भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 397

३५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वेद-संन्यासियोंका कर्मयोग कहते हैं"; और फिर यह बतलाकर - कि अन्य आश्रमोंकी अपेक्षा गृहस्थाश्रमही श्रेष्ठ कैसे है - उन्होंने संन्यास आश्रम यतिधर्मको वैकल्पिक मान निष्काम गार्हस्थ्य-वृत्तिके कर्मयोगका वर्णन किया है (मनु. ६. ८६-९६) । और आगे बारहवें अध्यायमें उसेही 'वैदिक कर्मयोग' नाम देकर कहा है, कि यह मार्गभी चतुर्थ आश्रमके समानही निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षप्रद है (मनु. १२. ८६-९०) । मनुका यह सिद्धान्त याज्ञवल्क्य-स्मृतिमेंभी आया है। इस स्मृतिके तीसरे अध्यायमें, यतिधर्मका निरूपण हो चुकनेपर 'अथवा' पदका प्रयोग करके लिखा है, कि आगे ज्ञाननिष्ठ और सत्यवादी गृहस्थभी (संन्यास न लेकर) मुक्ति पाता है (याज्ञ. ३. २०४, २०५) । इसी प्रकार यास्कनेभी अपने निरुक्तमें लिखा है, कि कर्म छोड़नेवाले तपस्वियों और ज्ञानयुक्त कर्म करनेवाले कर्मयोगियोंको एकही देवयान गति प्राप्त होती है (नि. १४. ९) । इसके अतिरिक्त, इस विषयमें दूसरा प्रमाण धर्मसूत्रकारोंका है। ये धर्मसूत्र गद्यमें हैं और विद्वानोंका मत है, कि श्लोकोंमें रची गई स्मृतियोंसे ये पुराने होंगे। इस समय हमें यह नहीं देखना है, कि यह मत सही है या गलत। चाहे वह सही हो या गलत, इस प्रसंगपर मुख्य बात यह है, कि ऊपर मनु और याज्ञवल्क्य-स्मृतियोंके वचनोंमें गृहस्थाश्रम या कर्मयोगका जो महत्त्व दिखाया गया है, उससेभी अधिक महत्त्व धर्मसूत्रोंमें वर्णित है। मनु और याज्ञवल्क्यने कर्मयोगको चतुर्थ आश्रमका विकल्प कहा है। पर बौधायन और आपस्तंबने ऐसा न कर, स्पष्ट कह दिया है, कि गृहस्थाश्रमही मुख्य है; और उसीमे आगे अमृतत्व मिलता है। बौधायन धर्मसूत्रमें "जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिऋणवा जायते" - जन्मसेही प्रत्येक ब्राह्मण अपनी पीठपर तीन ऋण ले आता है - इत्यादि तैत्तिरीय संहिताके वचन पहले देकर कहा है, कि इन ऋणोंको चुकानेके लिये यज्ञयाग आदिपूर्वक गृहस्थाश्रमका आश्रय करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकको पहुँचता है, और ब्रह्मचर्य या संन्यासकी प्रशंसा करनेवाले अन्य लोग धूलमें मिल जाते हैं (बौ. २. ६. ११. ३३, ३४)। एवं आपस्तंब-सूत्रमे ऐसेही कहा है (आप. २. ९. २४. ८)। यह नहीं, कि इन दोनों धर्मसूत्रोंमें संन्यास आश्रमका वर्णनही नहीं है; किंतु उसका वर्णन करनेपरभी गृहस्थाश्रमकाही महत्त्व अधिक माना है। इससे और विशेषतः मनुस्मृतिमें कर्मयोगको 'वैदिक' विशेषण देनेसे स्पष्ट होता है, कि मनु- स्मृतिके समयमेंभी कर्मत्यागरूप संन्यास आश्रमकी अपेक्षा निष्काम कर्मयोगरूपी गृहस्थाश्रम प्राचीन समझा जाता था; और मोक्षकी दृष्टिसे उसकी योग्यता चतुर्थ आश्रमके बराबरही गिनी जाती थी। गीताके टीकाकारोंका जोर संन्यास या कर्म- त्यागयुक्त भक्तिपरही होनेके कारण उपर्युक्त स्मृति-वचनोंका उल्लेख उनकी टीका- ओंमें नहीं पाया जाता। परंतु उन्होंने इस ओर दुर्लक्ष भलेही किया हो; किंतु इससे कर्मयोगकी प्राचीनता घटती नहीं है। सारांश, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि इस प्रकार कर्मयोग-मार्गके प्राचीन होनेके कारण, स्मृतिकारोंको उसे यति-धर्मके विकल्पके