श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३३१ यहभी अर्थ नहीं, कि “स्वयं कर्मत्यागका अधिकारी होनेपरभी इसलिये कर्म करनेका ढोंग करे, कि अज्ञानी मनुष्य कहीं कर्म न छोड़ बैठें; और उन्हें अपनी (ज्ञानी पुरुष- की) कर्मतत्परता अच्छी लगे।” क्योंकि, गीताका यह सिखलानेका हेतु नहीं, कि लोग अज्ञानी या मूर्ख बने रहें; अथवा उन्हें अज्ञानी बनाये रखनेके लिये ज्ञानी पुरुष कर्म करनेका ढोंग किया करे। ढोंग तो दूरही रहा; परंतु “लोग तेरी अपकीर्ति गावेंगें” (गीता २. ३४) इत्यादि सामान्य लोगोंको जँचनेवाली युक्तियोंसे जब अर्जुनका समाधान न हुआ, तब भगवान्, उन युक्तियोंसेभी अधिक जोरदार और तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे अधिक बलवान् कारण, अब कह रहे हैं। इसलिये कोशमें 'संग्रह' शब्दके जमा करना, इकट्ठा करना, रखना, पालना, नियमन करना प्रभृति जो अर्थ दिये हैं, उन सबको यथासंभव ग्रहण करना पड़ता है। और ऐसा करनेसे “लोगोंका संग्रह करना” या यह अर्थ होता है, कि “उन्हें एकत्र संबद्ध कर, इस रीतिसे उनका पालनपोषण और नियमन करे, कि उनकी परस्पर अनुकूलतासे उत्पन्न होनेवाली सामर्थ्य उनमें आ जावे; एवं उसके द्वारा उनकी सुस्थितिको स्थिर रखकर आगे उन्हें श्रेयःप्राप्तिके मार्गमें लगा दे।” “राष्ट्रका संग्रह” ये शब्द इसी अर्थमें मनुस्मृतिमें (मनु. ७. ११४) आये हैं; शांकरभाष्यमें उपरोक्त शब्दकी व्याख्या यों है- “लोकसंग्रह = लोकस्योन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणम्।” इससे दीख पड़ेगा, कि संग्रह शब्दका जो हम ऐसा अर्थ करते हैं कि अज्ञानसे मनमाना बर्ताव करनेवाले लोगोंको ज्ञानवान् बनाकर सुस्थितिमें एकत्र रखना और आत्मोन्नतिके मार्गमें लगाना; वह अपूर्व या निराधार नहीं है। यह संग्रह शब्दका अर्थ हुआ; परंतु यहाँ यहभी बतलाना चाहिये कि 'लोकसंग्रह' में 'लोक' शब्द केवल मनुष्यवाची नहीं है। यद्यपि यह सच है, कि जगत्के अन्य प्राणियोंकी अपेक्षा मनुष्य श्रेष्ठ है; और इसीसे मानवजातिके कल्याणकाही प्रधानतासे 'लोकसंग्रह' शब्दमें समावेश होता है, तथापि भगवान्कीही ऐसी इच्छा है, कि भूलोक, मर्तृलोक, पितृलोक और देवलोक प्रभृति जो अनेक लोक अर्थात् जगत् भगवान्ने बनाये हैं, उनकाभी भली भाँति धारण- पोषण हो; और वे सभी अच्छी रीतिसे चलते रहें; इसलिये कहना पड़ता है, कि moderated expectations, while he perseveres with undiminished efforts. He has to see how comparatively little can be done, and yet to find it worthwhile to do that little: so uniting philanthropic enegry with philosophic calm.”- Spencer’s Study of Sociology,- 8th Ed., p. 403. (The italics are ours.) इस वाक्यमें fanatics के स्थान में “प्रकृतिके गुणोंसे विमूढ” (गीता ३. २९) या 'अहंकारविमूढ' (गीता ३. २७) अथवा भास कविक़ा 'मूर्ख' शब्द और man of higher type के स्थानमें 'विद्वान्' (गीता ३. २५) एवं greatly moderated expectations के स्थानमें 'फलो- दासीन्य' अथवा 'फलाशात्याग' इन समानार्थी शब्दोंकी योजना करनेसे ऐसा दीख पड़ेगा कि स्पेन्सरसाहबने मानो गीताकेही सिद्धान्तका अनुवाद कर दिया है।