श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३५१ वह मार्ग स्मृतिविरुद्ध या त्याज्य है। भगवान्ने तो निरभिमानपूर्वक बुद्धिसे यही कहा है :- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति । “ जिसने यह जान लिया, कि सांख्य और - कर्मयोग मोक्ष-दृष्टिसे दो नहीं - एकही हैं - वही पंडित है ” ( गीता ५. ५) । और महाभारतमेंभी कहा है, कि एकांतिक अर्थात् भागवत धर्म सांख्य-धर्मकी बराबरीका है - “ सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः ” (शां. ३४८. ७५) । सारांश, सारे स्वार्थको परार्थमें लयकर अपनी अपनी योग्यताके अनुसार व्यवहारमें प्राप्त सभी कर्म सब प्राणियोंके हितार्थ मरणपर्यंत निष्काम बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर करते जानाही सच्चा वैराग्य या 'नित्य-संन्यास' है (गीता ५. ३) ; इसी कारण कर्मयोग-मार्गमें स्वरूपसे कर्मका संन्यासकर भिक्षा कभीभी नहीं माँगते । परंतु बाहरी आचरणसे देखनेमें यदि इस प्रकार भेद दिखे, तोभी संन्यास और त्यागके सच्चे तत्त्व कर्मयोग-मार्गमेंभी कायमही रहते हैं; इसलिये गीताका अंतिम सिद्धान्त है, कि स्मृति-ग्रंथोंकी आश्रम-व्यवस्थाका और निष्काम कर्मयोगका विरोध नहीं है । संभव है, कि उपर्युक्त इस विवेचनसे कुछ लोगोंकी कदाचित् ऐसी समझ हो जाय, कि संन्यास धर्मके साथ कर्मयोगका मेल करनेका जो इतना बड़ा उद्योग गीतामें किया गया है, उसका कारण यह है, कि स्मार्त या संन्यास धर्म प्राचीन होगा; और कर्मयोग-मार्ग उसके बादका होगा । परंतु इतिहासकी दृष्टिसे विचार करनेपर कोईभी जान सकेगा, कि सच्ची स्थिति ऐसी नहीं है । यह पहलेही कह चुके हैं, कि वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप कर्मकांडात्मकही था । आगे चल- कर उपनिषदोंके ज्ञानसे कर्मकांडको गौणता प्राप्त होने लगी; और कर्मत्यागरूपी संन्यास धीरे धीरे प्रचारमें आने लगा । वैदिक धर्म-वृक्षकी वृद्धिकी यह दूसरी सीढ़ी है । परंतु ऐसे समयमेंभी, उपनिषदोंके ज्ञानका कर्मकांडसे मेल मिलाकर जनक प्रभृति ज्ञाता पुरुष अपने कर्म निष्काम बुद्धिसे जीवनभर किया करते थे - अर्थात् कहना चाहिये, कि वैदिक धर्म वृक्षकी यह दूसरी सीढ़ी दो प्रकारकी थी; एक जनक आदिकी और दूसरी याज्ञवल्क्य प्रभृतिकी । स्मार्त आश्रम-व्यवस्था इसके बादकी अर्थात् तीसरी सीढ़ी है। दूसरी सीढ़ीके समान तीसरीकेभी दो भेद हैं। स्मृति-ग्रंथोंमें कर्मत्यागरूप चौथे आश्रमकी महत्ता गाई तो अवश्य गई है: पर उसके साथही जनक आदिके ज्ञानयुक्त कर्मयोगकाभी - उसको संन्यास आश्रमका विकल्प समझकर - स्मृति-प्रणेताओंने वर्णन किया है। उदाहरणार्थ, सब स्मृति-ग्रंथोंमें मूलभूत मनुस्मृति- कोही लीजिये । इस स्मृतिके छठे अध्यायमें कहा है, कि मनुष्यको ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ आश्रमोंसे चढ़ते चढ़ते कर्मत्यागरूप चौथा आश्रम लेना चाहिये, परंतु संन्यास आश्रम अर्थात् यतिधर्मका यह निरूपण समाप्त होनेपर मनुने पहले यह प्रस्तावना की है, कि “ यह यतियोंका अर्थात् संन्यासियोंका धर्म बतलाया; अब