श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नातीकोभी चुकाना पड़ता था और किसीका कर्ज चुकानेसे पहलेही मर जानेमें बड़ी दुर्गति मानी जाती थी; इस बातपर ध्यान देनेसे पाठक सहजही जान जायँगे, कि जन्मसेही प्राप्त और उल्लिखित महत्त्वके सामाजिक कर्तव्योंको 'ऋण' कहनेमें हमारे शास्त्रकारोंका क्या हेतु था। कालिदासने रघुवंशमें कहा है, कि स्मृति- कारोंकी बतलाई हुई इस मर्यादाके अनुसार सूर्यवंशी राजा लोग चलते थे, और जब बेटा राज करने समर्थ हो जाता, तब उसे गद्दीपर बिठला कर, फिर ( पहलेसेही नहीं ) स्वयं गृहस्थाश्रमसे निवृत्त होते थे ( रघु. ७. ६८ ) । भागवतमें लिखा है, कि उक्त नियमका पालन न करके, पहले दक्ष प्रजापतिके हर्यश्वसंज्ञक पुत्रोंको और फिर शबलाश्वसंज्ञक दूसरे, अनेक पुत्रोंकोभी, उनके विवाहसे पहलेही, नारदने निवृत्तिमार्गका उपदेश देकर भिक्षु बना डाला; इससे इस अशास्त्र और गर्ह्य व्यवहारके कारण नारदकी निर्भर्त्सना करके दक्ष प्रजा- पतिने उन्हें शाप दिया ( भा ६. ५. ३५-४२ ) । इससे ज्ञात होता है, कि इस आश्रम-व्यवस्थाका मूल हेतु यह था, कि अपना गार्हस्थ्यजीवन यथाशास्त्र पूरा कर लड़कोंके गृहस्थी चलानेयोग्य सयाने हो जानेपर या, बुढ़ापेके निरर्थक हस्त- क्षेपसे उनकी उमंगके आड़े न आ, निरे मोक्षपरायण हो मनुष्य स्वयं आनंदपूर्वक संसारसे निवृत्त हो जावे । इसी हेतुसे विदुरनीतिमें धृतराष्ट्रसे विदुरने कहा है :- उत्पाद्य पुत्राननृणांश्च कृत्वा वृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय कांचिद् । स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा अरण्यसंस्थोऽथ मुनिर्बुभूषेत् ॥ “गृहस्थाश्रममें पुत्र उत्पन्न कर, उनके लिये कोई ऋण न रख छोड़े और उनकी जीविकाके लिये कुछ थोड़ा-सा प्रबंध कर तथा सब लड़कियोंके योग्य रीतेसे विवाह करा देनेपर, वानप्रस्थ हो संन्यास लेनेकी इच्छा करे” ( महा. उ. ३६. ३९ ) । आजकल हमारे यहाँ साधारण लोगोंकी संसार-संबंधी समझभी प्रायः विदुरके कथना- नुसारही है। तोभी, कभी-न-कभी तो संसारको छोड़ संन्यास लेनाही मनुष्यमात्रका परम साध्य माननेके कारण, संसारके व्यवहारोंकी सिद्धिके लिये स्मृतिप्रणेताओंने जान-बूझकर जो पहले तीन आश्रमोंकी श्रेयस्कर मर्यादा कर दी थी, वह धीरे धीरे छूटने लगी; और यहाँतक स्थिति आ पहुँची, कि यदि किसीको पैदा होतेही अथवा अल्प अवस्था मेंही ज्ञानकी प्राप्ति हो जावे, तो उसे इन तीन सीढ़ियोंपर चढ़नेकी कोई आवश्यकता नहीं रही, वह एकदम संन्यास ले ले, तो कोई हानि नहीं - “ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा” ( जाबा. ४ ) ! इसी अभिप्रायसे महाभारतके गोकापिलीय संवादमें कपिलने स्यूमरश्मिसे कहा है :- शरीरपंक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः । कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥ *
- वेदान्तसूत्रोंपर जो शांकरभाष्य है (शां. भा. ३. ४. २६), उससे यह श्लोक