श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इतना सब व्यापक अर्थ 'लोकसंग्रह' पदसे यहाँ विवक्षित है, कि मनुष्यलोकके साथही इन सब लोकोंके व्यवहारभी सुस्थितिसे चलें ( लोकानां संग्रहः ) । जनकके किये अपने कर्तव्यके वर्णनमें - जो पहले लिखा जा चुका है - देव और पितरोंका उल्लेख है, एवं भगवद्गीताके तीसरे अध्यायमें तथा महाभारतके नारायणीयोपाख्यानमें जिस यज्ञचक्रका वर्णन है, उसमेंभी कहा है, कि देवलोक और मनुष्यलोक, दोनों- हीके धारणा-पोषणके लिये ब्रह्मदेवने यज्ञ उत्पन्न किया ( गीता ३. १०-१२ ) । इससे स्पष्ट होता है, कि भगवद्गीतामें 'लोकसंग्रह' पदमें इतना अर्थ विवक्षित है, कि अकेले मनुष्य-लोककाही नहीं; किंतु देवलोक आदि सब लोकोंकाभी उचित धारण-पोषण होवें और वे परस्पर एक दूसरेका श्रेय संपादन करें । सारी सृष्टिका पालन-पोषण करके लोकसंग्रह करनेका यह जो भगवानका अधिकार है, वही पुरुषके ज्ञानी हो जानेपर उसे अपने ज्ञानके कारण प्राप्त हुआ करता है। ज्ञानी पुरुषको जो बात प्रामाणिक जँचती है, अन्य लोगभी उसीही प्रमाण मान कर तदनुकूल व्यव- हार किया करते हैं ( गीता ३. २१) । क्योंकि साधारण लोगोंकी समझ है, कि शांत चित्त और समबुद्धिसे यह विचारनेका काम ज्ञानीहीका है, कि संसारका धारण और पोषण कैसे होगा ? एवं तदनुसार धर्म-प्रबंधकी मर्यादा बना देनाभी उसीका काम है। इस समझमें कुछ भूलभी नहीं है। और यहभी कह सकते हैं, कि सामान्य लोगोंकी समझमें ये बातें भली भांति नही आ सकतीं, तो इसीलिये वे ज्ञानी पुरुषोंके भरोसे रहते हैं। इसी अभिप्रायको मनमें लाकर शांतिपर्वमें युधिष्ठिरसे भीष्मने कहा है :- लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ॥ “ लोकसंग्रहकारक और सूक्ष्म प्रसंगोंपर धर्मार्थका निर्णय कर देनेवाला साधु पुरुषोंका उत्तम चरित्र स्वयं ब्रह्मदेवनेही बनाया है” ( मभा. शां. २५८. २५) । 'लोकसंग्रह' कुछ ठाले बैठेकी बेगार, ढकोसला या लोगोंको अज्ञानमें डाले रखनेकी तरकीब नहीं है; ज्ञानयुक्त कर्मके संसारसे नष्ट हो जानेसे जगत्के नष्ट हो जानेकी संभावना है, इसलिये यही सिद्ध होता है, कि ब्रह्मदेवर्निर्मित साधुपुरुषोंके कर्तव्योंमें 'लोक- संग्रह' एक प्रधान कर्तव्य है। और इस भगवद्वचनका भावार्थभी यही है, कि “ मैं यह काम न करूँ, तो ये समस्त लोक अर्थात् जगत् नष्ट हो जावेंगे” (गी. ३. २४)। ज्ञानी पुरुष सब लोगोंके नेत्र हैं और यदि वे अपना काम छोड़ देंगे, तो सारी दुनिया अंधी हो जायगी; और इस संसारका सर्वतः नाश हुए बिना न रहेगा । ज्ञानी पुरुषों- कोही उचित है, कि लोगोंको ज्ञानवान् कर उन्नत बनावें । परन्तु यह काम सिर्फ जीभ हिला देनेसे अर्थात् कोरे उपदेशसे कभी नहीं होता। क्योंकि, जिन्हें सदाचरणकी आदत नहीं और जिनकी बुद्धिभी पूर्ण शुद्ध नहीं रहती, उन्हें यदि कोरा ब्रह्मज्ञान सुनाया जाय, तो वे लोग उस ज्ञानका दुरुपयोग इस प्रकार करते देखे गये हैं, कि