श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र "माताके (पृथ्वीके) आश्रयसे जिस प्रकार सब जंतु जीवित रहते हैं, उसी प्रकार गृहस्थाश्रमके आसरे अन्य आश्रम हैं" (मभा. शां. २६८. ६; मनु. ३. ७७) । मनुने तो अन्यान्य आश्रमोंको नदियों और गृहस्थाश्रमको सागर कहा है (मनु. ६. ९०; मभा. शां. २९५. ३९)। जब गृहस्थाश्रमकी श्रेष्ठता इस प्रकार निर्विवाद है, तब कभी-न-कभी उसे छोड़कर 'कर्मसंन्यास' करनेका उपदेश देनेसे लाभही क्या है? क्या ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपरभी गृहस्थाश्रमके कर्म करना अशक्य है? नहीं। तो फिर इसका क्या अर्थ है, कि ज्ञानी पुरुष संसारसे निवृत्त हों? थोड़ी-बहुत स्वार्थ-बुद्धिसे बर्ताव करनेवाले साधारण लोगोंकी अपेक्षा निष्काम बुद्धिसे व्यवहार करनेवाले पूर्ण ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रह करनेमें अधिक समर्थ और पात्र रहते हैं। अतः ज्ञानसे जब उनकी यह सामर्थ्य पूर्णावस्थाको पहुँचती है, तभी समाजको छोड़ जानेकी स्वतंत्रता ज्ञानी पुरुषोंको देनेसे, उस समाजकीही अत्यंत हानि हुआ करती है; जिसकी भलाईके लिये चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था की गई है। शरीरसामर्थ्य न रहनेपरभी यदि कोई मनुष्य समाजको छोड़कर बनमें चला जावे, तो बात निराली है; अतः जान पड़ता है, कि संन्यास-आश्रमको बुढ़ापेकी मर्यादासे लपेटनेमें मनुका हेतुभी यही रहा होगा। परंतु, ऊपर कह चुके हैं, कि यह श्रेयस्कर मर्यादा आगे व्यवहारसे जाती रही। इसलिये 'कर्म कर' और 'कर्म छोड़' ऐसे द्विविध वेदवचनोंका मेल करनेके लियेही यदि स्मृतिकर्ताओंने आश्रमोंकी चढ़ती हुई श्रेणी बांधी हो, तोभी इन भिन्न भिन्न वेदवाक्योंकी एकवाक्यता करनेका, स्मृतिकारोंकी बराबरीकाही - कदाचित् उनसेभी अधिक - निर्विवाद अधिकार जिन भगवान् श्रीकृष्णको है, उन्होंने जनक प्रभृतिके प्राचीन ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक मार्गका भागवत-धर्मके नामसे पुनरुज्जीवन और पूर्ण समर्थन किया है। दोनोंमें भेद यही है, कि भागवत-धर्ममें केवल अध्यात्म-विचारोंपरही निर्भर न रहकर वासुदेव-भक्तिरूपी सुलभ साधनोंकोभी उसमें मिला दिया है। इस विषयपर आगे तेरहवें प्रकरणमें विस्तारपूर्वक विवेचन किया जावेगा। भागवत धर्म भक्तिप्रधान भलेही हो; पर उसमेंभी जनकके मार्गका यह महत्वपूर्ण तत्त्व विद्यमान है, कि परमेश्वरका ज्ञान पा चुकनेपर कर्मत्यागरूप संन्यास न लेकर केवल फलाशा छोड़कर ज्ञानी पुरुषोंकोभी लोकसंग्रहके निमित्त समस्त व्यवहार यावज्जीवन निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये; अतः कर्मदृष्टिसे ये दोनों मार्ग एक-से अर्थात् ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक या प्रवृत्ति-प्रधान होते हैं। साक्षात् परब्रह्मकेही अवतार - नर ओर नारायण ऋषि - इस प्रवृत्ति-प्रधान धर्मके प्रथम प्रवर्तक हैं; और इसीसे इस धर्मका प्राचीन नाम 'नारायणीय धर्म' है। ये दोनों ऋषि परम ज्ञानी थे; और लोगोंको निष्काम कर्म करनेका उपदेश देनेवाले तथा स्वयं निष्काम कर्म करनेवाले थे (मभा. उ. ४८. २१); और इसीसे महाभारतमें इस धर्मका वर्णन इस प्रकार किया गया है - "प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः" (मभा. शां. ३४७. ८१); अथवा "प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं