भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 399

३५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और कर्म ( सांख्य और योग ), इन दोनों वैदिक मार्गोंका विचार न हुआ होता, तो प्रस्थान-त्रयी उतनी अपूर्णही रह जाती। कुछ लोगोंकी समझ है, कि जब उपनिषद् सामान्यतः निवृत्तिविषयक हैं, तब गीताका प्रवृत्तिविषयक अर्थ लगानेसे प्रस्थान- त्रयीके तीनों भागोंमें विरोध हो जायगा और उनकी प्रामाणिकतामेंभी न्यूनता आ जावेगी। यदि सांख्य अर्थात् संन्यासही एकमात्र सच्चा वैदिक मोक्षमार्ग हो, तो यह शंका ठीक होगी, परंतु ऊपर दिखाया जा चुका है, कि कम-से-कम ईशावास्य आदि कुछ उपनिषदोंमें कर्मयोगका स्पष्ट उल्लेख है। इसलिये वैदिक धर्मपुरुषको केवल एकहत्थी अर्थात् संन्यासप्रधान न समझकर, यदि गीताके अनुसार ऐसा सिद्धान्त करें, कि उस वैदिक धर्मपुरुषके ब्रह्मविद्यारूप एकही मस्तक है; और मोक्षदृष्टिसे तुल्यबल सांख्य और कर्मयोग उसके दाहिने-बाएँ दो हाथ हैं; तो गीता और उपनिषदोंमें कोई विरोध नहीं रह जाता। उपनिषदोंमें एक मार्गका समर्थन है और गीतामें दूसरे मार्गका, इस लिये प्रस्थान-त्रयीके ये दोनों भागभी दो हाथोंके समान परस्परविरुद्ध न हो, सहाय्यकारीही दीख पड़ेंगे। ऐसेही, गीतामें केवल उपनिषदोंकाही प्रतिपादन माननेसे, पिष्टपेषणका जो वैयर्थ्य गीताको प्राप्त हो जाता, वहभी नहीं होता। गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने इस विषयकी उपेक्षा की है, इस कारण सांख्य और योग, इन दोनों स्वतंत्र मार्गोंके पुरस्कर्ता अपने अपने पंथके समर्थनमें जिन मुख्य कारणोंको बतलाया करते हैं, उनकी समता और विषमता चटपट ध्यानमें आ जानेके लिये, नीचे दिये गये नक्शेके दो खानोंमें वेही कारण परस्पर एक दूसरेके सामने संक्षेपसे दिये गये हैं। स्मृति-ग्रंथोंमें प्रतिपादित अर्थात् स्मार्त आश्रम-व्यवस्था और मूल भागवत धर्मके मुख्य भेद इससे ज्ञात हो जावेंगे। ब्रह्मविद्या या आत्मज्ञान प्राप्त होनेपर कर्मसंन्यास ( सांख्य ) कर्मयोग ( योग ) ( १ ) मोक्ष आत्मज्ञानसेही मिलता ( १ ) मोक्ष आत्मज्ञानसेही मिलता है, कर्मसे नहीं। ज्ञानविरहित, किंतु है, कर्मसे नहीं। ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धापूर्वक किये गये यज्ञ-याग आदि श्रद्धापूर्वक किये गये यज्ञ-याग आदि कर्मोंसे कर्मोंसे मिलनेवाला स्वर्गसुख अनित्य है। मिलनेवाला स्वर्गसुख अनित्य है। ( २ ) आत्मज्ञान होनेके लिये इंद्रिय- ( २ ) आत्मज्ञान होनेके लिये इंद्रिय- निग्रहसे बुद्धिको स्थिर, निष्काम, विरक्त निग्रहसे बुद्धिको स्थिर, निष्काम, विरक्त और सम करना पड़ता है। और मम करना पड़ता है।