श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (८) ज्ञानप्राप्तिके अनंतर अपना निजी कर्तव्य कुछ शेष नहीं रहता; और लोकसंग्रह करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं। (८) ज्ञानप्राप्ति करनेके अनंतर अपने लिये भलेही कुछ प्राप्त करनेको न रहे; परंतु कर्म नहीं छूटते। इसलिये जो कुछ शास्त्रसे प्राप्त हो, उसे 'मुझे नहीं चाहिये' ऐसी निर्मम बुद्धिसे लोक- संग्रहकी ओर दृष्टि रखकर करते जाओ। लोकसंग्रह किसीसेभी नहीं छूटता। उदाहरणार्थ, भगवान्का चरित देखो। (९) परंतु यदि अपवादस्वरूप कोई अधिकारी पुरुष ज्ञानके पश्चात्भी अपने व्यावहारिक अधिकार जनक आदिके समान जीवनपर्यंत जारी रखे, तो कोई हानि नहीं। (९) गुणविभागरूप चातुर्वर्ण्य- व्यवस्थाके अनुसार छोटे-बड़े अधिकार सभीको जन्मसेही प्राप्त होते हैं; और स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले इन अधि- कारोंको लोकसंग्रहार्थ निःस्वार्थ-बुद्धिसे सभीको निरपवादरूपसे जीवनपर्यंत जारी रखना चाहिये। क्योंकि यह चक्र जगतको धारण करनेके लिये परमेश्वर- नेही बनाया है। (१०) इतना होने परभी कर्म- त्यागरूपी संन्यासही श्रेष्ठ है। अन्य आश्रमोंके कर्म चित्तशुद्धिके साधनमात्र हैं और ज्ञान और कर्मका तो स्वभावसेही विरोध है। इसलिये पूर्व आश्रममें, जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी चित्तशुद्धि करके ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् अंतमें कर्मत्यागरूपी संन्यास लेना चाहिये। चित्तशुद्धि जन्मतेही या पूर्व आयुमें हो जावे, तो गृहस्थाश्रमके कर्म करते रहने- कीभी आवश्यकता नहीं है। कर्मका स्वरूपतः त्याग करनाही सच्चा संन्यास- आश्रम है। (१०) यह सच है, कि शास्त्रोक्त रीतिसे सांसारिक कर्म करनेपर चित्त- शुद्धि होती है, परंतु केवल चित्तकी शुद्धिही कर्मका उपयोग नहीं है। जगत्का व्यवहार चलता रखनेके लियेभी कर्मकी आवश्यकता है। इसी प्रकार काम्यकर्म और ज्ञानका विरोध भलेही हो; पर निष्काम कर्म और ज्ञानके बीच बिलकुल विरोध नहीं है। इसलिये चित्तकी शुद्धिके पश्चात्भी फलाशाका त्याग कर निष्काम बुद्धिसे जगतके संग्रहार्थ चातुर्वर्ण्यके सब कर्म आमरण जारी रखनाही सच्चा संन्यास है। कर्मका स्वरूपतः त्याग करना कभीभी उचित नहीं; और शक्यभी नहीं है।