श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग [दाहिनी ओर: ३३३]
तेरासो मेरा, और मेरा तो मेरा है ही।" इसके सिवा, किसीके उपदेशकी सत्यताकी जाँचभी तो लोग उसके आचरणमेही किया करते हैं। इसलिये यदि ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म न करेगा, तो वह सामान्य लोगोंको आलसी बनानेका एक बहुत बड़ा कारण हो जायगा। इसेही 'बुद्धिभेद' कहते हैं; और यह बुद्धिभेद न होने पावे, तथा सब लोग सचमुच निष्काम होकर अपना कर्तव्य करनेके लिये जागृत हो जावें, इसी हेतु संसारमेंही रहकर अपने कर्मोंसे सब लोगोंको सदाचरणकी – निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेकी – प्रत्यक्ष शिक्षा देनाही ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य (ढोंग नहीं) हो जाता है। अतएव गीताका कथन है, कि उसे (ज्ञानी पुरुषको) कर्म छोड़नेका अधिकार कभी प्राप्त नहीं होता और अपने लिये न सही, परंतु लोकसंग्रहार्थ चातुर्वर्ण्यके सब कर्म अधिकारानुसार उसे करनेही चाहिये। किंतु संन्यासमार्ग- वालोंका मत है, कि ज्ञानी पुरुषको चातुर्वर्ण्यके कर्म निष्काम बुद्धिसेभी करनेकी कुछ जरूरत नहीं – यही क्यों ? करनेभी नहीं चाहिये; इसलिये इस संप्रदायके टीका- कार गीताके – "ज्ञानी पुरुषको लोकसंग्रहार्थ कर्म करने चाहिये" – इस सिद्धान्तका कुछ गड़बड़ अर्थ लगाकर – यहाँतक कहनेके लिये तैयारसे हो गये हैं, कि स्वयं भगवान्भी प्रत्यक्ष नहीं, तो पर्यायसे ढोंगका, उपदेश करते हैं। परंतु पूर्वापर संदर्भसे प्रकट है, कि गीताके लोकसंग्रह शब्दका यह ढुलमुल या पोचा अर्थ सच्चा नहीं। गीताको तो यह मतही मंजूर नहीं, कि ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़नेका अधिकार प्राप्त होता है; और इसके प्रमाणमें गीतामें जो कारण दिये गये हैं, उनमें लोकसंग्रह एक मुख्य कारण है। इसलिये पहले यह मान कर, कि ज्ञानी पुरुषके कर्म छूट जाते हैं, लोकसंग्रह पदका ढोंगी अर्थ करना सर्वथा अन्याय्य है। इस जगत्में मनुष्य केवल अपनेही लिये उत्पन्न नहीं हुआ है। यह सच है, कि सामान्य लोग अज्ञानतः स्वार्थमेंही फँसे रहते हैं। परंतु "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) – मैं सब भूतोंमें हूँ; और सब भूत मुझमें हैं – इस रीतिसे जिसको समस्त संसारही आत्मभूत हो गया है, उसका यह कहना अपने मुखसे अपने ज्ञानमें बट्टा लगाना है, कि "मुझे तो मोक्ष मिल गया, अब यदि लोग दुःखी हों, तो मुझे इसकी क्या परवाह ?" ज्ञानी पुरुषका आत्मा क्या कोई स्वतंत्र व्यक्ति है? उसके आत्मापर जबतक अज्ञानका पर्दा पड़ा था, तबतक 'मैं' और 'लोग' यह भेद कायम था। परंतु ज्ञानप्राप्तिके बाद सब लोगोंका आत्माही उसका आत्मा है। इसीसे योग- वासिष्ठमें रामसे वसिष्ठने कहा है :- यावल्लोकपरामर्शो निरूढो नास्ति योगिनः । तावद्रूढसमाधित्वं न भवत्येव निर्मलम् ॥ "जबतक लोगोंके परामर्श लेनेका (अर्थात् लोकसंग्रहका) काम थोड़ाभी बाकी है – समाप्त नहीं हुआ है – तबतक यह कभी नहीं कह सकते, कि योगारूढ पुरुषकी स्थिति निर्दोष है" (यो. ६; पृ. १२८. ९७)। उसका केवल अपनेही समाधि-