भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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३३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किल्बिषम् ” (गीता १८. ४७) - स्वभाव और गुणोंके अनुरूप निश्चित चातु- र्वर्ण्य-व्यवस्थाके अनुसार नियमित कर्म करनेसे तुझे कोई पाप नहीं लगेगा - इत्यादि प्रकारसे चातुर्वर्ण्य कर्मके अनुसार प्राप्त युद्धको करनेके लिये गीतामें अर्जुनको बार- बार उपदेश किया गया है। यह कोईभी नहीं कहता, कि परमेश्वरका यथाशक्ति ज्ञान प्राप्त न करो। गीताकाभी सिद्धान्त है, कि इस ज्ञानको संपादन करनाही मनुष्यका इस जगदमें इतिकर्तव्य है। परंतु इससे आगे बढ़कर गीताका विशेष कथन यह है, कि अपने आत्माके कल्याणमेंही समाष्टिरूप आत्माके कल्याणार्थ यथाशक्ति प्रयत्न करनेकाभी समावेश होता है, इसलिये लोकसंग्रह करनाही ब्रह्मात्मैक्यज्ञानका सच्चा पर्यवसान है। तथापि यह बात नहीं, कि किसी पुरुष केवल ब्रह्मज्ञानी होनेसेही सब प्रकारके व्यावहारिक व्यापार अपनेही हाथसे कर डालने योग्य हो जाता हो। भीष्म और व्यास, दोनों महाज्ञानी और परम भगवद्भक्त थे। परंतु यह कोई नहीं कहता, कि भीष्मके समान व्यासनेभी लड़ाईका काम किया होता। अथवा देवताओंकी ओर देखें, तो वहांभी संसारके संहार करनेका काम शंकरके बदले विष्णुको सौंपा हुआ नहीं दीख पड़ता। मनकी निर्विषयताकी, सम और शुद्ध बुद्धिकी तथा आध्यात्मिक उन्नतिकी अंतिम सीढ़ी जीवन्मुक्तावस्था है, वह आधिभौतिक उद्योगोंकी दक्षताकी परीक्षा नहीं है। गीताके इसी प्रकरणमें यह विशेष उपदेश दुबारा किया गया है, कि स्वभाव और गुणोंके अनुरूप प्रचलित चातुर्वर्ण्य आदि व्यवस्थाओंके अनुसार जिस कर्मको हम जीवनभर करते चले आ रहे हैं, स्वभावके अनुसार उसी कर्म अथवा व्यवसायको ज्ञानोत्तरभी ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रहके निमित्त करता रहे; क्योंकि उसीमें उसके निपुण होनेकी संभावना है। यदि वह कोई औरही व्यापार करने लगेगा, तो उससे समाजकी हानि होगी (गीता ३. ३५; १८. ४७)। प्रत्येक मनुष्यमें ईश्वरनिर्मित प्रकृति, स्वभाव और गुणोंके अनुरूप जो भिन्न भिन्न प्रकारकी योग्यता होती है, उसेही अधिकार कहते हैं। और वेदान्तसूत्रमें कहा है, कि "इस अधिकारके अनुसार प्राप्त कर्मोंको, पुरुष ब्रह्मज्ञानी हो जानेपर भी, लोकसंग्रहार्थ मरणपर्यंत करता जावे, छोड़ न दे - यावदधिकारमवस्थितिरधिकारिणाम्" (वे. सू. ३. ३. ३२)। कुछ लोगोंका कथन है, कि वेदान्तसूत्रकर्ताकी यह उपपत्ति केवल बड़े अधिकारी पुरुषोंकोही उपयोगी है; और इस सूत्रके भाष्यमें उसके समर्थनार्थ जो उदाहरण दिये गये हैं, उनसे जान पड़ेगा, कि वे सभी उदाहरण व्यास प्रभृति बड़े बड़े अधिकारी पुरुषोंकेही हैं। परंतु मूल-सूत्रमें अधिकारकी छुटाई-बड़ाईके संबंधमें कुछभी उल्लेख नहीं है, इससे 'अधिकार' शब्दका मतलब छोटे-बड़े सभी अधिकारोंसे है। और यदि इस बातका सूक्ष्म तथा स्वतंत्र विचार करें, कि ये अधिकार किसको और किस प्रकार प्राप्त होते हैं, तो ज्ञात होगा, कि मनुष्यके साथही समाज और समाजके साथही मनुष्यको परमेश्वरने उत्पन्न किया है, इसलिये जिसे जितना बुद्धिबल, सत्ताबल, द्रव्यबल या शरीरबल स्वभावसेही हो अथवा स्वधर्मसे प्राप्त कर लिया जा सके,