भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

३२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र छूटे; दोनों ओर कर्म करनेकी प्रवृत्ति होनेके लिये कुछभी कारण नहीं दीख पड़ता; इससे चाहे जिस पक्षको स्वीकार करें, अंतिम परिणाम - कर्मका छूटना - ही है। परंतु यह आक्षेप अज्ञानमूलक है, क्योंकि 'फलाशा' शब्दका ठीक ठीक अर्थ न जाननेके कारणही यह उत्पन्न हुआ है। फलाशा छोड़नेका अर्थ यह नहीं, कि सब प्रकारकी इच्छाओंको छोड़ देना चाहिये अथवा यह बुद्धि या भाव होना चाहिये, कि मेरे कर्मोंका फल किसीको कभी न मिले, और यदि मिले तो उसे कोईभी न ले; प्रत्युत पाँचवें प्रकरणमे पहलेही हम कह चुके हैं, कि "अमुक फल पानेके लियेही मैं यह कर्म करता हूँ" - इस प्रकारकी फलविषयक ममतायुक्त आसक्तिको या बुद्धिके आग्रहको 'फलाशा', 'संग' या 'काम' ये नाम गीतामें दिये गये हैं। यदि कोई मनुष्य फल पाने- की इच्छा, आग्रह या वृथा आसक्ति न रखे; तो उससे यह मतलब नहीं पाया जाता, कि वह अपने प्राप्त कर्मको, केवल कर्तव्य समझकर, करनेकी बुद्धि और उत्साह- कोभी इस आग्रहके साथ-ही-साथ नष्ट कर डाले। अपने फायदेके सिवा इस संसारमें जिन्हें दूसरा कुछ नहीं दीख पड़ता और जो पुरुष केवल फलकी इच्छासेही कर्म करनेमें निमग्न रहते हैं, उन्हें सचमुच फलाशा छोड़कर कर्म करना शक्य न जँचेगा, परंतु जिनकी बुद्धि ज्ञानसे सम और विरक्त हो गई है, उनके लिये कुछ कठिन नहीं है। पहले तो यह समझही गलत है, कि हमें किसी कामका जो फल मिलता है, वह केवल हमारेही कर्मका फल होता है। यदि पानीकी द्रव्यता या अग्निकी उष्णताकी सहायता न मिले तो मनुष्य कितनाही सिर क्यों न खपावे, उसके प्रयत्नसे पाक-सिद्धि कभी हो नहीं सकेगी - भोजन पकेगाही नहीं; और अग्नि आदिमें इन गुणधर्मोंका होना या न होना मनुष्यके बस या उपायकी बात नहीं है। इसीमे कर्मसृष्टिके इन स्वयंसिद्ध विविध व्यापारों अथवा धर्मोंका पहले यथाशक्ति ज्ञान प्राप्त कर, मनुष्यको उसी ढंगसे अपने व्यवहार करने पड़ते हैं, जिसमे कि वे व्यापार अपने प्रयत्नके अनुकूल हों। इससे कहना चाहिये, कि मनुष्यको प्रयत्नोंके जो फल मिलता है, वह केवल उसकेही प्रयत्नोंका फल नहीं है; वरन् उसका कर्म और कर्म-सृष्टिके तदनुकूल अनेक स्वयंसिद्ध धर्म - इन दोनोंके संयोगका मात्र वह फल है। परंतु मनुष्यके प्रयत्नोंकी सफलताके लिये इस प्रकार जिन नानाविध सृष्टि-व्यापारोंकी अनुकूलता आवश्यक है, उन सबका कई बार मनुष्यको यथार्थ ज्ञान नहीं रहता; और कुछ स्थानोंपर तो वह होनाभी शक्य नही है - इसेही 'दैव' कहते हैं। यदि फल-सिद्धिके लिये ऐसे सृष्टि-व्यापारोंकी सहायता अत्यंत आवश्यक है, जो हमारे अधिकारमें नहीं और जिन्हें हम जानतेभी नहीं हैं; तो आगे कहना नहीं होगा, कि ऐसा अभिमान करना मूर्खता है, कि "केवल अपने प्रयत्नसेही मैं अमुक बात कर लूंगा" (गीता १८. १४-१६)। क्योंकि कर्मसृष्टिके ज्ञात और अज्ञात व्यापारोंका मानवी प्रयत्नोंसे संयोग होनेपर जो फल प्राप्त होता हो, वह केवल कर्मके नियमोंमेही हुआ करता है, इसलिये हम फलकी अभिलाषा करें या न करें - फलसिद्धिमें उसमे कोई फ़र्क