भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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नहीं पड़ता; हमारी फलाशा निःसंदेह हमें दुःखकारक हो जाती है। परंतु स्मरण रहे, कि मनुष्यके लिये आवश्यक बात अकेले सृष्टिव्यापार स्वयं अपनी ओरसे संघटित होकर नहीं कर देते। चनेकी रोटीको स्वादिष्ट बनानेके लिये जिस प्रकार आटेमें थोड़ासा नमकभी मिलाना पड़ता है, उसी प्रकार कर्मसृष्टिके इन स्वयंसिद्ध व्यापारोंको मनुष्योंके लाभकारी होनेके लिये उनमें मानवी प्रयत्नकी थोड़ीसी मात्रा मिलानी पड़ती है। इसीसे ज्ञानी और विवेकी पुरुष सामान्य लोगोंके समान फलकी आसक्ति अथवा अभिलाषा तो नहीं रखते; किंतु वे लोग जगत्के व्यवहारकी सिद्धिके लिये प्रवाहपतित कर्मका (अर्थात् कर्मके अनादि प्रवाहमें शास्त्रसे प्राप्त यथाधिकार कर्मका) जो छोटा-बड़ा भाग मिले, उसेही शांतिपूर्वक, कर्तव्य समझ- कर किया करते हैं और फल पानेके लिये कर्मसंयोगपर अथवा भक्तिदृष्टिसे परमेश्वरकी इच्छापर निर्भर होकर निश्चिंत रहते हैं। "तेरा अधिकार केवल कर्म करनेका है, फल होना तेरे अधिकारकी बात नहीं" (गीता २. ४७) इत्यादि उपदेश जो अर्जुनको किया गया है, उसका रहस्यभी यही है। इस प्रकार फलाशा को त्यागकर कर्म करते रहनेपर आगे कुछ कारणोंसे कदाचित् वह कर्म निष्फल हो जाय तोभी निष्फलताका दुःख माननेके लिये हमें कोई कारणही नहीं रहता, क्योंकि हम तो अपने अधिकारका काम कर चुके हैं। उदाहरण लीजिये; वैद्यकशास्त्रका स्पष्ट मत है, कि आयुकी डोर (अर्थात् शरीरका पोषण करनेवाली नैसर्गिक धातुओंकी शक्ति) सबल रहे बिना निरी औषधियोंसे रोगीको कभी फायदा नहीं होता; और इस डोरकी सबलता अनेक प्राक्तन अथवा पुश्तैनी संस्कारोंका फल है, अतः यह बात वैद्यके हाथों होने योग्य नहीं; और उसे इसका निश्चयात्मक ज्ञान होभी नहीं सकता कि वह कितनी सबल है। ऐसा होते हुएभी हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि रोगी लोगोंको औषधि देना अपना कर्तव्य समझ कर केवल परोपकारकी बुद्धिसे वैद्य अपनी बुद्धिके अनुसार हजारों रोगियोंको दवाई दिया करता है। इस प्रकार निष्काम बुद्धिसे अपना काम करनेपर यदि कोई रोगी चंगा न हो, तो उससे वह वैद्य उद्विग्न नहीं होता, बल्कि बड़े शांत चित्तसे यह शास्त्रीय नियम ढूंढ निकालता है, कि अमुक रोगमें अमुक औषधिसे सैंकडों इतने रोगियोंको आराम होता है। परंतु इसी वैद्यका लड़का जब बीमार पड़ता है, तब उसे औषधि देते समय वह आयुष्यकी डोरवाली बात भूल जाता है और इस ममतायुक्त फलाशासे उसका चित्त घबड़ा जाता है कि "मेरा लड़का अच्छा हो जाय।" इसीसे उसे या तो दूसरा वैद्य बुलाना पड़ता है, या कमसे कम दूसरे वैद्यकी सलाहकी आवश्यकता होती है। इस छोटे-से उदाहरणसे ज्ञात होगा, कि कर्मफलमें ममतारूप आसक्ति किसे कहना चाहिये, और फलाशा न रहने- परभी निरी कर्तव्यबुद्धिसे कोईभी काम किस प्रकार किया जा सकता है। इस प्रकार यह सच है कि फलाशाको नष्ट करनेके लिये ज्ञानकी सहायतासे मनमें वैराग्यका भाव अटल होना चाहिये, परंतु किसी कपड़ेका रंग (राग) दूर करनेके लिये जिस