श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कोही प्रधान मानना चाहिये, और ऐसा करनेमे “ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ”का अर्थ यही करना पडता है, कि “ तू ज्ञानी है; इसलिये यह सच है, कि तुझे अपने स्वार्थके लिये कर्म अनावश्यक हैं; परंतु स्वयं तेरे लिये कर्म अनावश्यक हैं, इसीलिये अब तू उन कर्मोंको (जो शास्त्रसे प्राप्त हुए है) मुझे आवश्यक नहीं इस बुद्धिमे “ अर्थात् निष्काम बुद्धिमे कर ! ” थोड़ेमें यही अनुमान निकलता है, कि कर्म छोड़नेका यह कारण नहीं हो सकता, कि “ वह हमें अनावश्यक है। ” किंतु जब कर्म अपरिहार्य है तब शास्त्रमे प्राप्त अपरिहार्य कर्मोंको स्वार्थत्यागबुद्धिसे करतेही रहना चाहिये - यही गीताका कथन है और यदि प्रकरणकी समताकी दृष्टिसे देखें, तोभी यही अर्थ लेना पडता है। कर्मसंन्यास और कर्मयोग, इन दोनोंमें जो बड़ा अंतर है, वह यही है। संन्यासपक्षवाले कहते हैं, कि “ तुझे कुछ कर्तव्य शेष नहीं बचा है, इससे तू कुछभी न कर।” और गीताका (अर्थात् कर्मयोग) कथन है, कि “ तुझे कुछ कर्तव्य शेष नहीं बचा है इसीलिये तुझे जो कुछ करना है, वह सब स्वार्थसंबंधी वासना छोड़कर अनासक्त बुद्धिसे कर।” अब प्रश्न यह है, कि एकही हेतु वाक्यसे इस प्रकार भिन्न भिन्न दो अनुमान क्यों निकले? इसका उत्तर इतनाही है, कि गीता कर्मोंको अपरिहार्य मानती है, इसलिये गीताके तत्त्वविचारके अनुसार यह अनुमान निकलही नहीं सकता, कि “ कर्म छोड़ दे।” अतएव 'तुझे अनावश्यक है” इस हेतु- वाक्यसेही गीतामें यह अनुमान किया गया है, कि स्वार्थबुद्धि छोड़कर कर्म कर। वसिष्ठजीने योगवासिष्ठमें श्रीरामचंद्रको सब ब्रह्मज्ञान बतलाकर निष्कामकर्मकी ओर प्रवृत्त करनेके लिये जो युक्तियाँ बतलाईं है, वेभी इसी प्रकारकी हैं। योग- वासिष्ठके अंतमें भगवद्गीताका उपर्युक्त सिद्धान्तही अक्षरशः आ गया है (यो. ६ उ. १९९; २१६. १४; गीता ३. १९ के अनुवादपर हमारी टिप्पणी देखो)। योगवासिष्ठके समानही बौद्धधर्मके महायान पंथके ग्रंथोंमेंभी इस संबंधमें गीताका अनुवाद किया गया है। परंतु विषयांतर होनेके कारण उसकी चर्चा यहाँ नहीं हो जा सकती; हमने इसका विचार आगे परिशिष्ट प्रकरणमें कर दिया है। आत्मज्ञान होनेसे 'मैं' और 'मेरा' यह अहंकारकी भाषाही शेष नहीं रहती (गीता १८. १६, २६) एवं इसीसे ज्ञानी पुरुषको 'निर-मम' कहते हैं। निर्ममका अर्थ “ मेरा मेरा (मम) न कहनेवाला” है। ज्ञानी पुरुषका वर्णन करते हुए, श्रीज्ञानेश्वर महाराजने इसी अर्थको अपने काव्यम व्यक्त किया है। परंतु भूल न जाना चाहिये, कि यद्यपि ब्रह्मज्ञानसे 'मैं' और 'मेरा' यह अहंकारदर्शक भाव छूट जाता है, तथापि उन दों शब्दोंके बदले 'जगत्' और 'जगत्का' - अथवा भक्तिपक्षमें 'परमेश्वर' और 'परमेश्वरका' - ये शब्द आ जाते है। संसारका प्रत्येक सामान्य मनुष्य अपने समस्त व्यवहार 'मेरा' या 'मेरे लिये'ही समझकर किया करता है। परंतु ज्ञानी होनेपर, ममत्वकी वासना छूट जानेके कारण अब वह इस बुद्धिसे (निर्मम बुद्धिसे) उन व्यवहारोंको करने लगता है, कि ईश्वरनिर्मित संसारके समस्त व्यवहार परमेश्वरके