श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३५७ (११) कर्म-संन्यास ले चुकने परभी (११) ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् फलाशा- शम-दम आदिक धर्म पालते जाना त्यागरूप संन्यास ले कर शम-दम आदिक चाहिये । धर्मोंके सिवा आत्मौपम्यदृष्टिसे प्राप्त होनेवाले सभी धर्मोंका पालन किया करो; और इस शम अर्थात शांतवृत्ति- सेही शास्त्रसे प्राप्त समस्त कर्म लोकसंग्रहके निमित्त मरणपर्यंत करते जाओ । निष्काम कर्म न छोड़ो । (१२) यह मार्ग अनादि और (१२) यह मार्ग अनादि और श्रुति- श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित है । स्मृति-प्रतिपादित है । (१३) शुक-याज्ञवल्क्य आदि इस (१३) व्यास-वसिष्ठ-जैगीषव्य इ. मार्गसे गये हैं । और जनक-श्रीकृष्ण प्रभृति इस मार्गसे गये हैं । अंतमें मोक्ष ये दोनों मार्ग अथवा निष्ठाएँ ब्रह्मविद्यामूलक हैं और दोनों ओर मनकी निष्काम अवस्था और शांति एकही प्रकारकी है । इस कारण दोनों मार्गोंसे अंतमें एकही मोक्ष प्राप्त हुआ करता है (गीता ५. ५) । ज्ञानके पश्चात् कर्मको छोड़ बैठना और काम्य कर्म छोड़कर नित्य निष्काम कर्म करते रहना, यही इन दोनोंमें मुख्य भेद है । ऊपर बतलाये हुए कर्म छोड़ने और कर्म करनेके दोनों मार्ग ज्ञानमूलक हैं अर्थात् ज्ञानके पश्चात् ज्ञानी पुरुषोंके द्वारा स्वीकृत और आचरित हैं । परंतु कर्म छोड़ना और कर्म करना, दोनों बातें ज्ञान न होने परभी हो सकती हैं । इसलिये इस अज्ञानमूलक कर्मका और कर्मके त्यागकाभी यहाँ थोड़ासा विवेचन करना आवश्यक है । गीताके अठारहवें अध्यायमें त्यागके जो तीन भेद बतलाये गये हैं, उनका रहस्य यही है । ज्ञान न रहने परभी कुछ लोग निरे काय-क्लेश-भयसे कर्म छोड़ दिया करते हैं-इसे गीतामें 'राजस त्याग' कहा है (गीता १८. ८) । इसी प्रकार ज्ञान न रहनेपरभी कुछ लोग कोरी श्रद्धासेही यज्ञ-याग प्रभृति कर्म किया करते हैं । परंतु गीताका कथन है, कि कर्म करनेका यह मार्ग मोक्षप्रद नहीं है-केवल स्वर्गप्रद है (गीता ९. २०) । कई लोगोंकी समझ है, कि आजकल यज्ञ-याग प्रभृति श्रौत धर्मका प्रचार न रहनेके कारण, मीमांसकोंके इस निरे कर्म-मार्गके संबंधमें गीताका सिद्धान्त इन दिनों विशेष उपयोगी नहीं; परंतु वह ठीक नहीं है । क्योंकि श्रौत यज्ञ-