भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

३५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र याग भलेही डूब गये हों; पर स्मार्त-यज्ञ अर्थात् चातुर्वर्ण्यके कर्म अबभी जारीही हैं! इसलिये अज्ञान से, परंतु श्रद्धापूर्वक, यज्ञ-याग आदि काम्य कर्म करनेवाले लोगोंके विषयमें गीताका जो सिद्धान्त है, वह ज्ञानविरहित किंतु श्रद्धासहित चातुर्वर्ण्य आदि कर्म करनेवालोंकोभी वर्तमान स्थितिमें पूर्णतया उपयुक्त है। जगतके व्यवहारकी ओर दृष्टि देनेपर ज्ञात होगा, कि समाजमें इसी प्रकारके लोगोंकी अर्थात् शास्त्रों- पर श्रद्धा रखकर नीतिसे अपने कर्म करनेवालोंकीही विशेष अधिकता रहती है। परंतु उन्हें परमेश्वरका स्वरूप पूर्णतया ज्ञात नहीं रहता, इसलिये गणितशास्त्रकी पूरी उपपत्ति समझे बिनाही केवल मौलिक हिसाब करनेकी रीतिसे गणित करनेवाले लोगोंके समान इन श्रद्धालु और कर्मठ मनुष्योंकी अवस्था हुआ करती है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि सभी कर्म शास्त्रोक्त विधिसे और श्रद्धापूर्वक करनेके कारण वे निर्दोष (शुद्ध) हो जाते हैं, एवं इसीसे पुण्यप्रद अर्थात् स्वर्गप्रद हो जाते हैं। परंतु शास्त्रकाही सिद्धान्त है, कि बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं मिलता, इसलिये स्वर्ग- प्राप्तिकी अपेक्षा अधिक महत्त्वका कोईभी फल इन कर्मठ लोगोंको मिल नहीं सकता। अतएव स्वर्गसुखसेभी जो परे है, उस अमृतत्व प्राप्ति जिसे कर लेनी हो - और यहो तो एक परम पुरुषार्थ है - उसे उचित है, कि वह पहले साधन समझकर और आगे सिद्धावस्थामें लोकसंग्रहके लिये, अर्थात् जीवनपर्यन्त "समस्त प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है" इस ज्ञानयुक्त बुद्धिसे, निष्काम कर्म करनेके मार्गकाही स्वीकार करे। आयु बितानेके सब मार्गोंमेंसे यही मार्ग उत्तम है। गीताका अनुकरण कर ऊपर दिये गये नक्शोंमें इस मार्गको कर्मयोग कहा है और इसेही कुछ लोग कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति- मार्गभी कहते हैं। परंतु कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति-मार्ग, इन दोनों शब्दोंसे ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धासहित कर्म करनेके स्वर्गप्रद मार्गकाभी सामान्यतः बोध हुआ करता है। इसलिये ज्ञानविरहित, किंतु श्रद्धायुक्त कर्म और ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म, इन दोनोंका भेद दिखलानेके लिये दो भिन्न भिन्न शब्दोंकी योजना करनेकी आवश्यकता होती है; और इसी कारणसे मनुस्मृति तथा भागवतमेंभी पहले प्रकारके कर्म अर्थात् ज्ञानविरहित कर्मको 'प्रवृत्त कर्म', और दूसरे प्रकारके अर्थात् ज्ञानयुक्त निष्काम कर्मको 'निवृत्त कर्म' कहा है (मनु. १२. ८९.; भाग. ७. १५. ४७)। परंतु हमारी रायमें ये शब्दभी जितने होने चाहिये, उतने निस्संदिग्ध नहीं हैं! क्योंकि 'निवृत्ति' शब्दका सामान्य अर्थ 'कर्म से परावृत्त होना' है। अतः इस शंकाको दूर करनेके लिये 'निवृत्त' शब्दके आगे 'कर्म' विशेषण जोड़ते हैं, और ऐसा करनेसे 'निवृत्त' विशेषणका अर्थ 'कर्मसे परावृत्त' नहीं होता; और निवृत्त कर्म = निष्काम कर्म, यह अर्थ निष्पन्न हो जाता है। कुछभी हो; जब तक 'निवृत्त' शब्द उसमें है, तब तक कर्मत्यागकी कल्पना मनमें आये बिना नहीं रहती। इसीलिये ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म करनेके मार्गको "निवृत्ति या निवृत्त कर्म" न कहकर 'कर्मयोग' नाम देना हमारे मतमें उत्तम है। क्योंकि कर्मके आगे योग शब्द जुड़ा रहनेसे स्वभावतः उसका अर्थ "मोक्षमें