श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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[Header] सन्यास और कर्मयोग ३३७
उसी हिसाबसे यथाशक्ति संसारके धारण और पोषण करनेका थोड़ा-बहुत अधिकार
- चातुर्वर्ण्य आदि अथवा अन्य गुण और कर्मविभागरूप सामाजिक व्यवस्थामे - प्रत्येकको जन्मसेही प्राप्त रहता है। किसी कलको, अच्छी रीतिसे चलानेके लिये बड़े चक्केके समानही, जिस प्रकार छोटे-से पहियेकीभी आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार समस्त संसारकी अपार घटनाओं अथवा कार्योंके सिलसिलेको व्यवस्थित चलाते रखनेके लिये व्यास आदिकोंके बड़े अधिकारके समानही इस बातकीभी आवश्यकता है, कि अन्य मनुष्योंके छोटे अधिकारभी पूर्ण और योग्य रीतिसे अमलमें लाये जावें। क्योंकि, यदि कुम्हार घड़े और जुलाहा कपड़े तैयार न करेगा, तो राजाके द्वारा योग्य रक्षण होनेपरभी लोकसंग्रहका काम पूरा न हो सकेगा; अथवा यदि रेलका कोई सामान्य झंडीवाला या पाइंट्समन अपना कर्तव्य न करे, तो जो रेल- गाड़ी आजकल वायुकी चालसे रात-दिन बेखटके दौड़ा करती है, वह फिर ऐसा न कर सकेगी। अतः वेदान्तसूत्रकर्ताकी उल्लिखित युक्ति-प्रयुक्तियोंसेही अब यह निष्पन्न हुआ, कि व्यास प्रभृति बड़े बड़े अधिकारियोंकोही नहीं; प्रत्युत अन्य पुरुषों- कोभी - फिर चाहे वह राजा हो या रंक - लोकसंग्रह करनेके लिये जो छोटेबड़े अधिकार यथान्याय प्राप्त हुए हैं, उनको ज्ञानके पश्चात्भी छोड़ नहीं देना चाहिये; किंतु उन्हीं अधिकारोंको निष्काम बुद्धिसे अपना कर्तव्य समझ यथाशक्ति, यथामति और यथासंभव जीवनपर्यंत करते जाना चाहिये। यह कहना ठीक नहीं, कि मैं न सही, तो कोई दूसरा उस कामको करेगा ! क्योंकि ऐसा करनेसे संपूर्ण कामके लिये जितने पुरुषोंकी आवश्यकता है, उनमेंसे एक घट जाता है और संघशक्ति कमही नहीं हो जाती; बल्कि ज्ञानी पुरुष उसे जितनी अच्छी रीति करेगा, उतनी अच्छी रीतिमे औरोंके द्वारा उसका होना शक्य नहीं; फलतः इस हिसाबसे लोकसंग्रहभी अधूरा रह जाता है। इसके अतिरिक्त यह कह चुके आये हैं, कि ज्ञानी पुरुषके कर्म- त्यागरूपी उदाहरणसे लोगोंकी बुद्धिभी बिगड़ती है। कभी कभी संन्यास-मार्गवाले कहा करते हैं, कि कर्मसे चित्तकी शुद्धि जानेके पश्चात् केवल अपने आत्माकी मोक्षप्राप्तिसेही संतुष्ट रहना चाहिये, संसारका नाश भलेही हो जावे; पर उसकी कुछ परवाह नहीं करनी चाहिये - “लोकसंग्रहधर्म च नैव कुर्यान्न कारयेत्” न तो लोकसंग्रह करे और न करावे (मभा. अश्व. अनुगीता ४६. ३९) परंतु ये लोक व्यासप्रमुख महात्माओके व्यवहारकी जो उपपत्ति बतलाते हैं, उसमे - और वसिष्ठ एवं पंचशिख प्रभृतिने राम तथा जनक आदिको अपने अपने अधिकारके अनुसार समाजके धारण-पोषण इत्यादिके कामही मरणपर्यंत करनेके लिये जो कहा है, उससे - यही प्रकट होता है, कि कर्म छोड़ देनेका संन्यास-मार्गवालोंका उपदेश एकदेशीय है - सर्वथा सिद्ध होनेवाला शास्त्रीय सत्य नहीं। अतएव कहना चाहिये, कि ऐसे एकपक्षीय उपदेशकी ओर ध्यान देकर, स्वयं भगवानकेही उदाहरणके अनुसार ज्ञानप्राप्तिके पश्चात्भी अपने अधि- कारको परखकर, तदनुसार लोकसंग्रहकारक कर्म जीवनभर करते जानाही शास्त्रोक्त गी. र. २२