श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकार कोई कपड़ेको फाड़ना उचित नहीं समझता, उसी प्रकार यह कहनेसे, कि "किसी कर्ममें आसक्ति, काम, संग वा राग अथवा प्रीति न रखो " उस कर्मकोही छोड़ देना ठीक नहीं। वैराग्यसे कर्म करनाही यदि अशक्य हो, तो बात निराली है। परंतु हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि वैराग्यसे भली भांति कर्म किये जा सकते हैं; इतनाही क्यों ? यहभी प्रकट है, कि कर्म किसीसे छूटतेही नहीं। इसीलिये अज्ञानी लोग जिन कर्मोंको फलाशासे किया करते हैं, उन्हेंही ज्ञानी पुरुष ज्ञानप्राप्तिके बादभी लाभ- अलाभ तथा सुखदुःखको एकसा मान कर (गीता २. ३८) धैर्य एवं उत्साहसे, किंतु शुद्ध बुद्धिसे अर्थात् फलके विषयमें विरक्त या उदासीन रहकर (गीता १८. २६), केवल कर्तव्य मान कर, अपने अपने अधिकारानुसार शांत चित्तसे करते रहें (गीता ६. ३) - यही नीति और मोक्षकी दृष्टिसे उत्तम जीवनक्रमका सच्चा तत्त्व है। अनेक स्थितप्रज्ञ, महाभगवद्भक्त और परम ज्ञानी पुरुषोंने - एवं स्वयं भगवान्नेभी इसी मार्गका स्वीकार किया है और भगवद्गीता पुकारकर कहती है, कि इस कर्मयोग-मार्गमेंही पराकाष्ठाका पुरुषार्थ है, इसी 'योग'से परमेश्वरका भजनपूजन होता है; और अतमें सिद्धिभी मिलती है (गीता १८. ४६)। इतने परभी यदि कोई स्वयं जानबूझ कर गैरसमझ कर ले, तो उसे दुर्दैवी कहना चाहिये। स्पेन्सरसाहबको यद्यपि अध्यात्म दृष्टि संमत न थी, तथापि उन्होंनेभी अपने "समाज- शास्त्रका अभ्यास" नामक ग्रंथके अंतमें गीताके समानही यह सिद्धान्त किया है:- यह बात आधिभौतिक रीतिसेभी सिद्ध है, कि इस जगतमें किसीभी कामको एकदम कर गुजरना शक्य नहीं, उसके लिये कारणभूत और आवश्यक दूसरी हजारों बातें पहले जिस प्रकार हुई होंगी, उसी प्रकार मनुष्यके प्रयत्न सफल, निष्फल या न्यूना- धिक सफल हुआ करते हैं। इस कारण यद्यपि साधारण मनुष्य किसीभी कामके करनेमें फलाशासेही प्रवृत्त होते हैं. तथापि बुद्धिमान् पुरुषको शांति और उत्साहसे, फलसंबंधी आग्रह छोड़कर अपना कर्तव्य करते रहना चाहिये।* यद्यपि यह सिद्ध हो गया, कि ज्ञानी पुरुष इस संसारमें अपने प्राप्त कर्मोंको, फलाशा छोड़कर निष्काम बुद्धिसे आमरण अवश्य करता रहे; तथापि यह बतलाये विना कर्मयोगका विवेचन पूरा नहीं होता, कि ये कर्म किससे और किस लिये प्राप्त होते हैं ? अतएव भगवानने कर्मयोगके समर्थनार्थ अर्जुनको अंतिम और महत्त्वका उपदेश दिया है, कि "लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि" (गीता ३. २०)
- लोकसंग्रहकी ओर दृष्टि दे करभी तुझे कर्म करनाही उचित है। लोकसंग्रहका यह अर्थ नहीं, कि कोई ज्ञानी पुरुष "मनुष्योंका केवल जमघट इकट्ठा करे" अथवा
- " Thus admitting that for the fanatic, some wild anticipa- tion is needful as a stimulus, and recognizing the usefulness of his delusion as adapted to his particular nature and his particular function, the man of higher type must be content with greatly