही अर्जुनने अठारहवें अध्यायके आरंभमें भगवानसे पूछा है, कि “तो अब मुझे अलग अलग बतलाइये, कि संन्यासके माने क्या हैं ? और त्यागसे क्या समझँ ?” (गीता १८. १)। यह देखनेके पहले, कि भगवानने इस प्रश्नका क्या उत्तर दिया, स्मृति-ग्रंथोंमें प्रतिपादित इस आश्रम-मार्गके अतिरिक्त एक दूसरे तुल्यबल वैदिक मार्गकाभी यहांपर थोड़ा-सा विचार करना आवश्यक है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और अंतमें संन्यासी, इस प्रकार आश्रमोंकी इन चार चढ़ती हुई सीढ़ियोंके जीनेकोही 'स्मार्त' अर्थात् “स्मृतिकारोंका प्रतिपादन किया हुआ मार्ग” कहते हैं। 'कर्म कर' और 'कर्म छोड़' - वेदकी ऐसी जो दो प्रकारकी परस्पर-विरुद्ध आज्ञाएँ हैं, उनकी एकवाक्यता दिखलानेके लिये आयुके भेदके अनुसार आश्रमोंकी यह व्यवस्था स्मृतिकर्ताओंने की है, और कर्मोंके स्वरूपतः संन्यासहीको यदि अंतिम ध्येय मान लें, तो उस ध्येयकी सिद्धिके लिये, स्मृतिकारोंके निर्दिष्ट किये हुए आयु बितानेके चार सीढ़ियोंवाले इस आश्रम-मार्गको साधनरूप समझकर अनुचित नहीं कह सकते। आयुष्य बितानेके लिये इस प्रकारकी चढ़ती हुई सीढ़ियोंकी व्यवस्थासे संसारके व्यवहारका लोप न होकर, यद्यपि वैदिक कर्म और औपनिषदिक ज्ञानका मेल हो जाता है, तथापि अन्य तीनों आश्रमोंका अन्नदाता गृहस्थाश्रमही होनेके कारण मनुस्मृति और महाभारतमेंभी अंतमें उसकाही महत्त्व स्पष्टतया स्वीकृत हुआ है :- यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जंतवः। एवं गार्हस्थ्यमाश्रित्य वर्तन्त इतराश्रमाः ॥ लिया गया है। वहाँ इसका पाठ इस प्रकार है :- “कषायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते॥” महाभारतमें हमें यह श्लोक जैसे मिला है, हमने यहाँ वैसेही लिया है।
३४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र "माताके (पृथ्वीके) आश्रयसे जिस प्रकार सब जंतु जीवित रहते हैं, उसी प्रकार गृहस्थाश्रमके आसरे अन्य आश्रम हैं" (मभा. शां. २६८. ६; मनु. ३. ७७) । मनुने तो अन्यान्य आश्रमोंको नदियों और गृहस्थाश्रमको सागर कहा है (मनु. ६. ९०; मभा. शां. २९५. ३९)। जब गृहस्थाश्रमकी श्रेष्ठता इस प्रकार निर्विवाद है, तब कभी-न-कभी उसे छोड़कर 'कर्मसंन्यास' करनेका उपदेश देनेसे लाभही क्या है? क्या ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपरभी गृहस्थाश्रमके कर्म करना अशक्य है? नहीं। तो फिर इसका क्या अर्थ है, कि ज्ञानी पुरुष संसारसे निवृत्त हों? थोड़ी-बहुत स्वार्थ-बुद्धिसे बर्ताव करनेवाले साधारण लोगोंकी अपेक्षा निष्काम बुद्धिसे व्यवहार करनेवाले पूर्ण ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रह करनेमें अधिक समर्थ और पात्र रहते हैं। अतः ज्ञानसे जब उनकी यह सामर्थ्य पूर्णावस्थाको पहुँचती है, तभी समाजको छोड़ जानेकी स्वतंत्रता ज्ञानी पुरुषोंको देनेसे, उस समाजकीही अत्यंत हानि हुआ करती है; जिसकी भलाईके लिये चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था की गई है। शरीरसामर्थ्य न रहनेपरभी यदि कोई मनुष्य समाजको छोड़कर बनमें चला जावे, तो बात निराली है; अतः जान पड़ता है, कि संन्यास-आश्रमको बुढ़ापेकी मर्यादासे लपेटनेमें मनुका हेतुभी यही रहा होगा। परंतु, ऊपर कह चुके हैं, कि यह श्रेयस्कर मर्यादा आगे व्यवहारसे जाती रही। इसलिये 'कर्म कर' और 'कर्म छोड़' ऐसे द्विविध वेदवचनोंका मेल करनेके लियेही यदि स्मृतिकर्ताओंने आश्रमोंकी चढ़ती हुई श्रेणी बांधी हो, तोभी इन भिन्न भिन्न वेदवाक्योंकी एकवाक्यता करनेका, स्मृतिकारोंकी बराबरीकाही - कदाचित् उनसेभी अधिक - निर्विवाद अधिकार जिन भगवान् श्रीकृष्णको है, उन्होंने जनक प्रभृतिके प्राचीन ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक मार्गका भागवत-धर्मके नामसे पुनरुज्जीवन और पूर्ण समर्थन किया है। दोनोंमें भेद यही है, कि भागवत-धर्ममें केवल अध्यात्म-विचारोंपरही निर्भर न रहकर वासुदेव-भक्तिरूपी सुलभ साधनोंकोभी उसमें मिला दिया है। इस विषयपर आगे तेरहवें प्रकरणमें विस्तारपूर्वक विवेचन किया जावेगा। भागवत धर्म भक्तिप्रधान भलेही हो; पर उसमेंभी जनकके मार्गका यह महत्वपूर्ण तत्त्व विद्यमान है, कि परमेश्वरका ज्ञान पा चुकनेपर कर्मत्यागरूप संन्यास न लेकर केवल फलाशा छोड़कर ज्ञानी पुरुषोंकोभी लोकसंग्रहके निमित्त समस्त व्यवहार यावज्जीवन निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये; अतः कर्मदृष्टिसे ये दोनों मार्ग एक-से अर्थात् ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक या प्रवृत्ति-प्रधान होते हैं। साक्षात् परब्रह्मकेही अवतार - नर ओर नारायण ऋषि - इस प्रवृत्ति-प्रधान धर्मके प्रथम प्रवर्तक हैं; और इसीसे इस धर्मका प्राचीन नाम 'नारायणीय धर्म' है। ये दोनों ऋषि परम ज्ञानी थे; और लोगोंको निष्काम कर्म करनेका उपदेश देनेवाले तथा स्वयं निष्काम कर्म करनेवाले थे (मभा. उ. ४८. २१); और इसीसे महाभारतमें इस धर्मका वर्णन इस प्रकार किया गया है - "प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः" (मभा. शां. ३४७. ८१); अथवा "प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं
संन्यास और कर्मयोग ३४३ ऋषिनारायणोऽब्रवीत् " - नारायण ऋषिका आरंभ किया हुआ धर्म आमरणान्त प्रवृत्ति-प्रधान है (मभा. शां. २१७. २) । भागवतमें स्पष्ट कहा है, कि यही सात्वत या भागवत धर्म है; और इस सात्वत या मूल भागवतधर्मका स्वरूप 'नैष्कर्म्यलक्षण' अर्थात् निष्काम प्रवृत्तिप्रधान था ( भाग. १. ३. ८; ११. ४. ६) । अनुगीताके इस श्लोकसे - "प्रवृत्तिलक्षणो योगः ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" - प्रकट होता है, कि इस प्रवृत्ति-मार्गकाही एक और नाम 'योग' था ( मभा. अश्व. ४३. २५ ) ; और इसीसे नारायणके अवतार श्रीकृष्णने, नरके अवतार अर्जुनको गीतामें जिस धर्मका उपदेश दिया है, उसको गीतामेंही 'योग' कहा है। आजकल कुछ लोगोंकी समझ है, कि भागवत और स्मार्त, दोनों पंथ उपास्यभेदके कारण पहले उत्पन्न हुए थे; पर हमारे मतमें यह समझ ठीक नहीं है । क्योंकि इन दोनों मार्गोंके उपास्य भिन्न भलेही हों; किंतु उनका अध्यात्मज्ञान एकही है। और अध्यात्मज्ञानकी नींव एकही होनेसे, यह संभव नहीं, कि इस उदात्त ज्ञानमें पारंगत प्राचीन ज्ञानी पुरुष केवल उपास्यके भेदको लेकर झगड़ते रहे हों। इसी कारणसे भगवद्गीता ( ९. १४ ) एवं शिवगीता ( १२. ४ ), दोनों ग्रंथोंमें कहा है, कि भक्ति किसीकीभी करो; पहुँचेगी वह एकही परमेश्वरको। और महाभारतके नारायणीय धर्ममें तो इन दोनों देवता- ओंका अभेद यों बतलाया गया है, कि नारायण और रुद्र एकही है और जो रुद्रके भक्त हैं, वेही नारायणके भक्त हैं; और जो रुद्रके द्वेषी हैं, वे नारायणकेभी द्वेषी हैं (मभा. शां. ३४१. २०-२६ ; ३४२. १२९) । हमारा यह कहना नहीं है, कि प्राचीन कालमें शैव और वैष्णवोंका भेदही न था। पर हमारे कथनका तात्पर्य यह है, कि स्मार्त और भागवत ये दोनों पंथ, शिव या विष्णुके उपास्य भेदभावके कारण भिन्न भिन्न नहीं हुए हैं; ज्ञानोत्तर निवृत्ति या प्रवृत्ति कर्म छोड़ें या नहीं - केवल इसी महत्त्वके विषयमें मतभेद होनेसे ये दोनों पंथ प्रथम उत्पन्न हुए हैं। आगे कुछ समयके बाद जब मूल भागवत धर्मका यह प्रवृत्ति-मार्ग या कर्मयोग लुप्त हो गया; और उसेभी केवल विष्णु-भक्तिप्रधान अर्थात् अनेक अंशोंमें निवृत्ति-प्रधान आधुनिक स्वरूप प्राप्त हो गया, एवं इसीके कारण जब वृथाभिमानसे ऐसे झगड़ें होने लगे, कि तेरा देवता 'शिव' है तो मेरा देवता 'विष्णु'; तब 'स्मार्त' और 'भागवत' शब्द क्रमशः 'शैव' और 'वैष्णव' शब्दोंके समानार्थक हो गये और अंतमे इन आधुनिक भागवत धर्मियोंका वेदान्त ( द्वैत या विशिष्टाद्वैत ) भिन्न हो गया; तथा वेदान्तके समानही ज्योतिष अर्थात् एकादशी और चंदन लगानेकी रीतितक स्मार्तमार्गसे निराली हो गई है। किंतु 'स्मार्त' शब्दसेही व्यक्त होता है, कि यह भेद सच्चा अर्थात् मूलका ( पुराना ) नहीं है। भागवत धर्म भगवान्काही प्रवृत्त किया हुआ है, इसलिये इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि इसका उपास्य देवभी श्रीकृष्ण या विष्णु है। परंतु 'स्मार्त' शब्दका धात्वर्थ 'स्मृत्युक्त' - केवल इतनाही - होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि स्मार्त धर्मका उपास्यदेव शिवही होना चाहिये । क्योंकि मनु आदि प्राचीन
३४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्मृति-ग्रंथोंमें यह नियम कहींभी नहीं है, कि एक शिवकीही उपासना करनी चाहिये । इसके विपरीत, विष्णुकाही वर्णन अधिक पाया जाता है और कुछ स्थलोंपर तो गणपति प्रभृतिकोभी उपास्य बतलाया है। इसके सिवा शिव और विष्णु, दोनों देवता वैदिक हैं अर्थात् वेदमैंही इनका वर्णन किया गया है, इसलिये इनमेंसे एककोही स्मार्त कहना ठीक नहीं है। श्रीशंकराचार्य स्मार्त मतके पुरस्कर्ता कहे जाते हैं। पर शांकर मठमें उपास्य-देवता शारदा है और शांकरभाष्यमें जहाँ जहाँ प्रतिमा-पूजनका प्रसंग छिड़ा है, वहाँ वहाँ आचार्यने शिवलिंगका निर्देश न कर शालग्राम अर्थात् विष्णु-प्रतिमाकाही उल्लेख किया है (वे. सू. शां. भा. १. २. ७; १. ३. १४; ४. १. ३; छां. शां. भा. ८. १. १)। इसी प्रकार कहा जाता है, कि पंचदेवपूजाका प्रारंभभी पहले पहल शंकराचार्यनेही किया था। इन सब बातोंका विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि केवल 'शिवभक्त' या 'विष्णुभक्त' इनपर ध्यान नहीं देना चाहिये। किंतु जिनकी दृष्टिसे स्मृति-ग्रंथोंमेंही पहले स्पष्ट रीतिसे वर्णित आश्रम- व्यवस्थाके अनुसार तरुण अवस्थामें यथाशास्त्र संसारके सब कार्य करनेपर बुढ़ापेमें समस्त कर्म छोड़ चतुर्थाश्रम या संन्यास लेनाही अंतिम साध्य था, वेही स्मार्त कहलाते थे और जो लोग भगवानके उपदेशानुसार यह समझते थे, कि ज्ञान एवं उज्ज्वल भगवद्भक्तिके साथ-ही-साथ मरणपर्यंत गृहस्थाश्रमकेही कार्य निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये, उन्हें भागवत कहते थे। इन दोनों शब्दोंके मूल अर्थ यही हैं; और इसीसे ये दोनों शब्द, सांख्य और योग अथवा संन्यास और कर्मयोगके क्रमशः समानार्थक होते हैं। भगवानके अवतारकृत्यसे कहो या ज्ञानयुक्त गार्हस्थ्य-धर्मके महत्त्वपर ध्यान देनेसे कहो; संन्यास-आश्रम लुप्त-सा हो गया था; और कलि- वर्ज्योंमें अर्थात् कलियुगमें जिन बातोंको शास्त्रने निषिद्ध माना है, उनमें संन्यासकी गिनती की गई थी।* फिर जैन और बौद्ध धर्मके प्रवर्तकोंने कापिलसांख्यके मतको स्वीकारकर, इस मतका विशेष प्रचार किया, कि संसारका त्यागकर संन्यास लिये- बिना मोक्ष नहीं मिलता। इतिहासमें प्रसिद्ध है, कि बुद्धने स्वयं तरुण अवस्थामेंही राजपाट, स्त्री और बाल-बच्चोंको छोड़कर संन्यास-दीक्षा ले ली थी। यद्यपि श्री- शंकराचार्यने जैन और बौद्ध मतोंका खंडन किया है, तथापि जैन और बौद्धोंने जिस संन्यास-धर्मका विशेष प्रचार किया था, उसेही श्रौत-स्मार्त संन्यास कहकर आचार्यने कायम रखा। और उससे उन्होंने गीताका इत्यर्थभी ऐसा निकाला, कि वही संन्यास- धर्म गीताका प्रतिपाद्य विषय है। परंतु वास्तवमें गीता स्मार्त-मार्गका ग्रंथ नहीं है
- निर्णयसिंधुके तृतीय परिच्छेदका कलिवर्ज्य प्रकरण देखो। इसमें "अग्नि- होत्रं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम् । देवराच्च सुतोत्पत्तिः कलौ पंच विवर्जयेत् ” और “संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता” इत्यादि स्मृतिवचन हैं। अर्थ : अग्निहोत्र, गोवध, संन्यास, श्राद्धमें मांस-भक्षण और नियोग, कलियुगमें ये पाँचों निषिद्ध हैं। इनमेंसे संन्यासका निषिद्धत्व श्रीशंकराचार्यने पीछेसे निकाल डाला।