भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 384

संन्यास और कर्मयोग ३३९ ( गृहस्थाश्रम ) करनेवाले, उतरती अवस्थामें मुनिवृत्तिसे या वानप्रस्थ धर्मसे रहने- वाले और अंतमें ( पातंजल ) योगसे संन्यास-धर्मके अनुसार ब्रह्मांडमें आत्माको ले जाकर प्राण छोड़नेवाले” - ऐसा सूर्यवंशके पराक्रमी राजाओंका वर्णन किया है ( रघु. १. ८ ) । ऐसेही महाभारतके शुकानुप्रश्नमें यह कहकर कि - चतुष्पदी हि निःश्रेणी ब्रह्मप्येषा प्रतिष्ठिता । एतामारुह्य निःश्रेणीं ब्रह्मलोके महीयते ॥ “( चार आश्रमरूपी ) चार सीढ़ियोंका यह जीना अंतमें ब्रह्मपदको जा पहुँचा है । इस जीनेसे ऊपर - अर्थात् एक आश्रमसे ऊपरके दूसरे आश्रममें - इस प्रकार चढ़ते जानेपर, अंतमें मनुष्य ब्रह्मलोकमें बड़प्पन पाता है” ( शां. २४१. १५ ); आगे इस क्रमका वर्णन किया है :- कषायं पाचयित्वाशु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु । प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् ॥ “इस जीनेकी तीन सीढ़ियोंमें मनुष्यको अपने किल्मिष ( पाप ) का अर्थात् स्वार्थ- परायण आत्मबुद्धिका अथवा विषयासक्तिरूप दोषका शीघ्रही क्षय करके फिर संन्यास लेना चाहिये । पारिव्राज्य अर्थात् संन्यासही सबसे श्रेष्ठ स्थान है” ( मभा. शां. २४४. ३ ) । एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जानेका यही सिलसिला मनुस्मृति- मेंभी दिया है ( मनु. ६. ३४ ) । परंतु यह बात मनुके ध्यानमें अच्छी तरह आ गई थी, कि इनमेंसे अंतिम अर्थात् संन्यास आश्रमकी ओर लोगोंकी आवश्यकतासे अधिक प्रवृत्ति होनेसे संसारका कर्तृत्व नष्ट हो जायगा; और समाजभी पंगु हो जायगा । इसीसे मनुने स्पष्ट मर्यादा बना दी है, कि पूर्वाश्रममें गृह-धर्मके अनुसार पराक्रम और लोकसंग्रहके सब कर्म अवश्य करने चाहिये; उसके पश्चात् - गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ “जब शरीरमें झुर्रियां पड़ने लगें; और नाती-पोतोंका मुंह दीख पड़े; तब गृहस्थ वानप्रस्थ होकर संन्यास ले लें” ( मनु. ६. २ ) । इस मर्यादाका पालन इसलिये करना चाहिये, क्योंकि मनुस्मृतिमेंही लिखा है, कि प्रत्येक मनुष्य जन्मके साथही अपनी पीठपर ऋषियों, पितरों और देवताओंके ( तीन ) ऋण ( कर्तव्य ) लेकर उत्पन्न हुआ है। इसलिये वेदाध्ययनसे ऋषियोंका, पुत्रोत्पादनसे पितरोंका और यज्ञकर्मोंसे देवताओंका - इस प्रकार, पहले इन तीनों ऋणोंको चुकाये बिना मनुष्य संसार छोड़कर संन्यास नहीं ले सकता । यदि वह ऐसा न करेगा, तो जन्मसेही पाये हुए उपर्युक्त ऋणोंको चुकता न करनेके कारण वह अधोगतिको पहुँचेगा ( मनु. ६. ३५-३७ और पिछले प्रकरणका तै. सं. मंत्र देखो ) । प्राचीन हिंदु-धर्मशास्त्रके अनुसार बापका कर्ज नियत समयके गुजर जानेका कारण न बतलाकर बेटे या