श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सारांश, यही पक्ष गीतामें सर्वोत्तम ठहराया गया है, कि मोक्ष-प्राप्तिके लिये यद्यपि कर्मकी आवश्यकता नहीं है, तथापि उसके साथही साथ दूसरे कारणोंके लिये - अर्थात् एक तो अपरिहार्य समझकर और इसके सिवा जगत्के धारणपोषणके लिये आवश्यक मानकर - निष्काम बुद्धिसे सदैव समस्त कर्मोंको करते रहना चाहिये । अथवा गीताका अंतिम सिद्धान्त है, कि "कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ।" (मनु. १. ९७), मनुके इस वचनके अनुसार कर्तृत्व और ब्रह्मज्ञानका योग या मेलही सबसे उत्तम है; और निरा कर्तृत्व या कोरा ब्रह्मज्ञान, प्रत्येक एकदेशीय है। वास्तवमें यह प्रकरण यहीं समाप्त हो गया। परंतु यह दिखलानेके लिये - कि गीताका सिद्धान्त श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित है - ऊपर भिन्न भिन्न स्थानोंपर जो वचन उद्धृत किये हैं, उनके संबंधमें कुछ कहना आवश्यक है। क्योंकि उप- निषदोंके सांप्रदायिक भाष्योंसे बहुतेरोंकी यह समझ हो गई है, कि समस्त उप- निषद संन्यास-प्रधान या निवृत्ति-प्रधान हैं। हमारा यह कथन नहीं, कि उपनिषदोंमें संन्यास-मार्ग प्रतिपादित हैही नहीं। बृहदारण्यकोपनिषदमें कहा है - यह अनुभव हो जानेपर, कि परब्रह्मके सिवा और कोई वस्तु सत्य नहीं है, "कुछ ज्ञानी पुरुष पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा की" - चिंता न कर, "हमें संततिसे क्या काम ? संसारही हमारा आत्मा है", यह कहकर आनंदसे भिक्षा माँगते हुए घूमते हैं। (४. ४. २२) । परंतु बृहदारण्यकमें यह नियम कहीं नहीं मिलता, कि समस्त ब्रह्मज्ञानियोंको यही पक्ष स्वीकार करना चाहिये। और क्या कहें ? जिसे यह उपदेश किया गया, उसका इसी उपनिषदमें वर्णन है, कि वह जनक राजा ब्रह्म- ज्ञानके शिखरपर पहुँचकर अमृत हो गया था। परंतु यह कहीं नहीं बतलाया है, कि उसने याज्ञवल्क्यके समान जगत्को छोड़ कर संन्यास ले लिया। इससे स्पष्ट होता है, कि जनकका निष्काम कर्मयोग और याज्ञवल्क्यका कर्मसंन्यास मार्ग - दोनों
- बृहदारण्यकोपनिषदको विकल्प-रूपसे संमत हैं; और वेदान्तसूत्र-कर्तानेभी यही अनुमान किया है (वे. सू. ३. ४. १५)। कठोपनिषद् इससेभी आगे बढ़ गया है। पाँचवें प्रकरणमें हम यह दिखला चुके हैं, कि हमारे मतमें कठोपनिषदमें निष्काम कर्मयोगही प्रतिपाद्य है। छान्दोग्योपनिषदमें (छां. ८. १५. १) यही अर्थ प्रतिपाद्य है और यह स्पष्ट कह दिया है, कि "गुरुसे अध्ययन कर, फिर कुटुंबमें रहकर धर्मसे बर्तनेवाला ज्ञानी पुरुष ब्रह्मलोकको जाता है, वहाँसे फिर नहीं लौटता।" तैत्तिरीय तथा श्वेताश्वतर उपनिषदोंके इसी अर्थके वाक्य ऊपर दिये गये हैं; (तै. १. ९; श्वे. ६. ४)। इसके सिवा यहभी ध्यान देनेयोग्य बात है, कि उपनिषदोंमें जिन्होंने दूसरोंको ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया है, उनमें या उनके ब्रह्मज्ञानी शिष्योंमें, याज्ञ- वल्क्यके समान एक-आध पुरुषके अतिरिक्त, कोई ऐसा नहीं मिलता, जिसने कर्म- त्यागरूप संन्यास लिया हो। इसके विपरीत, उनके वर्णनोंसे दीख पड़ता है, कि वे गृहस्थाश्रमीही थे। अतएव कहना पड़ता है, कि समस्त उपनिषद् संन्यास-प्रधान