श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३४१ “ सारे कर्म शरीरके (विषयासक्तिरूप) रोग निकाल फेकनेके लिये हैं और ज्ञानही सबसे उत्तम और अंतिम गति है। जब कर्मोंसे शरीरका कषाय अथवा अज्ञानरूपी रोग नष्ट हो जाते हैं, तब रसज्ञानकी चाह उपजती है” (शां. २६९. ३८)। इसी प्रकार मोक्ष-धर्ममें पिंगला गीतामेंभी कहा है, कि “नैराश्यं परमं सुखम्” अथवा “योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्” - तृष्णारूप प्राणांतक रोग छूटे बिना सुख नहीं है (शां. १७४. ६५, ५८)। जाबाल और बृहदारण्यक उपनिषदोंके वचनोंके अतिरिक्त कैवल्य और नारायणोपनिषदमें वर्णन है, कि “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।” - कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे नहीं, किंतु त्यागसे (या न्यायसे) कुछ पुरुष मोक्ष प्राप्त करते हैं (कै. १. २; नारा. उ. १२. ३, ७८)। यदि गीताका यह सिद्धान्त है, कि ज्ञानी पुरुषकोभी अंततक कर्मही करते रहना चाहिये, तो अब बतलाना चाहिये, कि इन वचनोंकी व्यवस्था कैसे लगाई जावे ? इस शंकाके होनेसेही अर्जुनने अठारहवें अध्यायके आरंभमें भगवानसे पूछा है, कि “तो अब मुझे अलग अलग बतलाइये, कि संन्यासके माने क्या हैं ? और त्यागसे क्या समझँ ?” (गीता १८. १)। यह देखनेके पहले, कि भगवानने इस प्रश्नका क्या उत्तर दिया, स्मृति-ग्रंथोंमें प्रतिपादित इस आश्रम-मार्गके अतिरिक्त एक दूसरे तुल्यबल वैदिक मार्गकाभी यहांपर थोड़ा-सा विचार करना आवश्यक है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और अंतमें संन्यासी, इस प्रकार आश्रमोंकी इन चार चढ़ती हुई सीढ़ियोंके जीनेकोही 'स्मार्त' अर्थात् “स्मृतिकारोंका प्रतिपादन किया हुआ मार्ग” कहते हैं। 'कर्म कर' और 'कर्म छोड़' - वेदकी ऐसी जो दो प्रकारकी परस्पर-विरुद्ध आज्ञाएँ हैं, उनकी एकवाक्यता दिखलानेके लिये आयुके भेदके अनुसार आश्रमोंकी यह व्यवस्था स्मृतिकर्ताओंने की है, और कर्मोंके स्वरूपतः संन्यासहीको यदि अंतिम ध्येय मान लें, तो उस ध्येयकी सिद्धिके लिये, स्मृतिकारोंके निर्दिष्ट किये हुए आयु बितानेके चार सीढ़ियोंवाले इस आश्रम-मार्गको साधनरूप समझकर अनुचित नहीं कह सकते। आयुष्य बितानेके लिये इस प्रकारकी चढ़ती हुई सीढ़ियोंकी व्यवस्थासे संसारके व्यवहारका लोप न होकर, यद्यपि वैदिक कर्म और औपनिषदिक ज्ञानका मेल हो जाता है, तथापि अन्य तीनों आश्रमोंका अन्नदाता गृहस्थाश्रमही होनेके कारण मनुस्मृति और महाभारतमेंभी अंतमें उसकाही महत्त्व स्पष्टतया स्वीकृत हुआ है :- यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जंतवः। एवं गार्हस्थ्यमाश्रित्य वर्तन्त इतराश्रमाः ॥ लिया गया है। वहाँ इसका पाठ इस प्रकार है :- “कषायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते॥” महाभारतमें हमें यह श्लोक जैसे मिला है, हमने यहाँ वैसेही लिया है।