भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

संन्यास और कर्मयोग ३२७ है; और उनको करनेके लियेही ईश्वरने हमें उत्पन्न किया है। अज्ञानी और ज्ञानीमें यही तो भेद है (गीता ३. २३, २८)। गीताके इस सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे ज्ञात हो जाता है, कि "योगारूढ पुरुषके लिये आगे शमही कारण होता है" (गीता ६. ३ और उसपर हमारी टिप्पणी देखो)। इस श्लोकका सरल अर्थ क्या होगा। गीताके टीकाकार कहते हैं, कि इस श्लोकमें कहा गया है, कि योगारूढ पुरुष आगे (ज्ञान हो जानेपर) शम अर्थात् शांतिको स्वीकार करे; और कुछ न करे। परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। शम मनकी शांति है और उसे अंतिम 'कार्य' न कहकर इस श्लोकमें यह कहा है, कि शम अथवा शांति दूसरे किसीका कारण है - शमः कारणमुच्यते। अब शमको 'कारण' मानकर देखना चाहिये, कि आगे उसका 'कार्य' क्या है ? पूर्वापर संदर्भपर विचार करनेसे यही निष्पन्न होता है, कि वह कार्य 'कर्म'ही है। और तब इस श्लोकका अर्थ ऐसे होता है, कि योगारूढ पुरुष अपने चित्तको शांत करें, तथा उस शांति या शमसेही अपने सब अगले व्यवहार करे, टीकाकारोंके कथनानुसार यह अर्थ नहीं किया जा सकता, कि "योगारूढ पुरुष कर्म छोड़ दे।" इसी प्रकार 'सर्वारंभ परित्यागी' और 'अनिकेतः' प्रभृति पदोंका अर्थभी कर्मत्याग- विषयक न करके, फलाशात्याग-विषयकही करना चाहिये। गीताके अनुवादमें (उन स्थलोंपर जहाँ ये पद आये हैं) हमने टिप्पणीमें यह बात खोल दी है। भगवानने यह सिद्ध करनेके लिये - कि ज्ञानी पुरुषकोभी फलाशा त्याग कर चातुर्वर्ण्य आदि सब कर्म यथाशास्त्र करते रहना चाहिये - अपने अतिरिक्त दूसरा उदाहरण जनकका दिया है। जनक एक बड़ेही कर्मयोगी थे। उनकी स्वार्थबुद्धिके छूटनेका परिचय उन्हींके मुखसे यों है - "मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन" (मभा. शां. २७५. ४; २१९. ५०) - मेरी राजधानी मिथिलाके जल जाने परभी मेरी कुछ हानि नहीं! इस प्रकार अपना स्वार्थ अथवा लाभालाभ किसी प्रकार न रहनेपरभी राज्यके समस्त व्यवहार करनेका कारण बतलाये हुए, जनक स्वयं कहते हैं :- देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह। इत्यर्थं सर्व एवैते समारम्भा भवन्ति वै ॥ "देव, पितर, सर्वभूत (प्राणी) और अतिथियोंके लिये ये समस्त व्यवहार जारी हैं, मेरे लिये नहीं" (मभा. अश्व. ३२. २४)। अपना कोई कर्तव्य शेष न रहनेपर, अथवा अपने लिये किसी वस्तुके पानेकी वासना न रहने परभी यदि जनक-श्रीकृष्ण जैसे महात्मा इस जगतका कल्याण करनेके लिये प्रवृत्त न होंगे, तो कहना न होगा कि यह संसार उत्सन्न (ऊजड़) हो जायगा - "उत्सीदेयुरिमे लोकाः" (गीता ३. २४)। कुछ लोगोंका कहना है, कि गीताके इस सिद्धान्तमें - कि "फलाशा छोड़नी चाहिये; सब प्रकारकी इच्छाओंको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं" - और वासना- क्षयके सिद्धान्तमें, बहुत भेद नहीं कर सकते। क्योंकि चाहे वासना छूटे, चाहे फलाशा