भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

[Page Header] संन्यास और कर्मयोग ३३५

उपयोगी काम किया है, ब्राह्मणको ज्ञान, क्षत्रियको युद्ध, वैश्यको खेती, गोरक्षा और व्यापार अथवा शूद्रको सेवा - ये जो गुण-कर्म और स्वभावके अनुरूप भिन्न भिन्न धर्म शास्त्रोंमें वर्णित हैं, वे केवल किसी व्यक्तिकेही हितके लिये नहीं हैं; प्रत्युत मनुस्मृति ( मनु. १. ८७ ) में कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्यके व्यापारोंका विभाग लोकसंग्रहके लियेही इस प्रकार प्रवृत्त हुआ है कि सारे समाजके बचावके लिये कुछ पुरुषोंको प्रतिदिन युद्धकलाका अभ्यास करके सदा तैयार रहना चाहिये; और कुछ लोगोंको खेती, व्यापार एवं ज्ञानार्जन प्रभृति उद्योगोंसे समाजकी अन्यान्य आवश्य- कताएँ पूर्ण करनी चाहिये। गीताका (गीता ४. १३; १८. ४१) अभिप्रायभी ऐसाही है। यह पहले कहाही जा चुका है, कि इस चातुर्वर्ण्य धर्ममेंसे यदि कोई एकभी धर्म डूब जाय, तो समाज उतनाही पंगु हो जायगा; और अंतमें उसका नाश हो जानेकीभी संभावना रहती है। तथापि स्मरण रहे, कि उद्योगोंके विभागकी यह व्यवस्था एकही प्रकारकी नहीं रहती है। प्राचीन यूनानी तत्त्वज्ञ प्लेटोने एतद्विषयक अपने ग्रंथमें और अर्वाचीन फ्रेंच शास्त्रज्ञ कोंटने अपने 'आधि- भौतिक तत्त्वज्ञान' में, समाज-धारणके लिये जो व्यवस्था सूचित की है, वह यद्यपि चातुर्वर्ण्यके सदृश्य है; तथापि इन ग्रंथोंको पढ़नेसे कोईभी जान सकेगा, कि उस व्यवस्थामें धर्मकी चातुर्वर्ण्य व्यवस्थासे कुछ-न-कुछ भिन्नता है। इनमेंसे कौन-सी समाज-व्यवस्था अच्छी है ? अथवा यह अच्छापन सापेक्ष है, और युगमानसे उसमें कुछ.फेरफार हो सकता है या नहीं ? - इत्यादि अनेक प्रश्न यहाँ उठते हैं; और आजकल तो पश्चिमी देशोंमें 'लोकसंग्रह' एक महत्त्वका शास्त्र बन गया है। परंतु गीताका तात्पर्य-निर्णयही हमारा प्रस्तुत विषय है, इसलिये यहाँ उन प्रश्नोंपर विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह बात निर्विवाद है, कि गीताके समयमें चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्था अनिवार्य रूपसे प्रचलित थी; और मूलतः 'लोकसंग्रह' करनेके हेतुसेही वह प्रवृत्ति की गई थी। इसलिये यही बात मुख्यतः यहाँ बतलानी है। गीताके 'लोकसंग्रह' पदका अर्थ यही होता है, कि लोगोंको प्रत्यक्ष दिखला दिया जावे, कि चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्थाके अनुसार प्राप्त अपने कर्म निष्काम बुद्धिसे किस प्रकार करने चाहिये ? ज्ञानी पुरुष समाजके न केवल नेत्रही हैं; वरन् गुरुभी हैं। इससे आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि उपर्युक्त प्रकारका लोकसंग्रह करनेके लिये, उन्हें अपने समयकी समाज-व्यवस्थामें यदि कोई न्यूनता जँचे, तो वे उसे श्वेतकेतुके समान देशकालानुरूप परिमार्जित करें; और सनमाजके धारण तथा पोषण शक्तिकी रक्षा करते हुए उसको उन्नतावस्थामें ले जानेका प्रयत्न करते रहें। इसी प्रकारका लोकसंग्रह करनेके लिये राजा जनक संन्यास न लेकर जीवनपर्यंत राज्य करते रहे; और मनुने पहला राजा बनना स्वीकार किया। एवं इसी कारणसे "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि" (गीता २. ३१) - स्वधर्मके अनुसार जो कर्म प्राप्त ह, उनके लिये रोना तुझे उचित नहीं - अथवा "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति