श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहा है, कि ज्ञानी पुरुष अंतमें संन्यास ले लें; परंतु ऊपर कह चुके हैं, कि स्मार्त-मार्गके अनुसारही इस नियमके कुछ अपवादभी हैं। उदाहरण लीजिये; बृहदारण्यकोप- निषदमें याज्ञवल्क्यने जनकको ब्रह्मज्ञानका बहुत उपदेश किया है, पर उन्होंने जनकसे यह कहींभी नहीं कहा, कि "अब तुम राजपाट छोड़कर संन्यास ले लो।" उलटे यह कहा है, कि जो ज्ञानी पुरुष ज्ञानके पश्चात् संसारको छोड़ देते हैं, वे इसलिये उसे छोड़ देते हैं, कि संसार उन्हें रुचता नहीं है "न कामयन्ते" (बृ. ४. ४. २२)। इससे बृहदारण्यकोपनिषदका यह अभिप्राय व्यक्त होता है, कि ज्ञानके पश्चात् संन्यास लेना या न लेना अपनी अपनी खुशीकी अर्थात् वैकल्पिक बात है। ब्रह्मज्ञान और संन्यासका संबंध नित्य नहीं, और वेदान्तसूत्रमें बृहदारण्यकोपनिषदके इस वचनका अर्थ वैसेही लगाया गया है (वे. सू. ३. ४. १५)। शंकराचार्यका निश्चित सिद्धान्त है, कि ज्ञानोत्तर कर्मसंन्यास किये बिना मोक्ष मिल नहीं सकता, इसलिये अपने भाष्यमें उन्होंने इस मतकी पुष्टिमें सब उपनिषदोंकी अनुकूलता दिखलानेका प्रयत्न किया है तथापि शंकराचार्यनेभी स्वीकार किया है, कि जनक आदिके समान ज्ञानोत्तरभी अधिकारानुसार जीवनभर कर्म करते रहनेमें कोई क्षति नहीं है (वे. सू. शां. भा. ३. ३.३२; गीता शां. भा. २. ११; ३. २०)। इससे स्पष्ट विदित होता है, कि संन्यास या स्मार्त-मार्गकोभी ज्ञानके पश्चात् कर्म बिलकुलही त्याज्य नहीं जँचते, कुछ ज्ञानी पुरुषोंको अपवाद मान, अधिकारके अनुसार कर्म करनेकी स्वतंत्रता इस मार्गमेंभी दी गई है। इसी अपवादको और व्यापक बना कर गीता कहती है, कि चातुर्वर्ण्यके लिये विहित कर्म ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपरभी, लोकसंग्रहके निमित्त केवल कर्तव्य समझकर प्रत्येक ज्ञानी पुरुषको निष्काम बुद्धिसे करना चाहिये। इससे सिद्ध होता है, कि गीता- धर्म व्यापक हो, तोभी उसका तत्त्व संन्यास-मार्गवालोंकी दृष्टिसेभी निर्दोष है, और वेदान्तसूत्रोंको स्वतंत्र रीतिसे पढ़नेपर जान पड़ेगा, कि उनमेंभी ज्ञानयुक्त कर्मयोग संन्यासका विकल्प समझकर ग्राह्य माना गया है। (वे. सू. ३. ४. २६; ३. ४. ३२-३५)।* अब यह बतलाना आवश्यक है, कि निष्काम बुद्धिसेही क्यों न हो, पर जब मरणपर्यंत कर्मही करने हैं, तब स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित कर्मत्यागरूपी चतुर्थ आश्रम या संन्यास आश्रमकी क्या दशा होगी ? अर्जुन अपने मनमें यही सोच रहा था, कि भगवान् कभी-न-कभी कहेंगेही, कि कर्मत्यागरूपी संन्यास लियेबिना मोक्ष नहीं मिलता; और तब भगवान्के मुखसेही युद्ध छोड़नेके लिये मुझे स्वतंत्रता मिल जावेगी। परंतु अब अर्जुनने देखा, कि सत्रहवें अध्यायके अंततक भगवान्के कर्मत्यागरूप संन्यास आश्रमकी बात नहीं की; बार-बार केवल यही उपदेश किया, कि फलाशाको
- वेदान्तसूत्रके इस अधिकरणका अर्थ शांकरभाष्यमें कुछ निराला है। परंतु 'विहितं त्वच्चाश्रमकर्माणि 'का (३. ४. ३२) अर्थ हमारे मतमें ऐसा है, कि "ज्ञानी पुरुष आश्रम-कर्मभी करें, तो अच्छा है। क्योंकि वह विहित है।" सारांश, हमारी समझसे वेदान्तसूत्रमें ये दोनों पक्ष स्वीकृत हैं, कि "ज्ञानी पुरुष कर्म करे चाहे न करे।"