भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 406

संन्यास और कर्मयोग ३६१ नहीं हैं; इनमेंसे कुछमें तो संन्यास और कर्मयोगका विकल्प है और कुछमें सिर्फ ज्ञानकर्म-समुच्चयकाही प्रतिपादन है। परंतु उपनिषदोंके सांप्रदायिक भाष्योंमें ये भेद नहीं दिखलाये गये हैं; किंतु यही कहा गया है, कि समस्त उपनिषद् केवल एकही अर्थ - विशेषतः संन्यास - प्रतिपादन करते हैं। सारांश, सांप्रदायिक टीकाकारोंके हाथों गीताकी और उपनिषदोंकीभी एकही दशा हो गई है, अर्थात् गीताके कुछ श्लोकोंके समान उपनिषदोंके कुछ मंत्रोंकीभी इन भाष्यकारोंको खींचातानी करनी पड़ी है। उदाहरणार्थ, ईशावास्य उपनिषदको लीजिये। यद्यपि उपनिषद् छोटा अर्थात् सिर्फ अठारह श्लोकोंका है, तथापि इसकी योग्यता अन्य उपनिषदोंकी अपेक्षा अधिक समझी जाती है। क्योंकि यह उपनिषद् स्वयं वाजसनेयी संहितामेंही कहा गया है; और अन्यान्य उपनिषद् आरण्यक ग्रंथमें कहे गये हैं। यह बात सर्वमान्य है, कि संहिताकी अपेक्षा ब्राह्मण और ब्राह्मणोंकी अपेक्षा आरण्यक ग्रंथ उत्तरोत्तर कम प्रमाणके हैं। यह संपूर्ण ईशावास्योपनिषद् - अथसे इतिपर्यंत - ज्ञान-कर्म- समुच्चयात्मक है। उसके पहले मंत्रमें (श्लोक) यह कहकर, कि "जगतमें जो कुछ है, उसे ईशावास्य अर्थात् परमेश्वराधिष्ठित समझना चाहिये; " दूसरेही मंत्रमें स्पष्ट कह दिया है, कि "जीवनभर सौ वर्ष निष्काम कर्म करते रहकरही जीते रहनेकी इच्छा रखो।" वेदान्तसूत्रमें कर्मयोगका विवेचन करनेका जब समय आया, तब और अन्यान्य ग्रंथोंमेंभी ईशावास्यका यही वचन ज्ञान-कर्म-समुच्चयपक्षका समर्थकके नाते दिया हुआ मिलता है। परंतु ईशावास्योपनिषद् इतनेसेही पूरा नहीं हो जाता। दूसरे मंत्रमें कही गई बातका समर्थन करनेके लिये आगे 'अविद्या' (कर्म) और 'विद्या'के (ज्ञान) विवेचनका आरंभकर नवें मंत्रमें कहा है, कि "निरी अविद्याका (कर्म) करनेवाले पुरुष अंधकारमें घुसते हैं; और कोरी विद्यामें (ब्रह्मज्ञान) मग्न रहनेवाले पुरुष गहरे अँधेरेमें जा पड़ते हैं।" केवल अविद्या (कर्म) और केवल विद्याकी (ज्ञान) प्रत्येककी इस प्रकार अलग अलग लघुता दिखलाकर ग्यारहवें मंत्रमें नीचे लिखे अनुसार 'विद्या' और 'अविद्या', दोनों समुच्चयकी आवश्यकता इस उपनिषद्में वर्णनकी गई है :- विद्यां चाऽविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ "जिसने विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको एक दूसरीके साथ जान लिया, वह अविद्यासे (कर्मों) मृत्युको अर्थात् नाशवंत मायासृष्टिके प्रपंचको (भली भाँति) पार कर, विद्यासे (ब्रह्मज्ञानसे) अमृतत्वको प्राप्तकर लेता है।" - यही इस मंत्रका स्पष्ट और सरल अर्थ है। और यही अर्थ, विद्याको 'संभूति' अर्थात् जगत्‌का आदि कारण, एवं उससे भिन्न अविद्याको 'असंभूति' या 'विनाश' अर्थात् ये दूसरे नाम देकर इसके आगेके तीन मंत्रोंमें फिरसे दोहराया गया है (ईश. १२-१४) । इससे व्यक्त होता है, कि संपूर्ण ईशावास्योपनिषद् विद्या