भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 379

३३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखमें डूब जाना मानो एक प्रकारसे अपनाही स्वार्थ साधना है। संन्यासमार्गवाले इस बातकी ओर दुर्लक्ष करते हैं यही उनकी युक्ति-प्रयुक्तियोंका मुख्य दोष है। भगवान्‌की अपेक्षा किसीकाभी अधिक ज्ञानी, अधिक निष्काम या अधिक योगारूढ होना शक्य नहीं। परंतु जब स्वयं भगवान्‌भी "साधुओंका संरक्षण, दुष्टोंका नाश और धर्म-संस्थापना" ऐसे लोकसंग्रहके काम करनेके लियेही समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता ४. ८), तब लोकसंग्रहके कर्तव्यको छोड़ देनेवाले ज्ञानी पुरुषका यह कहना सर्वथा अनुचित है, कि "जिस परमेश्वरने इन सब लोगोंको उत्पन्न किया है, वह उनका जैसे चाहेगा वैसे धारण-पोषण करेगा, उधर देखना मेरा काम नहीं है।" क्योकि ज्ञानप्राप्तिके बाद 'परमेश्वर', 'मैं' और 'लोग' - यह भेदही नहीं रहता; और यदि रहे, तो उसे ढोंगी कहना चाहिये; ज्ञानी नहीं। यदि ज्ञानसे ज्ञानी पुरुष परमेश्वररूपी हो जाता है, तो परमेश्वर जो काम करता है, उसे परमे- श्वरके समान अर्थात् निस्संगबुद्धिसे करनेकी आवश्यकतासे ज्ञानी पुरुष कैसे छूटेगा (गीता ३. २२; ४. १४, १५) ; इसके अतिरिक्त, परमेश्वरको जो कुछ करना है, वहभी ज्ञानी पुरुषके रूपसे या उसके द्वाराही करेगा। अतएव जिसे परमे- श्वरके स्वरूपका ऐसा अपरोक्ष ज्ञान हो गया है, कि "सब प्राणियोंमें एक आत्मा है" उसके मनमें सर्वभूतानुकंपा आदि उदात्त वृत्तियाँ पूर्णतासे जागृत रह कर स्वभावसेही उसके मनकी प्रवृत्ति लोककल्याणकी ओर हो जानी चाहिये। इसी अभिप्रायसे तुकाराममहाराज साधुपुरुषके लक्षण इस प्रकार बतलाते हैं- "जो दीनदुखियोंको अपनाता है, वही साधु है- ईश्वरभी वहीं (उसीके पास) है" (तु. गा. ९६०. १, २)। अथवा "जिसने परोपकारमें अपनी शक्तियोंका व्यय किया है, उसीने आत्मस्थितिको जाना है" (तु. गा. ४५६२)।* और अंतमें, संत- जनोंका (अर्थात् भक्तिसे परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान पानेवाले महात्माओंका) वर्णन इस प्रकार किया है- "संतोंकी विभूतियाँ जगत्‌के कल्याणहीके लिये हुआ करती हैं। वे लोग परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" भर्तृहरिनेभी इस प्रकार वर्णन किया है, कि परार्थही जिसका स्वार्थ हो गया है, वही पुरुष साधुओंमें श्रेष्ठ है - "स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः।" क्या मनु आदि शास्त्रप्रणेता ज्ञानी न थे? परंतु उन्होंने तृष्णादुःखको बड़ा भारी हौवा मानकर तृष्णाके साथ-ही-साथ परोपकार-बुद्धि आदि सभी उदात्त वृत्तियोंको नष्ट नहीं कर दिया - उन्होंने तो लोकसङ्ग्रहकारक चातुर्वर्ण्य प्रभृति शास्त्रीय मर्यादा बना देनेका

  • इसी भावको कविवर बाबू मैथिलीशरण गुप्तने यों व्यक्त किया है :- वास उसीमें है विभुवरका है बस सच्चा साधु वही - जिसने दुखियोको अपनाया, बढ़ कर उनकी बाह गही। आत्मस्थिति जानी उसनेही परहित जिसने व्यथा सही, परहितार्थ जिनका वैभव है, है, उनमेही धन्य मही॥