श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
संन्यास और कर्मयोग ३४३ ऋषिनारायणोऽब्रवीत् " - नारायण ऋषिका आरंभ किया हुआ धर्म आमरणान्त प्रवृत्ति-प्रधान है (मभा. शां. २१७. २) । भागवतमें स्पष्ट कहा है, कि यही सात्वत या भागवत धर्म है; और इस सात्वत या मूल भागवतधर्मका स्वरूप 'नैष्कर्म्यलक्षण' अर्थात् निष्काम प्रवृत्तिप्रधान था ( भाग. १. ३. ८; ११. ४. ६) । अनुगीताके इस श्लोकसे - "प्रवृत्तिलक्षणो योगः ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" - प्रकट होता है, कि इस प्रवृत्ति-मार्गकाही एक और नाम 'योग' था ( मभा. अश्व. ४३. २५ ) ; और इसीसे नारायणके अवतार श्रीकृष्णने, नरके अवतार अर्जुनको गीतामें जिस धर्मका उपदेश दिया है, उसको गीतामेंही 'योग' कहा है। आजकल कुछ लोगोंकी समझ है, कि भागवत और स्मार्त, दोनों पंथ उपास्यभेदके कारण पहले उत्पन्न हुए थे; पर हमारे मतमें यह समझ ठीक नहीं है । क्योंकि इन दोनों मार्गोंके उपास्य भिन्न भलेही हों; किंतु उनका अध्यात्मज्ञान एकही है। और अध्यात्मज्ञानकी नींव एकही होनेसे, यह संभव नहीं, कि इस उदात्त ज्ञानमें पारंगत प्राचीन ज्ञानी पुरुष केवल उपास्यके भेदको लेकर झगड़ते रहे हों। इसी कारणसे भगवद्गीता ( ९. १४ ) एवं शिवगीता ( १२. ४ ), दोनों ग्रंथोंमें कहा है, कि भक्ति किसीकीभी करो; पहुँचेगी वह एकही परमेश्वरको। और महाभारतके नारायणीय धर्ममें तो इन दोनों देवता- ओंका अभेद यों बतलाया गया है, कि नारायण और रुद्र एकही है और जो रुद्रके भक्त हैं, वेही नारायणके भक्त हैं; और जो रुद्रके द्वेषी हैं, वे नारायणकेभी द्वेषी हैं (मभा. शां. ३४१. २०-२६ ; ३४२. १२९) । हमारा यह कहना नहीं है, कि प्राचीन कालमें शैव और वैष्णवोंका भेदही न था। पर हमारे कथनका तात्पर्य यह है, कि स्मार्त और भागवत ये दोनों पंथ, शिव या विष्णुके उपास्य भेदभावके कारण भिन्न भिन्न नहीं हुए हैं; ज्ञानोत्तर निवृत्ति या प्रवृत्ति कर्म छोड़ें या नहीं - केवल इसी महत्त्वके विषयमें मतभेद होनेसे ये दोनों पंथ प्रथम उत्पन्न हुए हैं। आगे कुछ समयके बाद जब मूल भागवत धर्मका यह प्रवृत्ति-मार्ग या कर्मयोग लुप्त हो गया; और उसेभी केवल विष्णु-भक्तिप्रधान अर्थात् अनेक अंशोंमें निवृत्ति-प्रधान आधुनिक स्वरूप प्राप्त हो गया, एवं इसीके कारण जब वृथाभिमानसे ऐसे झगड़ें होने लगे, कि तेरा देवता 'शिव' है तो मेरा देवता 'विष्णु'; तब 'स्मार्त' और 'भागवत' शब्द क्रमशः 'शैव' और 'वैष्णव' शब्दोंके समानार्थक हो गये और अंतमे इन आधुनिक भागवत धर्मियोंका वेदान्त ( द्वैत या विशिष्टाद्वैत ) भिन्न हो गया; तथा वेदान्तके समानही ज्योतिष अर्थात् एकादशी और चंदन लगानेकी रीतितक स्मार्तमार्गसे निराली हो गई है। किंतु 'स्मार्त' शब्दसेही व्यक्त होता है, कि यह भेद सच्चा अर्थात् मूलका ( पुराना ) नहीं है। भागवत धर्म भगवान्काही प्रवृत्त किया हुआ है, इसलिये इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि इसका उपास्य देवभी श्रीकृष्ण या विष्णु है। परंतु 'स्मार्त' शब्दका धात्वर्थ 'स्मृत्युक्त' - केवल इतनाही - होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि स्मार्त धर्मका उपास्यदेव शिवही होना चाहिये । क्योंकि मनु आदि प्राचीन
३४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्मृति-ग्रंथोंमें यह नियम कहींभी नहीं है, कि एक शिवकीही उपासना करनी चाहिये । इसके विपरीत, विष्णुकाही वर्णन अधिक पाया जाता है और कुछ स्थलोंपर तो गणपति प्रभृतिकोभी उपास्य बतलाया है। इसके सिवा शिव और विष्णु, दोनों देवता वैदिक हैं अर्थात् वेदमैंही इनका वर्णन किया गया है, इसलिये इनमेंसे एककोही स्मार्त कहना ठीक नहीं है। श्रीशंकराचार्य स्मार्त मतके पुरस्कर्ता कहे जाते हैं। पर शांकर मठमें उपास्य-देवता शारदा है और शांकरभाष्यमें जहाँ जहाँ प्रतिमा-पूजनका प्रसंग छिड़ा है, वहाँ वहाँ आचार्यने शिवलिंगका निर्देश न कर शालग्राम अर्थात् विष्णु-प्रतिमाकाही उल्लेख किया है (वे. सू. शां. भा. १. २. ७; १. ३. १४; ४. १. ३; छां. शां. भा. ८. १. १)। इसी प्रकार कहा जाता है, कि पंचदेवपूजाका प्रारंभभी पहले पहल शंकराचार्यनेही किया था। इन सब बातोंका विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि केवल 'शिवभक्त' या 'विष्णुभक्त' इनपर ध्यान नहीं देना चाहिये। किंतु जिनकी दृष्टिसे स्मृति-ग्रंथोंमेंही पहले स्पष्ट रीतिसे वर्णित आश्रम- व्यवस्थाके अनुसार तरुण अवस्थामें यथाशास्त्र संसारके सब कार्य करनेपर बुढ़ापेमें समस्त कर्म छोड़ चतुर्थाश्रम या संन्यास लेनाही अंतिम साध्य था, वेही स्मार्त कहलाते थे और जो लोग भगवानके उपदेशानुसार यह समझते थे, कि ज्ञान एवं उज्ज्वल भगवद्भक्तिके साथ-ही-साथ मरणपर्यंत गृहस्थाश्रमकेही कार्य निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये, उन्हें भागवत कहते थे। इन दोनों शब्दोंके मूल अर्थ यही हैं; और इसीसे ये दोनों शब्द, सांख्य और योग अथवा संन्यास और कर्मयोगके क्रमशः समानार्थक होते हैं। भगवानके अवतारकृत्यसे कहो या ज्ञानयुक्त गार्हस्थ्य-धर्मके महत्त्वपर ध्यान देनेसे कहो; संन्यास-आश्रम लुप्त-सा हो गया था; और कलि- वर्ज्योंमें अर्थात् कलियुगमें जिन बातोंको शास्त्रने निषिद्ध माना है, उनमें संन्यासकी गिनती की गई थी।* फिर जैन और बौद्ध धर्मके प्रवर्तकोंने कापिलसांख्यके मतको स्वीकारकर, इस मतका विशेष प्रचार किया, कि संसारका त्यागकर संन्यास लिये- बिना मोक्ष नहीं मिलता। इतिहासमें प्रसिद्ध है, कि बुद्धने स्वयं तरुण अवस्थामेंही राजपाट, स्त्री और बाल-बच्चोंको छोड़कर संन्यास-दीक्षा ले ली थी। यद्यपि श्री- शंकराचार्यने जैन और बौद्ध मतोंका खंडन किया है, तथापि जैन और बौद्धोंने जिस संन्यास-धर्मका विशेष प्रचार किया था, उसेही श्रौत-स्मार्त संन्यास कहकर आचार्यने कायम रखा। और उससे उन्होंने गीताका इत्यर्थभी ऐसा निकाला, कि वही संन्यास- धर्म गीताका प्रतिपाद्य विषय है। परंतु वास्तवमें गीता स्मार्त-मार्गका ग्रंथ नहीं है
- निर्णयसिंधुके तृतीय परिच्छेदका कलिवर्ज्य प्रकरण देखो। इसमें "अग्नि- होत्रं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम् । देवराच्च सुतोत्पत्तिः कलौ पंच विवर्जयेत् ” और “संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता” इत्यादि स्मृतिवचन हैं। अर्थ : अग्निहोत्र, गोवध, संन्यास, श्राद्धमें मांस-भक्षण और नियोग, कलियुगमें ये पाँचों निषिद्ध हैं। इनमेंसे संन्यासका निषिद्धत्व श्रीशंकराचार्यने पीछेसे निकाल डाला।
संन्यास और कर्मयोग ३४५ और यद्यपि सांख्य या संन्यास-मार्गसेही गीताका आरंभ हुआ है, तोभी आगे सिद्धान्त- पक्षमें प्रवृत्ति-प्रधान भागवत-धर्मही उसमें प्रतिपादित है, इस प्रकार यह स्वयं महा- भारतकारका वचन है, जो हम पहलेही प्रकरणमें दे चुके हैं। इन दोनों पंथोंके वैदिकही होनेके कारण सब अंशोंमें न सही; तो अनेक अंशोंमें दोनोंकी एकवाक्यता करना शक्य है। परंतु ऐसी एकवाक्यता करना एक बात है; और यह कहना दूसरी बात है, कि गीतामें संन्यास-मार्गही प्रतिपाद्य है और यदि कहीं कर्म-मार्गको मोक्षप्रद कहा हो, तो वह सिर्फ़ अर्थवाद या पोची स्तुति है। रुचिवैचित्र्यके कारण किसीको भागवत धर्मकी अपेक्षा स्मार्त-धर्मही बहुत प्यारा जँचेगा, अथवा कर्मसंन्यासके लिये जो कारण सामान्यतः बतलाये जाते हैं, वेही उसे अधिक बलवान् प्रतीत होंगे, नहीं कौन कहे ? उदाहरणार्थ, इसमें किसीको शंका नहीं, कि श्रीशंकराचार्यको स्मार्त या संन्यास-धर्मही मान्य था; अन्य सब मार्गोंको वे अज्ञानमूलक मानते थे। परंतु सिर्फ़ उसी कारणसे यह नहीं कहा जा सकता, कि गीताका भावार्थभी वही होना चाहिये। यदि तुम्हें गीताका सिद्धान्त मान्य नहीं है, तो कोई चिंता नहीं, उसे न मानो। परंतु उससे गीताके आरंभमें जो कहा है, कि “इस संसारमें आयु बितानेके दो प्रकारके स्वतंत्र मोक्षप्रद मार्ग अथवा निष्ठाएँ हैं” उसका ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है कि “संन्यास-निष्ठाही एकमात्र सच्चा और श्रेष्ठ मार्ग है।” गीतामें वर्णित ये दोनों मार्ग, वैदिक धर्ममें, जनक और याज्ञवल्क्यके पहलेसेही स्वतंत्र रीतिसे चले आ रहे हैं। पता लगता है, कि जनकके समान समाजके धारण और पोषण करनेके अधिकार क्षात्र-धर्मके अनुसार, वंशपरंपरासे या अपनी सामर्थ्यसे जिनको प्राप्त हो जाते थे, वे ज्ञानप्राप्तिके पश्चात्भी निष्काम बुद्धिसे अपने काम जारी रखकर जगत्का कल्याण करनेमेंही अपनी सारी आयु लगा देते थे। समाजके इस अधिकारपर ध्यान देकरही महाभारतमें अधिकार-भेदसे दोहरा वर्णन आया है, कि “सुखं जीवन्ति मुनयो भैक्ष्यवृत्तिं समाश्रिताः” (शां. १७८. ११) – जंगलोंमें रहनेवाले मुनि आनंदसे भिक्षावृत्तिको स्वीकार करते हैं – और “दंड एव हि राजेंद्र क्षात्रधर्मो न मुण्डनम्” (मभा. शां. २३. ४६) – दंडसे लोगोंका धारण- पोषण करनाही क्षत्रियका धर्म है; मुंडन करा लेना नहीं। परंतु इससे यहभी न समझ लेना चाहिये, कि सिर्फ़ प्रजापालनके अधिकारी क्षत्रियोंकोही, उनके अधिकारके कारण, कर्मयोग विहित था। कर्मयोगके उल्लिखित वचनका ठीक भावार्थ यह है, कि जो जिस कर्मके करनेका अधिकारी हो, वह ज्ञानके पश्चात्भी उस कर्मको करता रहे; और इसी कारणसे महाभारतमें कहा है, कि “एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते” (शां. २३७) – ज्ञानके पश्चात् ब्राह्मणभी अपने अधिकारानुसार यज्ञ- याग आदि कर्म प्राचीन कालमें जारी रखते थे। मनुस्मृतिमेंभी संन्यास आश्रमके बदले सब वर्णोंके लिये वैदिक कर्मयोगही विकल्पसे विहित माना गया है (मनु. ६. ८६–९६)। इसी तरह यह कहीं नहीं लिखा है, कि भागवतधर्म केवल क्षत्रियों-
३४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र केही लिये है; प्रत्युत उसकी महत्ता यह कहकर गाई है, कि स्त्री और शूद्र आदि सब लोगोंको वह सुलभ है (गीता ९. ३२) । महाभारतमेंभी ऐसी कथाएँ हैं, कि तुलाधार (वैश्य) और व्याध (बहेलिया) इसी धर्मका आचरण करते थे; और उन्होंने ब्राह्मणोंकोभी उसका उपदेश किया था (मभा. शां. २६१; वन. २१५) । निष्काम कर्मयोगका आचरण करनेवाले प्रमुख पुरुषोंके जो उदाहरण भागवत धर्म- ग्रंथोंमें दिये जाते हैं, वे केवल जनक-श्रीकृष्ण आदि क्षत्रियोंकेही नहीं हैं; प्रत्युत उनमें वसिष्ठ, जैगीषव्य और व्यास प्रभृति ज्ञानी ब्राह्मणोंकाभी समावेश रहता है। यह न भूलना चाहिये, कि यद्यपि गीतामें कर्ममार्गही प्रतिपाद्य है, तोभी निरे कर्म अर्थात् ज्ञानरहित कर्म करनेके मार्गको गीता मोक्षप्रद नहीं मानती। ज्ञानरहित कर्म करनेकेभी दो भेद हैं। एक तो दंभसे या आसुरी बुद्धिसे कर्म करना और दूसरा श्रद्धासे। इनमेंसे दंभके मार्ग या आसुरी मार्गको केवल गीतानेही नहीं (गीता १६. १६; १७. २८) तो मीमांसकोंनेभी गर्ह्य तथा नरकप्रद माना है; एवं ऋग्वेदमेंभी अनेक स्थलोंपर श्रद्धाकी महत्ता वर्णित है (ऋ. १०. १५१; ९. ११३. २; २. १२. ५)। परंतु दूसरे मार्गके विषयमें- अर्थात् ज्ञान-व्यतिरिक्त किंतु शास्त्रोंपर श्रद्धा रखकर कर्म करनेके मार्गके विषयमें- मीमांसकोंका कहना है, कि परमेश्वरके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान न हो; तोभी शास्त्रोंपर विश्वास रखकर केवल श्रद्धापूर्वक यज्ञायाग आदि कर्म मरणपर्यंत करते जानेसे अंतमें मोक्षही मिलता है। पिछले प्रकरण- में कह चुके हैं, कि कर्मकांडरूपसे मीमांसकोंका यह मार्ग बहुत प्राचीन कालसे चला आ रहा है। वेदसंहिता और ब्राह्मणोंमें यह कहींभी नहीं कहा गया है, कि संन्यास आश्रम आवश्यक है; उलटे जैमिनीने वेदोंका यही स्पष्ट मत बतलाया है, कि गृहस्थाश्रममें रहनेसेही मोक्ष मिलता है (वे. सू. ३. ४. १७-२०) और उसका यह कथन निराधारभी नहीं है। क्योंकि कर्मकांडके इस प्राचीन मार्गको गौण माननेका आरंभ उपनिषदोंमेंही पहले पहल देखा जाता है। यद्यपि उपनिषद् वैदिक हैं, तथापि उनके विषय-प्रतिपादनसे प्रकट होता है, कि वे संहिता और ब्राह्मणोंके पीछेके हैं, इसके माने यह नहीं, कि उसके पहले परमेश्वरका ज्ञान हुआही न था। हाँ, उप- निषत्कालमेंही यह मत पहले पहल अमलमें अवश्य आने लगा, कि मोक्ष पानेके लिये ज्ञानके पश्चात् वैराग्यसे कर्मसंन्यास करना चाहिये और उसके पश्चात् संहिता एवं ब्राह्मणोंमें वर्णित कर्मकांडको गौणत्व आ गया। उसके पहले कर्मही प्रधान माना जाता था। उपनिषत्कालमें वैराग्ययुक्त ज्ञान अर्थात् संन्यासकी इस प्रकार जीत होने लगनेपर यज्ञायाग प्रभृति कर्मोंकी ओर या चातुर्वर्ण्य धर्मकी ओरभी ज्ञानी पुरुष योंही दुर्लक्ष करने लगे; और तभीसे यह समझ मंद होने लगी, कि लोकसंग्रह करना हमारा कर्तव्य है। स्मृति-प्रणेताओंने अपने अपने ग्रंथोंमें यह कहकर, कि गृहस्थाश्रममें यज्ञायाग आदि श्रौत या चातुर्वर्ण्यके स्मार्त कर्म करनेही चाहिये, गृहस्था- श्रमकी बड़ाई गाई है सही; परंतु स्मृतिकारोंके मतमें और अंतमेंभी वैराग्य, संन्यास
आश्रमही श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उपनिषदोंके ज्ञानप्रवाहसे कर्मकांडको जो गौणता प्राप्त हो गई थी, उसको हटानेकी सामर्थ्य स्मृतिकारोंकी आश्रम-व्यवस्थामें नहीं रह सकती थी । ऐसी अवस्थामें ज्ञानकांड और कर्मकांडमेंसे किसीकोभी गौण न कहकर भक्तिके साथ इन दोनोंका मेलकर देनेके लिये गीताकी प्रवृत्ति हुई है। उपनिषत्-प्रणेताओंके ये सिद्धान्त गीताको मान्य हैं, कि ज्ञानके बिना मोक्षप्राप्ति नहीं होती; और यज्ञ-याग आदि कर्मोंसे, यदि बहुत हुआ तो, स्वर्गप्राप्ति हो जाती है (मुंड. १. २. १०; गीता २. ४१-४५) । परंतु गीताका यहभी सिद्धान्त है, कि सृष्टिक्रमको जारी रखनेके लिये यज्ञ अथवा कर्मके चक्रकोभी कायम रखना चाहिये
- कर्मोंको कभीभी छोड़ देना निरा पागलपन या मूर्खता है। इसलिये गीताका उपदेश है, कि यज्ञयाग आदि श्रौत कर्म अथवा चातुर्वर्ण्य आदि व्यावहारिक कर्म अज्ञानपूर्वक श्रद्धासे न करके ज्ञान-वैराग्ययुक्त बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर करो। इससे यज्ञचक्रभी नहीं बिगड़ने पायेगा; और तुम्हारे किये हुए कर्म मोक्षके आड़ेभी नहीं आवेंगे। कहना नहीं होगा, कि ज्ञानकांड और कर्मकांडका (संन्यास और कर्म) मेल मिलानेकी गीताकी यह शैली स्मृति-कर्ताओंकी अपेक्षा अधिक सरस है। क्योंकि व्यष्टिरूप आत्माका कल्याण यत्किंचित्भी न घटाकर उसके साथ सृष्टिके समष्टिरूप आत्माका कल्याणभी गीता-मार्गसे साधा जाता है। मीमांसक कहते हैं, कि कर्म अनादि और वेदप्रतिपादित हैं, इसलिये ज्ञान न हो, तोभी कर्म श्रद्धासे करनेही चाहिये। कितनेही (सब नहीं) उपनिषत्प्रणेता कर्मोंको गौण मानते हैं और यह कहते हैं - या यह माननेमें कोई क्षति नहीं, कि निदान उनका झुकाव ऐसाही है - कि कर्मोंको वैराग्यसे छोड़ देना चाहिये; और स्मृतिकार आयुके भेदसे - अर्थात् आश्रम- व्यवस्थासे उक्त दोनों मतोंकी इस प्रकार एकवाक्यता करते हैं, कि पूर्व आश्रमोंमें इन कर्मोंको करते रहना चाहिये और फिर चित्तशुद्धि हो जानेपर बुढ़ापेमें वैराग्यसे उन सब कर्मोंको छोड़कर संन्यास ले लेना चाहिये। परंतु गीताका माग इन तीनों पंथोंसे भिन्न है। ज्ञान और काम्य कर्मोंके बीच, यदि विरोध हो, तोभी ज्ञान और निष्काम कर्मोंमें कोई विरोध नहीं; इसीलिये गीताका कथन है, कि निष्काम बुद्धिसे सब कर्म सर्वदा करते रहो, उन्हें कभी मत छोड़ो। अब इन चारों मतोंकी तुलना करनेसे दीख पड़ेगा, कि यह मत सभीको मान्य है, कि ज्ञान होनेके पहले कर्मकी आवश्यकता है; परंतु उपनिषदों और गीताका कथन है; कि ऐसी स्थितिमें श्रद्धासे किये हुए कर्मका फल, केवल स्वर्गके सिवा दूसरा कुछ नहीं होता। इसके आगे, अर्थात् ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपर, कर्म किये जावें या नहीं - इस विषयमें उपनिषत्- कर्ताओंमेंभी मतभेद है। कई उपनिषत्कर्ताओंका मत है, कि ज्ञानसे समस्त काम्य बुद्धिका ह्रास हो चुकनेपर जो पुरुष मोक्षका अधिकारी हो गया है, उसे केवल स्वर्गकी प्राप्ति करा देनेवाले काम्य कर्म करनेका कुछभी प्रयोजन नहीं रहता; परंतु ईशावास्य आदि दूसरे कई उपनिषदोंमें प्रतिपादन किया गया है, कि मृत्यु-
३४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोकके व्यवहारोंको जारी रखनेके लिये उपरोक्त कर्म करनेही चाहिये। यह प्रकट है, कि उपनिषदोंमें वर्णित इन दो मार्गोंमेंसे दूसरा मार्गही गीतामें प्रतिपादित है (गीता ५. २)। परंतु यद्यपि यह कहें, कि मोक्षके अधिकारी ज्ञानी पुरुषको निष्काम बुद्धिसे लोकसंग्रहार्थ सब व्यवहार करने चाहिये; तथापि इस स्थानपर यह शंका आपही उत्पन्न होती है, कि जिन यज्ञयाग आदि कर्मोंका फल स्वर्गप्राप्तिके सिवा दूसरा कुछ नहीं, उन्हें वह करेही क्यों ? इसीसे अठारहवें अध्यायके आरंभमें इसी शंकाको उपस्थित कर भगवानने स्पष्ट निर्णयकर दिया है, कि ‘यज्ञ, दान, तप’ आदि कर्म सदैव चित्तशुद्धिकारक अर्थात् निष्काम बुद्धि उपजाने और बढ़ानेवाले हैं, इसलिये 'इन्हेंभी' (एतान्यपि) अन्य निष्काम कर्मोंके समानही लोकसंग्रहार्थ ज्ञानी पुरुषको फलाशा और संग छोड़कर सदा करते रहना चाहिये (गीता १८. ६)। परमेश्वरको अर्पणकर इस प्रकार सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करते रहनेसे, व्यापक अर्थमें, यह एक बड़ा भारी यज्ञही हो जाता है और फिर इस यज्ञके लिये जो कर्म किया जाता है, वह बंधन नहीं होता (गीता ४. २३)। किंतु सभी काम निष्काम बुद्धिसे करनेके कारण यज्ञसे जो स्वर्गप्राप्तिरूप बंधक फल मिलनेवाला था, वहभी नहीं मिलता; और ये सब कर्म मोक्षके आड़े आ नहीं सकते। सारांश, मीमांसकोंका कर्मकांड यदि गीतामें कायम रखा गया हो, तोभी वह इसी रीतिसे कायम रखा गया है, कि उससे स्वर्गका आना-जाना छूट जाता है और सभी कर्म निष्काम बुद्धिसे करनेके कारण अंतमें मोक्षप्राप्ति हुए बिना नहीं रहती। ध्यान रखना चाहिये, कि मीमांसकोंके कर्ममार्ग और गीताके कर्मयोगमें यही महत्त्वका भेद है - दोनों एक नहीं हैं। यहाँ बतला दिया, कि भगवद्गीतामें प्रवृत्ति-प्रधान भागवत-धर्म या कर्मयोगही प्रतिपाद्य है, और इस कर्मयोगमें तथा मीमांसकोंके कर्मकांडमें कौनसा भेद है। अब तात्त्विक दृष्टिसे इस बातका थोड़ा-सा विचार करते हैं, कि गीताके कर्मयोगमें और ज्ञानकांडको लेकर स्मृतिकारोंकी वर्णन की हुई आश्रम-व्यवस्थामें क्या भेद है। यह भेद बहुतही सूक्ष्म है, और सच पूछो तो इसके विषयमें वाद करनेका कारणभी नहीं है। दोनों पक्ष मानते हैं, कि ज्ञानप्राप्ति होनेतक चित्तकी शुद्धिके लिये प्रथम दो आश्रमोंके (ब्रह्मचारी और गृहस्थ) कृत्य सभीको करने चाहिये। मतभेद सिर्फ़ इतनाही है, कि पूर्ण ज्ञान हो चुकनेपर कर्म करें या संन्यास ले लें ? संभव है, कई लोग यह समझें, कि सदा ऐसे ज्ञानी पुरुष किसी समाजमें थोड़ेही रहेंगे ? इसलिये इन थोड़े-से ज्ञानी पुरुषोंका कर्म करना या न करना एकही-सा है। इस विषयमें विशेष चर्चा करनेकी आवश्यकता नहीं। परंतु यह समझ ठीक नहीं। क्योंकि ज्ञानी पुरुषके बर्तावको और लोग प्रमाण मानते हैं। और अपने अंतिम साध्यके अनुसारही बर्ताव करनेकी मनुष्य पहलेसे आदत डालता है, इसलिये लौकिक दृष्टिसे यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वका हो जाता है, कि "ज्ञानी पुरुषको क्या करना चाहिये ?" स्मृति-ग्रंथोंमें तो
कहा है, कि ज्ञानी पुरुष अंतमें संन्यास ले लें; परंतु ऊपर कह चुके हैं, कि स्मार्त-मार्गके अनुसारही इस नियमके कुछ अपवादभी हैं। उदाहरण लीजिये; बृहदारण्यकोप- निषदमें याज्ञवल्क्यने जनकको ब्रह्मज्ञानका बहुत उपदेश किया है, पर उन्होंने जनकसे यह कहींभी नहीं कहा, कि "अब तुम राजपाट छोड़कर संन्यास ले लो।" उलटे यह कहा है, कि जो ज्ञानी पुरुष ज्ञानके पश्चात् संसारको छोड़ देते हैं, वे इसलिये उसे छोड़ देते हैं, कि संसार उन्हें रुचता नहीं है "न कामयन्ते" (बृ. ४. ४. २२)। इससे बृहदारण्यकोपनिषदका यह अभिप्राय व्यक्त होता है, कि ज्ञानके पश्चात् संन्यास लेना या न लेना अपनी अपनी खुशीकी अर्थात् वैकल्पिक बात है। ब्रह्मज्ञान और संन्यासका संबंध नित्य नहीं, और वेदान्तसूत्रमें बृहदारण्यकोपनिषदके इस वचनका अर्थ वैसेही लगाया गया है (वे. सू. ३. ४. १५)। शंकराचार्यका निश्चित सिद्धान्त है, कि ज्ञानोत्तर कर्मसंन्यास किये बिना मोक्ष मिल नहीं सकता, इसलिये अपने भाष्यमें उन्होंने इस मतकी पुष्टिमें सब उपनिषदोंकी अनुकूलता दिखलानेका प्रयत्न किया है तथापि शंकराचार्यनेभी स्वीकार किया है, कि जनक आदिके समान ज्ञानोत्तरभी अधिकारानुसार जीवनभर कर्म करते रहनेमें कोई क्षति नहीं है (वे. सू. शां. भा. ३. ३.३२; गीता शां. भा. २. ११; ३. २०)। इससे स्पष्ट विदित होता है, कि संन्यास या स्मार्त-मार्गकोभी ज्ञानके पश्चात् कर्म बिलकुलही त्याज्य नहीं जँचते, कुछ ज्ञानी पुरुषोंको अपवाद मान, अधिकारके अनुसार कर्म करनेकी स्वतंत्रता इस मार्गमेंभी दी गई है। इसी अपवादको और व्यापक बना कर गीता कहती है, कि चातुर्वर्ण्यके लिये विहित कर्म ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपरभी, लोकसंग्रहके निमित्त केवल कर्तव्य समझकर प्रत्येक ज्ञानी पुरुषको निष्काम बुद्धिसे करना चाहिये। इससे सिद्ध होता है, कि गीता- धर्म व्यापक हो, तोभी उसका तत्त्व संन्यास-मार्गवालोंकी दृष्टिसेभी निर्दोष है, और वेदान्तसूत्रोंको स्वतंत्र रीतिसे पढ़नेपर जान पड़ेगा, कि उनमेंभी ज्ञानयुक्त कर्मयोग संन्यासका विकल्प समझकर ग्राह्य माना गया है। (वे. सू. ३. ४. २६; ३. ४. ३२-३५)।* अब यह बतलाना आवश्यक है, कि निष्काम बुद्धिसेही क्यों न हो, पर जब मरणपर्यंत कर्मही करने हैं, तब स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित कर्मत्यागरूपी चतुर्थ आश्रम या संन्यास आश्रमकी क्या दशा होगी ? अर्जुन अपने मनमें यही सोच रहा था, कि भगवान् कभी-न-कभी कहेंगेही, कि कर्मत्यागरूपी संन्यास लियेबिना मोक्ष नहीं मिलता; और तब भगवान्के मुखसेही युद्ध छोड़नेके लिये मुझे स्वतंत्रता मिल जावेगी। परंतु अब अर्जुनने देखा, कि सत्रहवें अध्यायके अंततक भगवान्के कर्मत्यागरूप संन्यास आश्रमकी बात नहीं की; बार-बार केवल यही उपदेश किया, कि फलाशाको
- वेदान्तसूत्रके इस अधिकरणका अर्थ शांकरभाष्यमें कुछ निराला है। परंतु 'विहितं त्वच्चाश्रमकर्माणि 'का (३. ४. ३२) अर्थ हमारे मतमें ऐसा है, कि "ज्ञानी पुरुष आश्रम-कर्मभी करें, तो अच्छा है। क्योंकि वह विहित है।" सारांश, हमारी समझसे वेदान्तसूत्रमें ये दोनों पक्ष स्वीकृत हैं, कि "ज्ञानी पुरुष कर्म करे चाहे न करे।"
३५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र छोड़ दे; तब अठारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने भगवान्से अंतमें प्रश्न किया है, कि "तो फिर मुझे बतलाइये कि, संन्यास और त्यागमें क्या तत्त्व है?" अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं, "अर्जुन ! यदि तुमने समझा हो, कि मैंने इतने समयतक जो कर्मयोग-मार्ग बतलाया है, उसमें संन्यास नहीं है, तो वह समझ गलत है। कर्मयोगी पुरुष सब कर्मोंके दो भेद करते हैं - एकको कहते हैं 'काम्य' अर्थात् आसक्त बुद्धिसे किये कर्म; और दूसरेको कहते हैं 'निष्काम' अर्थात् आसक्ति- को छोड़कर किये गये कर्म। (मनु. १२. ८९ में इन्ही कर्मोंको क्रमसे 'प्रवृत्त' और 'निवृत्त' नाम दिये है।) इनमेंसे 'काम्य' वर्गके जितने कर्म हैं, उन सबको कर्म- योगी बिलकुल छोड़ देता है - अर्थात् वह उनका 'संन्यास' करता है। बाकी रह गये 'निष्काम' या निवृत्त कर्म। सो कर्मयोगी ये निष्काम कर्म करता तो है, पर उन सबमें फलाशाका 'त्याग' सर्वथैव रहता है। सारांश, कर्मयोग-मार्गमेंभी 'संन्यास' और 'त्याग' छूटा कहाँ है? स्मार्त मार्गवाले कर्मका स्वरूपतः संन्यास करते हैं, तो उसके स्थानमें कर्म-मार्गके योगी कर्मफलाशाका संन्यास करते हैं- इस तरह संन्यास दोनों ओर कायमही है" (गीता १८. १-६ पर हमारी टीका देखो)। भागवत धर्मका यह मुख्य तत्त्व है, कि जो पुरुष अपने सभी कर्म परमेश्वरको अर्पणकर निष्काम बुद्धिसे करने लगे, वह गृहस्थाश्रमी हो तोभी उसे 'नित्य-संन्यासीही' कहना चाहिये (गीता ५. ३)। और भागवत-पुराणमें पहले सब आश्रम-धर्म बतला कर अंतमें नारदने युधिष्ठिरको इसी तत्त्वका उपदेश किया है। वामन पंडितने गीतापर जो यथार्थदीपिका नामक टीका लिखी है, उसके (य. दी. १८. २) कथनानुसार "शिखा बोडुनि तोडिला दोरा" - मुंड मुंडानेपर और जनेऊ तोड़कर या हाथमें दंड लेकर भिक्षा मांगकर, अथवा सब कर्म छोड़कर जंगलमें जा रहनेपरभी संन्यास नहीं हो जाता। संन्यास और वैराग्य बुद्धिके धर्म हैं; दंड, चोटी या जनेऊके नहीं। यदि कहो, कि ये दंड आदिकेही धर्म हैं; बुद्धिके अर्थात् ज्ञानके नहीं; तो राजछत्र अथवा छतरीकी डांडी पकड़नेवालेकोभी संन्यासीको प्राप्त होनेवाला मोक्ष मिलना चाहिये। जनकगुलभा-संवादमें ऐसेही कहा है (शां. ३२०-४२) :- त्रिदण्डादिषु यद्यस्ति मोक्षो ज्ञाने न कस्यचित् । छत्रादिषु कथं न स्यात्तुल्यहेतौ परिग्रहे ॥ क्योंकि दंडपरिग्रह अर्थात् हाथमें दंड धारण करनेमें, यह मोक्षका हेतु दोनों स्थानोंमें एकही है। तात्पर्य यही, कि कायिक, वाचिक और मानसिक संयमही सच्चा त्रिदंड है (मनु. १२. १०); और सच्चा संन्यास काम्यबुद्धिका संन्यास है (गीता १८. २)। एवं वह जिस प्रकार भागवत धर्ममें नहीं छूटता (गीता ६. २) उसी प्रकार बुद्धिको स्थिर रखनेका कर्म या भोजन आदि कर्मभी सांख्य-मार्गमें अंततक छूटताही नहीं है। फिर ऐसी क्षुद्र शंकाएँ करके भगवे या सफ़ेद कपड़ोंके लिये झगड़नेसे क्या लाभ होगा, कि त्रिदंडी या कर्मत्यागरूप संन्यास कर्मयोग-मार्गमें नहीं है, इसलिये
संन्यास और कर्मयोग ३५१ वह मार्ग स्मृतिविरुद्ध या त्याज्य है। भगवान्ने तो निरभिमानपूर्वक बुद्धिसे यही कहा है :- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति । “ जिसने यह जान लिया, कि सांख्य और - कर्मयोग मोक्ष-दृष्टिसे दो नहीं - एकही हैं - वही पंडित है ” ( गीता ५. ५) । और महाभारतमेंभी कहा है, कि एकांतिक अर्थात् भागवत धर्म सांख्य-धर्मकी बराबरीका है - “ सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः ” (शां. ३४८. ७५) । सारांश, सारे स्वार्थको परार्थमें लयकर अपनी अपनी योग्यताके अनुसार व्यवहारमें प्राप्त सभी कर्म सब प्राणियोंके हितार्थ मरणपर्यंत निष्काम बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर करते जानाही सच्चा वैराग्य या 'नित्य-संन्यास' है (गीता ५. ३) ; इसी कारण कर्मयोग-मार्गमें स्वरूपसे कर्मका संन्यासकर भिक्षा कभीभी नहीं माँगते । परंतु बाहरी आचरणसे देखनेमें यदि इस प्रकार भेद दिखे, तोभी संन्यास और त्यागके सच्चे तत्त्व कर्मयोग-मार्गमेंभी कायमही रहते हैं; इसलिये गीताका अंतिम सिद्धान्त है, कि स्मृति-ग्रंथोंकी आश्रम-व्यवस्थाका और निष्काम कर्मयोगका विरोध नहीं है । संभव है, कि उपर्युक्त इस विवेचनसे कुछ लोगोंकी कदाचित् ऐसी समझ हो जाय, कि संन्यास धर्मके साथ कर्मयोगका मेल करनेका जो इतना बड़ा उद्योग गीतामें किया गया है, उसका कारण यह है, कि स्मार्त या संन्यास धर्म प्राचीन होगा; और कर्मयोग-मार्ग उसके बादका होगा । परंतु इतिहासकी दृष्टिसे विचार करनेपर कोईभी जान सकेगा, कि सच्ची स्थिति ऐसी नहीं है । यह पहलेही कह चुके हैं, कि वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप कर्मकांडात्मकही था । आगे चल- कर उपनिषदोंके ज्ञानसे कर्मकांडको गौणता प्राप्त होने लगी; और कर्मत्यागरूपी संन्यास धीरे धीरे प्रचारमें आने लगा । वैदिक धर्म-वृक्षकी वृद्धिकी यह दूसरी सीढ़ी है । परंतु ऐसे समयमेंभी, उपनिषदोंके ज्ञानका कर्मकांडसे मेल मिलाकर जनक प्रभृति ज्ञाता पुरुष अपने कर्म निष्काम बुद्धिसे जीवनभर किया करते थे - अर्थात् कहना चाहिये, कि वैदिक धर्म वृक्षकी यह दूसरी सीढ़ी दो प्रकारकी थी; एक जनक आदिकी और दूसरी याज्ञवल्क्य प्रभृतिकी । स्मार्त आश्रम-व्यवस्था इसके बादकी अर्थात् तीसरी सीढ़ी है। दूसरी सीढ़ीके समान तीसरीकेभी दो भेद हैं। स्मृति-ग्रंथोंमें कर्मत्यागरूप चौथे आश्रमकी महत्ता गाई तो अवश्य गई है: पर उसके साथही जनक आदिके ज्ञानयुक्त कर्मयोगकाभी - उसको संन्यास आश्रमका विकल्प समझकर - स्मृति-प्रणेताओंने वर्णन किया है। उदाहरणार्थ, सब स्मृति-ग्रंथोंमें मूलभूत मनुस्मृति- कोही लीजिये । इस स्मृतिके छठे अध्यायमें कहा है, कि मनुष्यको ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ आश्रमोंसे चढ़ते चढ़ते कर्मत्यागरूप चौथा आश्रम लेना चाहिये, परंतु संन्यास आश्रम अर्थात् यतिधर्मका यह निरूपण समाप्त होनेपर मनुने पहले यह प्रस्तावना की है, कि “ यह यतियोंका अर्थात् संन्यासियोंका धर्म बतलाया; अब
३५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वेद-संन्यासियोंका कर्मयोग कहते हैं"; और फिर यह बतलाकर - कि अन्य आश्रमोंकी अपेक्षा गृहस्थाश्रमही श्रेष्ठ कैसे है - उन्होंने संन्यास आश्रम यतिधर्मको वैकल्पिक मान निष्काम गार्हस्थ्य-वृत्तिके कर्मयोगका वर्णन किया है (मनु. ६. ८६-९६) । और आगे बारहवें अध्यायमें उसेही 'वैदिक कर्मयोग' नाम देकर कहा है, कि यह मार्गभी चतुर्थ आश्रमके समानही निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षप्रद है (मनु. १२. ८६-९०) । मनुका यह सिद्धान्त याज्ञवल्क्य-स्मृतिमेंभी आया है। इस स्मृतिके तीसरे अध्यायमें, यतिधर्मका निरूपण हो चुकनेपर 'अथवा' पदका प्रयोग करके लिखा है, कि आगे ज्ञाननिष्ठ और सत्यवादी गृहस्थभी (संन्यास न लेकर) मुक्ति पाता है (याज्ञ. ३. २०४, २०५) । इसी प्रकार यास्कनेभी अपने निरुक्तमें लिखा है, कि कर्म छोड़नेवाले तपस्वियों और ज्ञानयुक्त कर्म करनेवाले कर्मयोगियोंको एकही देवयान गति प्राप्त होती है (नि. १४. ९) । इसके अतिरिक्त, इस विषयमें दूसरा प्रमाण धर्मसूत्रकारोंका है। ये धर्मसूत्र गद्यमें हैं और विद्वानोंका मत है, कि श्लोकोंमें रची गई स्मृतियोंसे ये पुराने होंगे। इस समय हमें यह नहीं देखना है, कि यह मत सही है या गलत। चाहे वह सही हो या गलत, इस प्रसंगपर मुख्य बात यह है, कि ऊपर मनु और याज्ञवल्क्य-स्मृतियोंके वचनोंमें गृहस्थाश्रम या कर्मयोगका जो महत्त्व दिखाया गया है, उससेभी अधिक महत्त्व धर्मसूत्रोंमें वर्णित है। मनु और याज्ञवल्क्यने कर्मयोगको चतुर्थ आश्रमका विकल्प कहा है। पर बौधायन और आपस्तंबने ऐसा न कर, स्पष्ट कह दिया है, कि गृहस्थाश्रमही मुख्य है; और उसीमे आगे अमृतत्व मिलता है। बौधायन धर्मसूत्रमें "जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिऋणवा जायते" - जन्मसेही प्रत्येक ब्राह्मण अपनी पीठपर तीन ऋण ले आता है - इत्यादि तैत्तिरीय संहिताके वचन पहले देकर कहा है, कि इन ऋणोंको चुकानेके लिये यज्ञयाग आदिपूर्वक गृहस्थाश्रमका आश्रय करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकको पहुँचता है, और ब्रह्मचर्य या संन्यासकी प्रशंसा करनेवाले अन्य लोग धूलमें मिल जाते हैं (बौ. २. ६. ११. ३३, ३४)। एवं आपस्तंब-सूत्रमे ऐसेही कहा है (आप. २. ९. २४. ८)। यह नहीं, कि इन दोनों धर्मसूत्रोंमें संन्यास आश्रमका वर्णनही नहीं है; किंतु उसका वर्णन करनेपरभी गृहस्थाश्रमकाही महत्त्व अधिक माना है। इससे और विशेषतः मनुस्मृतिमें कर्मयोगको 'वैदिक' विशेषण देनेसे स्पष्ट होता है, कि मनु- स्मृतिके समयमेंभी कर्मत्यागरूप संन्यास आश्रमकी अपेक्षा निष्काम कर्मयोगरूपी गृहस्थाश्रम प्राचीन समझा जाता था; और मोक्षकी दृष्टिसे उसकी योग्यता चतुर्थ आश्रमके बराबरही गिनी जाती थी। गीताके टीकाकारोंका जोर संन्यास या कर्म- त्यागयुक्त भक्तिपरही होनेके कारण उपर्युक्त स्मृति-वचनोंका उल्लेख उनकी टीका- ओंमें नहीं पाया जाता। परंतु उन्होंने इस ओर दुर्लक्ष भलेही किया हो; किंतु इससे कर्मयोगकी प्राचीनता घटती नहीं है। सारांश, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि इस प्रकार कर्मयोग-मार्गके प्राचीन होनेके कारण, स्मृतिकारोंको उसे यति-धर्मके विकल्पके
संन्यास और कर्मयोग ३५३ रूपमें ग्राह्य कर्मयोग मानना पड़ा। यह हुई वैदिक कर्मयोगकी बात। श्रीकृष्णके पहले जनक आदि इसीका आचरण करते थे। परंतु आगे भगवानने उसमें भक्तिकोभी मिला दिया; और उसका बहुत प्रसार किया, इस कारण उसीही 'भागवत-धर्म' नाम प्राप्त हो गया है। यद्यपि भगवद्गीताने इस प्रकार संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकोही अधिक श्रेष्ठता दी है, तथापि कर्मयोग-मार्गको आगे गौणता क्यों प्राप्त हुई - और संन्यास-मार्गकाही बोलबाला क्यों हो गया ? - इसका विचार ऐतिहासिक दृष्टिसे आगे किया जावेगा। यहाँ इतनाही कहना है कि, कर्मयोग स्मार्त-मार्गके पश्चातका नहीं है, वह प्राचीन वैदिक कालसे चला आ रहा है। भगवद्गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमें “इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे” इस प्रकार जो संकल्प है, उसका मर्म अब पाठकोंके ध्यानमें पूर्णतया आ जावेगा। यह संकल्प बतलाता है, कि भगवानके गाये हुए उपनिषदमें, अन्य उपनिषदोंके समान ब्रह्मविद्या तो है; पर अकेली ब्रह्मविद्याही नहीं है। प्रत्युत ब्रह्मविद्यामें 'सांख्य' और 'योग' (वेदान्ती संन्यासी और वेदान्ती कर्मयोगी), ये जो दो पंथ उपजते हैं, उनमेंसे योगका अर्थात् कर्मयोगका प्रतिपादनही भगवद्गीताका मुख्य विषय है। यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं, कि भगवद्गीतोपनिषत् कर्मयोगका प्रधान ग्रंथ है; क्योंकि यद्यपि कर्मयोग वैदिक कालसे चला आ रहा है, तथापि “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” (ईश. २) या “आरंभ कर्माणि गुणान्वितानि” (श्वे. ६. ४), अथवा “विद्याके साथ-ही-साथ स्वाध्याय आदि कर्म करने चाहिये” (तै. १. ९), इस प्रकारके कुछ थोड़े-से उल्लेखोंके अतिरिक्त उपनिषदोंमें इस कर्मयोगका विस्तृत विवेचन कहींभी नहीं किया गया है; कर्मयोगपर भगवद्गीताही मुख्य और प्रमाणभूत ग्रंथ है; और काव्यकी दृष्टिसेभी यह ठीकही जंचता है, कि भारत- भूमिके कर्ता पुरुषोंके चरित्र जिस महाभारतमें वर्णित हैं, उसीमें अध्यात्मशास्त्रको लेकर कर्मयोगकीभी उपपत्ति बतलाई जावे। इस बातकाभी अब अच्छी तरह पता लग जाता है, कि प्रस्थानत्रयीमें भगवद्गीताका समावेश क्यों किया गया है। यद्यपि उपनिषद् मूलभूत हैं, तोभी उनके कहनेवाले ऋषि अनेक हैं; इस कारण उन उपनिषदोंके विचार संकीर्ण और कुछ स्थानोंमें परस्पर-विरोधीभी दीख पड़ते हैं। इसलिये उपनिषदोंके साथ-ही-साथ उनकी एकवाक्यता करनेवाले वेदान्तसूत्रोंकीभी प्रस्थानत्रयीमे गणना करना आवश्यक था। परंतु उपनिषद् और वेदान्तसूत्र, इन दोनोंकी अपेक्षा यदि गीतामें कुछ अधिकता न होती, तो प्रस्थानत्रयीमें गीताके संग्रह करनेका कोईभी कारण न था। किंतु उपनिषदोंका झुकाव प्रायः संन्यास- मार्गकी ओर है, एवं उनमें ज्ञानमार्गकाही विशेषतः प्रतिपादन है; और भगवद्- गीतामें इस ज्ञानको लेकर भक्तियुक्त कर्मयोगका समर्थन है, बस - इतना कह देनेसे गीताकी अपूर्वता सिद्ध हो जाती है, और साथ-ही-साथ प्रस्थान-त्रयीके तीनों भागोंकी सार्थकताभी व्यक्त हो जाती है। क्योंकि वैदिक धर्मके प्रमाणभूत ग्रंथमें यदि ज्ञान गी. र. २३
३५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और कर्म ( सांख्य और योग ), इन दोनों वैदिक मार्गोंका विचार न हुआ होता, तो प्रस्थान-त्रयी उतनी अपूर्णही रह जाती। कुछ लोगोंकी समझ है, कि जब उपनिषद् सामान्यतः निवृत्तिविषयक हैं, तब गीताका प्रवृत्तिविषयक अर्थ लगानेसे प्रस्थान- त्रयीके तीनों भागोंमें विरोध हो जायगा और उनकी प्रामाणिकतामेंभी न्यूनता आ जावेगी। यदि सांख्य अर्थात् संन्यासही एकमात्र सच्चा वैदिक मोक्षमार्ग हो, तो यह शंका ठीक होगी, परंतु ऊपर दिखाया जा चुका है, कि कम-से-कम ईशावास्य आदि कुछ उपनिषदोंमें कर्मयोगका स्पष्ट उल्लेख है। इसलिये वैदिक धर्मपुरुषको केवल एकहत्थी अर्थात् संन्यासप्रधान न समझकर, यदि गीताके अनुसार ऐसा सिद्धान्त करें, कि उस वैदिक धर्मपुरुषके ब्रह्मविद्यारूप एकही मस्तक है; और मोक्षदृष्टिसे तुल्यबल सांख्य और कर्मयोग उसके दाहिने-बाएँ दो हाथ हैं; तो गीता और उपनिषदोंमें कोई विरोध नहीं रह जाता। उपनिषदोंमें एक मार्गका समर्थन है और गीतामें दूसरे मार्गका, इस लिये प्रस्थान-त्रयीके ये दोनों भागभी दो हाथोंके समान परस्परविरुद्ध न हो, सहाय्यकारीही दीख पड़ेंगे। ऐसेही, गीतामें केवल उपनिषदोंकाही प्रतिपादन माननेसे, पिष्टपेषणका जो वैयर्थ्य गीताको प्राप्त हो जाता, वहभी नहीं होता। गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने इस विषयकी उपेक्षा की है, इस कारण सांख्य और योग, इन दोनों स्वतंत्र मार्गोंके पुरस्कर्ता अपने अपने पंथके समर्थनमें जिन मुख्य कारणोंको बतलाया करते हैं, उनकी समता और विषमता चटपट ध्यानमें आ जानेके लिये, नीचे दिये गये नक्शेके दो खानोंमें वेही कारण परस्पर एक दूसरेके सामने संक्षेपसे दिये गये हैं। स्मृति-ग्रंथोंमें प्रतिपादित अर्थात् स्मार्त आश्रम-व्यवस्था और मूल भागवत धर्मके मुख्य भेद इससे ज्ञात हो जावेंगे। ब्रह्मविद्या या आत्मज्ञान प्राप्त होनेपर कर्मसंन्यास ( सांख्य ) कर्मयोग ( योग ) ( १ ) मोक्ष आत्मज्ञानसेही मिलता ( १ ) मोक्ष आत्मज्ञानसेही मिलता है, कर्मसे नहीं। ज्ञानविरहित, किंतु है, कर्मसे नहीं। ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धापूर्वक किये गये यज्ञ-याग आदि श्रद्धापूर्वक किये गये यज्ञ-याग आदि कर्मोंसे कर्मोंसे मिलनेवाला स्वर्गसुख अनित्य है। मिलनेवाला स्वर्गसुख अनित्य है। ( २ ) आत्मज्ञान होनेके लिये इंद्रिय- ( २ ) आत्मज्ञान होनेके लिये इंद्रिय- निग्रहसे बुद्धिको स्थिर, निष्काम, विरक्त निग्रहसे बुद्धिको स्थिर, निष्काम, विरक्त और सम करना पड़ता है। और मम करना पड़ता है।
संन्यास और कर्मयोग ३५५ ( ३ ) इसलिये इंद्रियोंके विषयोंका ( ३ ) इसलिये इंद्रियोंके विषयोंको पाश तोड़ मुक्त ( स्वतंत्र ) हो जाओ । न छोड़ कर उन्हींमें वैराग्यसे अर्थात् निष्काम बुद्धिसे व्यवहार कर इंद्रिय- निग्रह की जाँच करो । निष्कामके माने निष्क्रिय नहीं । ( ४ ) तृष्णा मूलक कर्म दुःखमय ( ४ ) यदि इसका भली भाँति विचार और बंधक हैं । करें, कि दुःख और बंधन किसमें हैं, तो दीख पड़ेगा, कि अचेतन-कर्म किसीकोभी बाँधते या छोड़ते नहीं हैं । उनके संबंधमें कर्ताके मनमें जो काम या फलाशा होती है, वही बंधन और दुःखकी जड़ है । ( ५ ) इसलिये चित्तशुद्धि होनेतक ( ५ ) इसलिये चित्तशुद्धि हो चुकने यदि कोई कर्म करे, तोभी अंतमें छोड़ परभी फलाशा छोड़ कर धैर्य और देने चाहिये । उत्साहके साथ सब कर्म करते रहो । यदि कहो, कि कर्मोंको छोड़ दें; तो वे छूट नहीं सकते । सृष्टिही तो एक कर्म है; उसे विश्राम हैही नहीं । ( ६ ) यज्ञके अर्थ किये गये कर्म ( ६ ) निष्कामबुद्धिसे या ब्रह्मार्पण- बंधक न होनेके कारण गृहस्थाश्रममें विधिसे किये गये समस्त कर्म एक बड़ा उनके करनेसे हानि नहीं है । भारी 'यज्ञ' ही है । इसलिये स्वधर्मविहित समस्त कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझ कर सदैव करते रहना चाहिये । ( ७ ) देहके धर्म कभी छूटते नहीं, ( ७ ) पेटके लिये भीख माँगनाभी इस कारण संन्यास लेनेपर पेटके लिये तो कर्मही है; और सोभी लज्जाप्रद यदि भिक्षा माँगना बुरा नहीं । ऐसा कर्म करनाही है, तब अन्यान्य कर्मभी निष्काम बुद्धिसे क्यों न किये जावें ? गृहस्थाश्रमीके अतिरिक्त भिक्षा देगाही कौन ?
३५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (८) ज्ञानप्राप्तिके अनंतर अपना निजी कर्तव्य कुछ शेष नहीं रहता; और लोकसंग्रह करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं। (८) ज्ञानप्राप्ति करनेके अनंतर अपने लिये भलेही कुछ प्राप्त करनेको न रहे; परंतु कर्म नहीं छूटते। इसलिये जो कुछ शास्त्रसे प्राप्त हो, उसे 'मुझे नहीं चाहिये' ऐसी निर्मम बुद्धिसे लोक- संग्रहकी ओर दृष्टि रखकर करते जाओ। लोकसंग्रह किसीसेभी नहीं छूटता। उदाहरणार्थ, भगवान्का चरित देखो। (९) परंतु यदि अपवादस्वरूप कोई अधिकारी पुरुष ज्ञानके पश्चात्भी अपने व्यावहारिक अधिकार जनक आदिके समान जीवनपर्यंत जारी रखे, तो कोई हानि नहीं। (९) गुणविभागरूप चातुर्वर्ण्य- व्यवस्थाके अनुसार छोटे-बड़े अधिकार सभीको जन्मसेही प्राप्त होते हैं; और स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले इन अधि- कारोंको लोकसंग्रहार्थ निःस्वार्थ-बुद्धिसे सभीको निरपवादरूपसे जीवनपर्यंत जारी रखना चाहिये। क्योंकि यह चक्र जगतको धारण करनेके लिये परमेश्वर- नेही बनाया है। (१०) इतना होने परभी कर्म- त्यागरूपी संन्यासही श्रेष्ठ है। अन्य आश्रमोंके कर्म चित्तशुद्धिके साधनमात्र हैं और ज्ञान और कर्मका तो स्वभावसेही विरोध है। इसलिये पूर्व आश्रममें, जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी चित्तशुद्धि करके ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् अंतमें कर्मत्यागरूपी संन्यास लेना चाहिये। चित्तशुद्धि जन्मतेही या पूर्व आयुमें हो जावे, तो गृहस्थाश्रमके कर्म करते रहने- कीभी आवश्यकता नहीं है। कर्मका स्वरूपतः त्याग करनाही सच्चा संन्यास- आश्रम है। (१०) यह सच है, कि शास्त्रोक्त रीतिसे सांसारिक कर्म करनेपर चित्त- शुद्धि होती है, परंतु केवल चित्तकी शुद्धिही कर्मका उपयोग नहीं है। जगत्का व्यवहार चलता रखनेके लियेभी कर्मकी आवश्यकता है। इसी प्रकार काम्यकर्म और ज्ञानका विरोध भलेही हो; पर निष्काम कर्म और ज्ञानके बीच बिलकुल विरोध नहीं है। इसलिये चित्तकी शुद्धिके पश्चात्भी फलाशाका त्याग कर निष्काम बुद्धिसे जगतके संग्रहार्थ चातुर्वर्ण्यके सब कर्म आमरण जारी रखनाही सच्चा संन्यास है। कर्मका स्वरूपतः त्याग करना कभीभी उचित नहीं; और शक्यभी नहीं है।
संन्यास और कर्मयोग ३५७ (११) कर्म-संन्यास ले चुकने परभी (११) ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् फलाशा- शम-दम आदिक धर्म पालते जाना त्यागरूप संन्यास ले कर शम-दम आदिक चाहिये । धर्मोंके सिवा आत्मौपम्यदृष्टिसे प्राप्त होनेवाले सभी धर्मोंका पालन किया करो; और इस शम अर्थात शांतवृत्ति- सेही शास्त्रसे प्राप्त समस्त कर्म लोकसंग्रहके निमित्त मरणपर्यंत करते जाओ । निष्काम कर्म न छोड़ो । (१२) यह मार्ग अनादि और (१२) यह मार्ग अनादि और श्रुति- श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित है । स्मृति-प्रतिपादित है । (१३) शुक-याज्ञवल्क्य आदि इस (१३) व्यास-वसिष्ठ-जैगीषव्य इ. मार्गसे गये हैं । और जनक-श्रीकृष्ण प्रभृति इस मार्गसे गये हैं । अंतमें मोक्ष ये दोनों मार्ग अथवा निष्ठाएँ ब्रह्मविद्यामूलक हैं और दोनों ओर मनकी निष्काम अवस्था और शांति एकही प्रकारकी है । इस कारण दोनों मार्गोंसे अंतमें एकही मोक्ष प्राप्त हुआ करता है (गीता ५. ५) । ज्ञानके पश्चात् कर्मको छोड़ बैठना और काम्य कर्म छोड़कर नित्य निष्काम कर्म करते रहना, यही इन दोनोंमें मुख्य भेद है । ऊपर बतलाये हुए कर्म छोड़ने और कर्म करनेके दोनों मार्ग ज्ञानमूलक हैं अर्थात् ज्ञानके पश्चात् ज्ञानी पुरुषोंके द्वारा स्वीकृत और आचरित हैं । परंतु कर्म छोड़ना और कर्म करना, दोनों बातें ज्ञान न होने परभी हो सकती हैं । इसलिये इस अज्ञानमूलक कर्मका और कर्मके त्यागकाभी यहाँ थोड़ासा विवेचन करना आवश्यक है । गीताके अठारहवें अध्यायमें त्यागके जो तीन भेद बतलाये गये हैं, उनका रहस्य यही है । ज्ञान न रहने परभी कुछ लोग निरे काय-क्लेश-भयसे कर्म छोड़ दिया करते हैं-इसे गीतामें 'राजस त्याग' कहा है (गीता १८. ८) । इसी प्रकार ज्ञान न रहनेपरभी कुछ लोग कोरी श्रद्धासेही यज्ञ-याग प्रभृति कर्म किया करते हैं । परंतु गीताका कथन है, कि कर्म करनेका यह मार्ग मोक्षप्रद नहीं है-केवल स्वर्गप्रद है (गीता ९. २०) । कई लोगोंकी समझ है, कि आजकल यज्ञ-याग प्रभृति श्रौत धर्मका प्रचार न रहनेके कारण, मीमांसकोंके इस निरे कर्म-मार्गके संबंधमें गीताका सिद्धान्त इन दिनों विशेष उपयोगी नहीं; परंतु वह ठीक नहीं है । क्योंकि श्रौत यज्ञ-
३५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र याग भलेही डूब गये हों; पर स्मार्त-यज्ञ अर्थात् चातुर्वर्ण्यके कर्म अबभी जारीही हैं! इसलिये अज्ञान से, परंतु श्रद्धापूर्वक, यज्ञ-याग आदि काम्य कर्म करनेवाले लोगोंके विषयमें गीताका जो सिद्धान्त है, वह ज्ञानविरहित किंतु श्रद्धासहित चातुर्वर्ण्य आदि कर्म करनेवालोंकोभी वर्तमान स्थितिमें पूर्णतया उपयुक्त है। जगतके व्यवहारकी ओर दृष्टि देनेपर ज्ञात होगा, कि समाजमें इसी प्रकारके लोगोंकी अर्थात् शास्त्रों- पर श्रद्धा रखकर नीतिसे अपने कर्म करनेवालोंकीही विशेष अधिकता रहती है। परंतु उन्हें परमेश्वरका स्वरूप पूर्णतया ज्ञात नहीं रहता, इसलिये गणितशास्त्रकी पूरी उपपत्ति समझे बिनाही केवल मौलिक हिसाब करनेकी रीतिसे गणित करनेवाले लोगोंके समान इन श्रद्धालु और कर्मठ मनुष्योंकी अवस्था हुआ करती है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि सभी कर्म शास्त्रोक्त विधिसे और श्रद्धापूर्वक करनेके कारण वे निर्दोष (शुद्ध) हो जाते हैं, एवं इसीसे पुण्यप्रद अर्थात् स्वर्गप्रद हो जाते हैं। परंतु शास्त्रकाही सिद्धान्त है, कि बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं मिलता, इसलिये स्वर्ग- प्राप्तिकी अपेक्षा अधिक महत्त्वका कोईभी फल इन कर्मठ लोगोंको मिल नहीं सकता। अतएव स्वर्गसुखसेभी जो परे है, उस अमृतत्व प्राप्ति जिसे कर लेनी हो - और यहो तो एक परम पुरुषार्थ है - उसे उचित है, कि वह पहले साधन समझकर और आगे सिद्धावस्थामें लोकसंग्रहके लिये, अर्थात् जीवनपर्यन्त "समस्त प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है" इस ज्ञानयुक्त बुद्धिसे, निष्काम कर्म करनेके मार्गकाही स्वीकार करे। आयु बितानेके सब मार्गोंमेंसे यही मार्ग उत्तम है। गीताका अनुकरण कर ऊपर दिये गये नक्शोंमें इस मार्गको कर्मयोग कहा है और इसेही कुछ लोग कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति- मार्गभी कहते हैं। परंतु कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति-मार्ग, इन दोनों शब्दोंसे ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धासहित कर्म करनेके स्वर्गप्रद मार्गकाभी सामान्यतः बोध हुआ करता है। इसलिये ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धायुक्त कर्म और ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म, इन दोनोंका भेद दिखलानेके लिये दो भिन्न भिन्न शब्दोंकी योजना करनेकी आवश्यकता होती है; और इसी कारणसे मनुस्मृति तथा भागवतमेंभी पहले प्रकारके कर्म अर्थात् ज्ञानविरहित कर्मको 'प्रवृत्त कर्म', और दूसरे प्रकारके अर्थात् ज्ञानयुक्त निष्काम कर्मको 'निवृत्त कर्म' कहा है (मनु. १२. ८९.; भाग. ७. १५. ४७)। परंतु हमारी रायमें ये शब्दभी जितने होने चाहिये, उतने निस्संदिग्ध नहीं हैं! क्योंकि 'निवृत्ति' शब्दका सामान्य अर्थ 'कर्म से परावृत्त होना' है। अतः इस शंकाको दूर करनेके लिये 'निवृत्त' शब्दके आगे 'कर्म' विशेषण जोड़ते हैं, और ऐसा करनेसे 'निवृत्त' विशेषणका अर्थ 'कर्मसे परावृत्त' नहीं होता; और निवृत्त कर्म = निष्काम कर्म, यह अर्थ निष्पन्न हो जाता है। कुछभी हो; जब तक 'निवृत्त' शब्द उसमें है, तब तक कर्मत्यागकी कल्पना मनमें आये बिना नहीं रहती। इसीलिये ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म करनेके मार्गको "निवृत्ति या निवृत्त कर्म" न कहकर 'कर्मयोग' नाम देना हमारे मतमें उत्तम है। क्योंकि कर्मके आगे योग शब्द जुड़ा रहनेसे स्वभावतः उसका अर्थ "मोक्षमें
संन्यास और कर्मयोग ३५९ बाधा न देकर कर्म करनेकी युक्ति" होता है; और अज्ञानयुक्त कर्मका तो आपही-से निरसन हो जाता है। फिरभी यह न भूल जाना चाहिये, कि गीताका कर्मयोग ज्ञानमूलक है। और यदि इसेही कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति-मार्ग कहना किसीको अभीष्ट जँचता हो, तो ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं। स्थल-विशेषमें भाषावैचित्र्यके लिये गीताके कर्मयोगको लक्ष्यकर हमनेभी इन शब्दोंकी योजना की है। अस्तु, इस प्रकार कर्म करने या कर्म छोड़नेके ज्ञानमूलक और अज्ञानमूलक जो भेद हैं, उनमेंसे प्रत्येकके संबंधमें गीताशास्त्रका अभिप्राय इस प्रकार है :-
आयु बितानेका मार्ग | श्रेणी | गति
१. कामोपभोगकोही पुरुषार्थ मान- | अधम | नरक कर अहंकारसे, आसुरी बुद्धिसे, दंभसे | | या लोभसे केवल आत्मसुखके लिये कर्म | | करना (गीता १६. १६) - आसुर | | अथवा राक्षसी मार्ग है। | |
१. प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है | मध्यम | स्वर्ग
- इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका | (मीमांस- | (मीमांसकोंके यथार्थ ज्ञान न होनेपरभी वेदोंकी आज्ञा | कोंके मतमें | मतमें मोक्ष) या शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार श्रद्धा | उत्तम) | और नीतिसे अपने अपने काम्य कर्म | | करना (गीता २. ४१-४४; ९-२०) - | | केवल कर्म, त्रयी धर्म अथवा मीमांसक | | मार्ग है। | |
१. शास्त्रोक्त निष्काम कर्मोंसे परमे- | उत्तम | मोक्ष श्वरका ज्ञान हो जानेपर अंतमें वैराग्यसे | | समस्त कर्म छोड़ केवल ज्ञानमेंही तृप्त | | हो रहना (गीता ५. २) - केवल ज्ञान, | | सांख्य अथवा स्मार्त मार्ग है। | |
१. पहले चित्तकी शुद्धिके निमित्त, | सर्वोत्तम | मोक्ष और उससे परमेश्वरका ज्ञान प्राप्त हो | | जानेपर; फिर केवल लोकसंग्रहार्थ, | | मरणपर्यंत भगवानके समान निष्काम कर्म | | करते रहना (गीता ५. २) - ज्ञानकर्म- | | समुच्चय, कर्मयोग या भागवत मार्ग है। | |
[मध्य-दाहिनी ओर कोष्ठक-टिप्पणी: पंक्ति १९ से ३९ तक — 'जनक-वर्णित तीन निष्ठाएँ'] [सुदूर-दाहिनी ओर कोष्ठक-टिप्पणी: पंक्ति २८ से ३९ तक — 'गीताकी दो निष्ठाएँ']
३६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सारांश, यही पक्ष गीतामें सर्वोत्तम ठहराया गया है, कि मोक्ष-प्राप्तिके लिये यद्यपि कर्मकी आवश्यकता नहीं है, तथापि उसके साथही साथ दूसरे कारणोंके लिये - अर्थात् एक तो अपरिहार्य समझकर और इसके सिवा जगत्के धारणपोषणके लिये आवश्यक मानकर - निष्काम बुद्धिसे सदैव समस्त कर्मोंको करते रहना चाहिये । अथवा गीताका अंतिम सिद्धान्त है, कि "कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ।" (मनु. १. ९७), मनुके इस वचनके अनुसार कर्तृत्व और ब्रह्मज्ञानका योग या मेलही सबसे उत्तम है; और निरा कर्तृत्व या कोरा ब्रह्मज्ञान, प्रत्येक एकदेशीय है। वास्तवमें यह प्रकरण यहीं समाप्त हो गया। परंतु यह दिखलानेके लिये - कि गीताका सिद्धान्त श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित है - ऊपर भिन्न भिन्न स्थानोंपर जो वचन उद्धृत किये हैं, उनके संबंधमें कुछ कहना आवश्यक है। क्योंकि उप- निषदोंके सांप्रदायिक भाष्योंसे बहुतेरोंकी यह समझ हो गई है, कि समस्त उप- निषद संन्यास-प्रधान या निवृत्ति-प्रधान हैं। हमारा यह कथन नहीं, कि उपनिषदोंमें संन्यास-मार्ग प्रतिपादित हैही नहीं। बृहदारण्यकोपनिषदमें कहा है - यह अनुभव हो जानेपर, कि परब्रह्मके सिवा और कोई वस्तु सत्य नहीं है, "कुछ ज्ञानी पुरुष पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा की" - चिंता न कर, "हमें संततिसे क्या काम ? संसारही हमारा आत्मा है", यह कहकर आनंदसे भिक्षा माँगते हुए घूमते हैं। (४. ४. २२) । परंतु बृहदारण्यकमें यह नियम कहीं नहीं मिलता, कि समस्त ब्रह्मज्ञानियोंको यही पक्ष स्वीकार करना चाहिये। और क्या कहें ? जिसे यह उपदेश किया गया, उसका इसी उपनिषदमें वर्णन है, कि वह जनक राजा ब्रह्म- ज्ञानके शिखरपर पहुँचकर अमृत हो गया था। परंतु यह कहीं नहीं बतलाया है, कि उसने याज्ञवल्क्यके समान जगत्को छोड़ कर संन्यास ले लिया। इससे स्पष्ट होता है, कि जनकका निष्काम कर्मयोग और याज्ञवल्क्यका कर्मसंन्यास मार्ग - दोनों
- बृहदारण्यकोपनिषदको विकल्प-रूपसे संमत हैं; और वेदान्तसूत्र-कर्तानेभी यही अनुमान किया है (वे. सू. ३. ४. १५)। कठोपनिषद् इससेभी आगे बढ़ गया है। पाँचवें प्रकरणमें हम यह दिखला चुके हैं, कि हमारे मतमें कठोपनिषदमें निष्काम कर्मयोगही प्रतिपाद्य है। छान्दोग्योपनिषदमें (छां. ८. १५. १) यही अर्थ प्रतिपाद्य है और यह स्पष्ट कह दिया है, कि "गुरुसे अध्ययन कर, फिर कुटुंबमें रहकर धर्मसे बर्तनेवाला ज्ञानी पुरुष ब्रह्मलोकको जाता है, वहाँसे फिर नहीं लौटता।" तैत्तिरीय तथा श्वेताश्वतर उपनिषदोंके इसी अर्थके वाक्य ऊपर दिये गये हैं; (तै. १. ९; श्वे. ६. ४)। इसके सिवा यहभी ध्यान देनेयोग्य बात है, कि उपनिषदोंमें जिन्होंने दूसरोंको ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया है, उनमें या उनके ब्रह्मज्ञानी शिष्योंमें, याज्ञ- वल्क्यके समान एक-आध पुरुषके अतिरिक्त, कोई ऐसा नहीं मिलता, जिसने कर्म- त्यागरूप संन्यास लिया हो। इसके विपरीत, उनके वर्णनोंसे दीख पड़ता है, कि वे गृहस्थाश्रमीही थे। अतएव कहना पड़ता है, कि समस्त उपनिषद् संन्यास-प्रधान
संन्यास और कर्मयोग ३६१ नहीं हैं; इनमेंसे कुछमें तो संन्यास और कर्मयोगका विकल्प है और कुछमें सिर्फ ज्ञानकर्म-समुच्चयकाही प्रतिपादन है। परंतु उपनिषदोंके सांप्रदायिक भाष्योंमें ये भेद नहीं दिखलाये गये हैं; किंतु यही कहा गया है, कि समस्त उपनिषद् केवल एकही अर्थ - विशेषतः संन्यास - प्रतिपादन करते हैं। सारांश, सांप्रदायिक टीकाकारोंके हाथों गीताकी और उपनिषदोंकीभी एकही दशा हो गई है, अर्थात् गीताके कुछ श्लोकोंके समान उपनिषदोंके कुछ मंत्रोंकीभी इन भाष्यकारोंको खींचातानी करनी पड़ी है। उदाहरणार्थ, ईशावास्य उपनिषदको लीजिये। यद्यपि उपनिषद् छोटा अर्थात् सिर्फ अठारह श्लोकोंका है, तथापि इसकी योग्यता अन्य उपनिषदोंकी अपेक्षा अधिक समझी जाती है। क्योंकि यह उपनिषद् स्वयं वाजसनेयी संहितामेंही कहा गया है; और अन्यान्य उपनिषद् आरण्यक ग्रंथमें कहे गये हैं। यह बात सर्वमान्य है, कि संहिताकी अपेक्षा ब्राह्मण और ब्राह्मणोंकी अपेक्षा आरण्यक ग्रंथ उत्तरोत्तर कम प्रमाणके हैं। यह संपूर्ण ईशावास्योपनिषद् - अथसे इतिपर्यंत - ज्ञान-कर्म- समुच्चयात्मक है। उसके पहले मंत्रमें (श्लोक) यह कहकर, कि "जगतमें जो कुछ है, उसे ईशावास्य अर्थात् परमेश्वराधिष्ठित समझना चाहिये; " दूसरेही मंत्रमें स्पष्ट कह दिया है, कि "जीवनभर सौ वर्ष निष्काम कर्म करते रहकरही जीते रहनेकी इच्छा रखो।" वेदान्तसूत्रमें कर्मयोगका विवेचन करनेका जब समय आया, तब और अन्यान्य ग्रंथोंमेंभी ईशावास्यका यही वचन ज्ञान-कर्म-समुच्चयपक्षका समर्थकके नाते दिया हुआ मिलता है। परंतु ईशावास्योपनिषद् इतनेसेही पूरा नहीं हो जाता। दूसरे मंत्रमें कही गई बातका समर्थन करनेके लिये आगे 'अविद्या' (कर्म) और 'विद्या'के (ज्ञान) विवेचनका आरंभकर नवें मंत्रमें कहा है, कि "निरी अविद्याका (कर्म) करनेवाले पुरुष अंधकारमें घुसते हैं; और कोरी विद्यामें (ब्रह्मज्ञान) मग्न रहनेवाले पुरुष गहरे अँधेरेमें जा पड़ते हैं।" केवल अविद्या (कर्म) और केवल विद्याकी (ज्ञान) प्रत्येककी इस प्रकार अलग अलग लघुता दिखलाकर ग्यारहवें मंत्रमें नीचे लिखे अनुसार 'विद्या' और 'अविद्या', दोनों समुच्चयकी आवश्यकता इस उपनिषद्में वर्णनकी गई है :- विद्यां चाऽविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ "जिसने विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको एक दूसरीके साथ जान लिया, वह अविद्यासे (कर्मों) मृत्युको अर्थात् नाशवंत मायासृष्टिके प्रपंचको (भली भाँति) पार कर, विद्यासे (ब्रह्मज्ञानसे) अमृतत्वको प्राप्तकर लेता है।" - यही इस मंत्रका स्पष्ट और सरल अर्थ है। और यही अर्थ, विद्याको 'संभूति' अर्थात् जगत्का आदि कारण, एवं उससे भिन्न अविद्याको 'असंभूति' या 'विनाश' अर्थात् ये दूसरे नाम देकर इसके आगेके तीन मंत्रोंमें फिरसे दोहराया गया है (ईश. १२-१४) । इससे व्यक्त होता है, कि संपूर्ण ईशावास्योपनिषद् विद्या
३६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और अविद्याका एककालीन (उभयं सह) समुच्चय प्रतिपादन करता है। उल्लि- खित मंत्रमें 'विद्या' और 'अविद्या' शब्दोंके समानही मृत्यु और अमृत शब्द परस्पर- प्रतियोगी हैं। इनमेंसे अमृत शब्दसे 'अविनाशी ब्रह्म' अर्थ प्रकट है; और इसके विपरीत मृत्यु शब्दमे “नाशवंत मृत्युलोक या ऐहिक संसार” यह अर्थ निष्पन्न होता है; और ये दोनों शब्द इसी अर्थमें ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमेंभी आये हैं (ऋ. १०. १२९. २)। विद्या आदि शब्दोंके ये सरल अर्थ लेकर – अर्थात् विद्या = ज्ञान, अविद्या = कर्म, अमृत = ब्रह्म और मृत्यु = मृत्युलोक, ऐसा समझकर – यदि ईशावास्यके उल्लिखित ग्यारहवें मंत्रका अर्थ करें, तो प्रथम दीख पड़ेगा, कि इस मंत्रके पहले चरणमें विद्या और अविद्याका एककालीन समुच्चय वर्णित है; और उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरे चरणमें इन दोनोंमेंसे प्रत्येकका भिन्न भिन्न फल बतलाया है। ईशावास्योपनिषदको ये दोनों फल इष्ट हैं; और इसीलिये इस उपनिषदमें ज्ञान और कर्म, दोनोंका एककालीन समुच्चय प्रतिपादित हुआ है। मृत्युलोकके प्रपंचको अच्छी रीतिसे चलाने या उससे भली भाँति पार पड़नेकोही गीतामें 'लोकसंग्रह' नाम दिया गया है। यह सच है, कि मोक्ष प्राप्त करना मनुष्य- का कर्तव्य है; परंतु उसके साथही उसे लोकसंग्रह करनाभी आवश्यक है; इसीसे गीताका सिद्धान्त है, कि ज्ञानी पुरुष यह लोकसंग्रहकारक कर्म न छोड़े; और यही सिद्धान्त शब्दभेदसे “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते” इस उल्लिखित मंत्रमें आ गया है। इससे प्रकट होगा, कि गीता उपनिषदोंको केवल पकड़ेही नहीं है; प्रत्युत ईशावास्योपनिषदमें स्पष्टतया वर्णित अर्थही गीतामें विस्तारसहित प्रतिपादित हुआ है। ईशावास्योपनिषद् जिस वाजसनेयी संहितामें है, उसी वाजसनेयी संहिताका भाग शतपथ ब्राह्मण है। इस शतपथ ब्राह्मणके आरण्यकमें बृहदारण्यकोपनिषद् आया है, जिसमें ईशावास्यका यह नवाँ मंत्र अक्षरशः ले लिया है, कि “कोरी विद्यामें (ब्रह्मज्ञान) मग्न रहनेवाले पुरुष गहरे अँधेरेमें जा पड़ते हैं” (बृ. ४. ४. १०)। इस बृहदारण्यकोपनिषदमेंही जनक राजाकी कथा है; और उसी जनकका दृष्टान्त कर्मयोगके समर्थनके लिये भगवान्ने गीतामें लिया है (गीता ३. २०)। इससे ईशावास्यका और भगवद्गीताके कर्मयोगका जो संबंध हमने ऊपर दिखलाया है, वही अधिक दृढ़ और निःसंशय सिद्ध होता है। परंतु जिनका सांप्रदायिक सिद्धान्त ऐसा है, कि सभी उपनिषदोंमें मोक्षप्राप्तिका एकही मार्ग प्रतिपाद्य है और वहभी वैराग्यका या संन्यासकाही है; उपनिषदोंमें दो-दो मार्गोंका प्रतिपादन होना शक्य नहीं; उन्हें ईशावास्योपनिषदके स्पष्टार्थक मंत्रोंकाभी, खींचातानी कर, किसी प्रकार निराला अर्थ लगाना पड़ता है। ऐसा न करें, तो ये मंत्र उनके संप्रदायके प्रतिकूल हो जाते हैं; और ऐसा होने देना उन्हें इष्ट नहीं; इसीलिये ग्यारहवें मंत्रपर व्याख्यान करते समय शांकरभाष्यमें 'विद्या' शब्दका अर्थ 'ज्ञान' न कर 'उपासना' किया गया है। यह नहीं, कि विद्या शब्दका