भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 404

संन्यास और कर्मयोग ३५९ बाधा न देकर कर्म करनेकी युक्ति" होता है; और अज्ञानयुक्त कर्मका तो आपही-से निरसन हो जाता है। फिरभी यह न भूल जाना चाहिये, कि गीताका कर्मयोग ज्ञानमूलक है। और यदि इसेही कर्म-मार्ग या प्रवृत्ति-मार्ग कहना किसीको अभीष्ट जँचता हो, तो ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं। स्थल-विशेषमें भाषावैचित्र्यके लिये गीताके कर्मयोगको लक्ष्यकर हमनेभी इन शब्दोंकी योजना की है। अस्तु, इस प्रकार कर्म करने या कर्म छोड़नेके ज्ञानमूलक और अज्ञानमूलक जो भेद हैं, उनमेंसे प्रत्येकके संबंधमें गीताशास्त्रका अभिप्राय इस प्रकार है :-

आयु बितानेका मार्ग | श्रेणी | गति

१. कामोपभोगकोही पुरुषार्थ मान- | अधम | नरक कर अहंकारसे, आसुरी बुद्धिसे, दंभसे | | या लोभसे केवल आत्मसुखके लिये कर्म | | करना (गीता १६. १६) - आसुर | | अथवा राक्षसी मार्ग है। | |

१. प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है | मध्यम | स्वर्ग

  • इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका | (मीमांस- | (मीमांसकोंके यथार्थ ज्ञान न होनेपरभी वेदोंकी आज्ञा | कोंके मतमें | मतमें मोक्ष) या शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार श्रद्धा | उत्तम) | और नीतिसे अपने अपने काम्य कर्म | | करना (गीता २. ४१-४४; ९-२०) - | | केवल कर्म, त्रयी धर्म अथवा मीमांसक | | मार्ग है। | |

१. शास्त्रोक्त निष्काम कर्मोंसे परमे- | उत्तम | मोक्ष श्वरका ज्ञान हो जानेपर अंतमें वैराग्यसे | | समस्त कर्म छोड़ केवल ज्ञानमेंही तृप्त | | हो रहना (गीता ५. २) - केवल ज्ञान, | | सांख्य अथवा स्मार्त मार्ग है। | |

१. पहले चित्तकी शुद्धिके निमित्त, | सर्वोत्तम | मोक्ष और उससे परमेश्वरका ज्ञान प्राप्त हो | | जानेपर; फिर केवल लोकसंग्रहार्थ, | | मरणपर्यंत भगवानके समान निष्काम कर्म | | करते रहना (गीता ५. २) - ज्ञानकर्म- | | समुच्चय, कर्मयोग या भागवत मार्ग है। | |

[मध्य-दाहिनी ओर कोष्ठक-टिप्पणी: पंक्ति १९ से ३९ तक — 'जनक-वर्णित तीन निष्ठाएँ'] [सुदूर-दाहिनी ओर कोष्ठक-टिप्पणी: पंक्ति २८ से ३९ तक — 'गीताकी दो निष्ठाएँ']