भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

संन्यास और कर्मयोग ३४३ ऋषिनारायणोऽब्रवीत् " - नारायण ऋषिका आरंभ किया हुआ धर्म आमरणान्त प्रवृत्ति-प्रधान है (मभा. शां. २१७. २) । भागवतमें स्पष्ट कहा है, कि यही सात्वत या भागवत धर्म है; और इस सात्वत या मूल भागवतधर्मका स्वरूप 'नैष्कर्म्यलक्षण' अर्थात् निष्काम प्रवृत्तिप्रधान था ( भाग. १. ३. ८; ११. ४. ६) । अनुगीताके इस श्लोकसे - "प्रवृत्तिलक्षणो योगः ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" - प्रकट होता है, कि इस प्रवृत्ति-मार्गकाही एक और नाम 'योग' था ( मभा. अश्व. ४३. २५ ) ; और इसीसे नारायणके अवतार श्रीकृष्णने, नरके अवतार अर्जुनको गीतामें जिस धर्मका उपदेश दिया है, उसको गीतामेंही 'योग' कहा है। आजकल कुछ लोगोंकी समझ है, कि भागवत और स्मार्त, दोनों पंथ उपास्यभेदके कारण पहले उत्पन्न हुए थे; पर हमारे मतमें यह समझ ठीक नहीं है । क्योंकि इन दोनों मार्गोंके उपास्य भिन्न भलेही हों; किंतु उनका अध्यात्मज्ञान एकही है। और अध्यात्मज्ञानकी नींव एकही होनेसे, यह संभव नहीं, कि इस उदात्त ज्ञानमें पारंगत प्राचीन ज्ञानी पुरुष केवल उपास्यके भेदको लेकर झगड़ते रहे हों। इसी कारणसे भगवद्गीता ( ९. १४ ) एवं शिवगीता ( १२. ४ ), दोनों ग्रंथोंमें कहा है, कि भक्ति किसीकीभी करो; पहुँचेगी वह एकही परमेश्वरको। और महाभारतके नारायणीय धर्ममें तो इन दोनों देवता- ओंका अभेद यों बतलाया गया है, कि नारायण और रुद्र एकही है और जो रुद्रके भक्त हैं, वेही नारायणके भक्त हैं; और जो रुद्रके द्वेषी हैं, वे नारायणकेभी द्वेषी हैं (मभा. शां. ३४१. २०-२६ ; ३४२. १२९) । हमारा यह कहना नहीं है, कि प्राचीन कालमें शैव और वैष्णवोंका भेदही न था। पर हमारे कथनका तात्पर्य यह है, कि स्मार्त और भागवत ये दोनों पंथ, शिव या विष्णुके उपास्य भेदभावके कारण भिन्न भिन्न नहीं हुए हैं; ज्ञानोत्तर निवृत्ति या प्रवृत्ति कर्म छोड़ें या नहीं - केवल इसी महत्त्वके विषयमें मतभेद होनेसे ये दोनों पंथ प्रथम उत्पन्न हुए हैं। आगे कुछ समयके बाद जब मूल भागवत धर्मका यह प्रवृत्ति-मार्ग या कर्मयोग लुप्त हो गया; और उसेभी केवल विष्णु-भक्तिप्रधान अर्थात् अनेक अंशोंमें निवृत्ति-प्रधान आधुनिक स्वरूप प्राप्त हो गया, एवं इसीके कारण जब वृथाभिमानसे ऐसे झगड़ें होने लगे, कि तेरा देवता 'शिव' है तो मेरा देवता 'विष्णु'; तब 'स्मार्त' और 'भागवत' शब्द क्रमशः 'शैव' और 'वैष्णव' शब्दोंके समानार्थक हो गये और अंतमे इन आधुनिक भागवत धर्मियोंका वेदान्त ( द्वैत या विशिष्टाद्वैत ) भिन्न हो गया; तथा वेदान्तके समानही ज्योतिष अर्थात् एकादशी और चंदन लगानेकी रीतितक स्मार्तमार्गसे निराली हो गई है। किंतु 'स्मार्त' शब्दसेही व्यक्त होता है, कि यह भेद सच्चा अर्थात् मूलका ( पुराना ) नहीं है। भागवत धर्म भगवान्काही प्रवृत्त किया हुआ है, इसलिये इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि इसका उपास्य देवभी श्रीकृष्ण या विष्णु है। परंतु 'स्मार्त' शब्दका धात्वर्थ 'स्मृत्युक्त' - केवल इतनाही - होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि स्मार्त धर्मका उपास्यदेव शिवही होना चाहिये । क्योंकि मनु आदि प्राचीन