भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

संन्यास और कर्मयोग ३५३ रूपमें ग्राह्य कर्मयोग मानना पड़ा। यह हुई वैदिक कर्मयोगकी बात। श्रीकृष्णके पहले जनक आदि इसीका आचरण करते थे। परंतु आगे भगवानने उसमें भक्तिकोभी मिला दिया; और उसका बहुत प्रसार किया, इस कारण उसीही 'भागवत-धर्म' नाम प्राप्त हो गया है। यद्यपि भगवद्गीताने इस प्रकार संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकोही अधिक श्रेष्ठता दी है, तथापि कर्मयोग-मार्गको आगे गौणता क्यों प्राप्त हुई - और संन्यास-मार्गकाही बोलबाला क्यों हो गया ? - इसका विचार ऐतिहासिक दृष्टिसे आगे किया जावेगा। यहाँ इतनाही कहना है कि, कर्मयोग स्मार्त-मार्गके पश्चातका नहीं है, वह प्राचीन वैदिक कालसे चला आ रहा है। भगवद्गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमें “इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे” इस प्रकार जो संकल्प है, उसका मर्म अब पाठकोंके ध्यानमें पूर्णतया आ जावेगा। यह संकल्प बतलाता है, कि भगवानके गाये हुए उपनिषदमें, अन्य उपनिषदोंके समान ब्रह्मविद्या तो है; पर अकेली ब्रह्मविद्याही नहीं है। प्रत्युत ब्रह्मविद्यामें 'सांख्य' और 'योग' (वेदान्ती संन्यासी और वेदान्ती कर्मयोगी), ये जो दो पंथ उपजते हैं, उनमेंसे योगका अर्थात् कर्मयोगका प्रतिपादनही भगवद्गीताका मुख्य विषय है। यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं, कि भगवद्गीतोपनिषत् कर्मयोगका प्रधान ग्रंथ है; क्योंकि यद्यपि कर्मयोग वैदिक कालसे चला आ रहा है, तथापि “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” (ईश. २) या “आरंभ कर्माणि गुणान्वितानि” (श्वे. ६. ४), अथवा “विद्याके साथ-ही-साथ स्वाध्याय आदि कर्म करने चाहिये” (तै. १. ९), इस प्रकारके कुछ थोड़े-से उल्लेखोंके अतिरिक्त उपनिषदोंमें इस कर्मयोगका विस्तृत विवेचन कहींभी नहीं किया गया है; कर्मयोगपर भगवद्गीताही मुख्य और प्रमाणभूत ग्रंथ है; और काव्यकी दृष्टिसेभी यह ठीकही जंचता है, कि भारत- भूमिके कर्ता पुरुषोंके चरित्र जिस महाभारतमें वर्णित हैं, उसीमें अध्यात्मशास्त्रको लेकर कर्मयोगकीभी उपपत्ति बतलाई जावे। इस बातकाभी अब अच्छी तरह पता लग जाता है, कि प्रस्थानत्रयीमें भगवद्गीताका समावेश क्यों किया गया है। यद्यपि उपनिषद् मूलभूत हैं, तोभी उनके कहनेवाले ऋषि अनेक हैं; इस कारण उन उपनिषदोंके विचार संकीर्ण और कुछ स्थानोंमें परस्पर-विरोधीभी दीख पड़ते हैं। इसलिये उपनिषदोंके साथ-ही-साथ उनकी एकवाक्यता करनेवाले वेदान्तसूत्रोंकीभी प्रस्थानत्रयीमे गणना करना आवश्यक था। परंतु उपनिषद् और वेदान्तसूत्र, इन दोनोंकी अपेक्षा यदि गीतामें कुछ अधिकता न होती, तो प्रस्थानत्रयीमें गीताके संग्रह करनेका कोईभी कारण न था। किंतु उपनिषदोंका झुकाव प्रायः संन्यास- मार्गकी ओर है, एवं उनमें ज्ञानमार्गकाही विशेषतः प्रतिपादन है; और भगवद्- गीतामें इस ज्ञानको लेकर भक्तियुक्त कर्मयोगका समर्थन है, बस - इतना कह देनेसे गीताकी अपूर्वता सिद्ध हो जाती है, और साथ-ही-साथ प्रस्थान-त्रयीके तीनों भागोंकी सार्थकताभी व्यक्त हो जाती है। क्योंकि वैदिक धर्मके प्रमाणभूत ग्रंथमें यदि ज्ञान गी. र. २३