श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र छोड़ दे; तब अठारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने भगवान्से अंतमें प्रश्न किया है, कि "तो फिर मुझे बतलाइये कि, संन्यास और त्यागमें क्या तत्त्व है?" अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं, "अर्जुन ! यदि तुमने समझा हो, कि मैंने इतने समयतक जो कर्मयोग-मार्ग बतलाया है, उसमें संन्यास नहीं है, तो वह समझ गलत है। कर्मयोगी पुरुष सब कर्मोंके दो भेद करते हैं - एकको कहते हैं 'काम्य' अर्थात् आसक्त बुद्धिसे किये कर्म; और दूसरेको कहते हैं 'निष्काम' अर्थात् आसक्ति- को छोड़कर किये गये कर्म। (मनु. १२. ८९ में इन्ही कर्मोंको क्रमसे 'प्रवृत्त' और 'निवृत्त' नाम दिये है।) इनमेंसे 'काम्य' वर्गके जितने कर्म हैं, उन सबको कर्म- योगी बिलकुल छोड़ देता है - अर्थात् वह उनका 'संन्यास' करता है। बाकी रह गये 'निष्काम' या निवृत्त कर्म। सो कर्मयोगी ये निष्काम कर्म करता तो है, पर उन सबमें फलाशाका 'त्याग' सर्वथैव रहता है। सारांश, कर्मयोग-मार्गमेंभी 'संन्यास' और 'त्याग' छूटा कहाँ है? स्मार्त मार्गवाले कर्मका स्वरूपतः संन्यास करते हैं, तो उसके स्थानमें कर्म-मार्गके योगी कर्मफलाशाका संन्यास करते हैं- इस तरह संन्यास दोनों ओर कायमही है" (गीता १८. १-६ पर हमारी टीका देखो)। भागवत धर्मका यह मुख्य तत्त्व है, कि जो पुरुष अपने सभी कर्म परमेश्वरको अर्पणकर निष्काम बुद्धिसे करने लगे, वह गृहस्थाश्रमी हो तोभी उसे 'नित्य-संन्यासीही' कहना चाहिये (गीता ५. ३)। और भागवत-पुराणमें पहले सब आश्रम-धर्म बतला कर अंतमें नारदने युधिष्ठिरको इसी तत्त्वका उपदेश किया है। वामन पंडितने गीतापर जो यथार्थदीपिका नामक टीका लिखी है, उसके (य. दी. १८. २) कथनानुसार "शिखा बोडुनि तोडिला दोरा" - मुंड मुंडानेपर और जनेऊ तोड़कर या हाथमें दंड लेकर भिक्षा मांगकर, अथवा सब कर्म छोड़कर जंगलमें जा रहनेपरभी संन्यास नहीं हो जाता। संन्यास और वैराग्य बुद्धिके धर्म हैं; दंड, चोटी या जनेऊके नहीं। यदि कहो, कि ये दंड आदिकेही धर्म हैं; बुद्धिके अर्थात् ज्ञानके नहीं; तो राजछत्र अथवा छतरीकी डांडी पकड़नेवालेकोभी संन्यासीको प्राप्त होनेवाला मोक्ष मिलना चाहिये। जनकगुलभा-संवादमें ऐसेही कहा है (शां. ३२०-४२) :- त्रिदण्डादिषु यद्यस्ति मोक्षो ज्ञाने न कस्यचित् । छत्रादिषु कथं न स्यात्तुल्यहेतौ परिग्रहे ॥ क्योंकि दंडपरिग्रह अर्थात् हाथमें दंड धारण करनेमें, यह मोक्षका हेतु दोनों स्थानोंमें एकही है। तात्पर्य यही, कि कायिक, वाचिक और मानसिक संयमही सच्चा त्रिदंड है (मनु. १२. १०); और सच्चा संन्यास काम्यबुद्धिका संन्यास है (गीता १८. २)। एवं वह जिस प्रकार भागवत धर्ममें नहीं छूटता (गीता ६. २) उसी प्रकार बुद्धिको स्थिर रखनेका कर्म या भोजन आदि कर्मभी सांख्य-मार्गमें अंततक छूटताही नहीं है। फिर ऐसी क्षुद्र शंकाएँ करके भगवे या सफ़ेद कपड़ोंके लिये झगड़नेसे क्या लाभ होगा, कि त्रिदंडी या कर्मत्यागरूप संन्यास कर्मयोग-मार्गमें नहीं है, इसलिये