भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

३६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और अविद्याका एककालीन (उभयं सह) समुच्चय प्रतिपादन करता है। उल्लि- खित मंत्रमें 'विद्या' और 'अविद्या' शब्दोंके समानही मृत्यु और अमृत शब्द परस्पर- प्रतियोगी हैं। इनमेंसे अमृत शब्दसे 'अविनाशी ब्रह्म' अर्थ प्रकट है; और इसके विपरीत मृत्यु शब्दमे “नाशवंत मृत्युलोक या ऐहिक संसार” यह अर्थ निष्पन्न होता है; और ये दोनों शब्द इसी अर्थमें ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमेंभी आये हैं (ऋ. १०. १२९. २)। विद्या आदि शब्दोंके ये सरल अर्थ लेकर – अर्थात् विद्या = ज्ञान, अविद्या = कर्म, अमृत = ब्रह्म और मृत्यु = मृत्युलोक, ऐसा समझकर – यदि ईशावास्यके उल्लिखित ग्यारहवें मंत्रका अर्थ करें, तो प्रथम दीख पड़ेगा, कि इस मंत्रके पहले चरणमें विद्या और अविद्याका एककालीन समुच्चय वर्णित है; और उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरे चरणमें इन दोनोंमेंसे प्रत्येकका भिन्न भिन्न फल बतलाया है। ईशावास्योपनिषदको ये दोनों फल इष्ट हैं; और इसीलिये इस उपनिषदमें ज्ञान और कर्म, दोनोंका एककालीन समुच्चय प्रतिपादित हुआ है। मृत्युलोकके प्रपंचको अच्छी रीतिसे चलाने या उससे भली भाँति पार पड़नेकोही गीतामें 'लोकसंग्रह' नाम दिया गया है। यह सच है, कि मोक्ष प्राप्त करना मनुष्य- का कर्तव्य है; परंतु उसके साथही उसे लोकसंग्रह करनाभी आवश्यक है; इसीसे गीताका सिद्धान्त है, कि ज्ञानी पुरुष यह लोकसंग्रहकारक कर्म न छोड़े; और यही सिद्धान्त शब्दभेदसे “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते” इस उल्लिखित मंत्रमें आ गया है। इससे प्रकट होगा, कि गीता उपनिषदोंको केवल पकड़ेही नहीं है; प्रत्युत ईशावास्योपनिषदमें स्पष्टतया वर्णित अर्थही गीतामें विस्तारसहित प्रतिपादित हुआ है। ईशावास्योपनिषद् जिस वाजसनेयी संहितामें है, उसी वाजसनेयी संहिताका भाग शतपथ ब्राह्मण है। इस शतपथ ब्राह्मणके आरण्यकमें बृहदारण्यकोपनिषद् आया है, जिसमें ईशावास्यका यह नवाँ मंत्र अक्षरशः ले लिया है, कि “कोरी विद्यामें (ब्रह्मज्ञान) मग्न रहनेवाले पुरुष गहरे अँधेरेमें जा पड़ते हैं” (बृ. ४. ४. १०)। इस बृहदारण्यकोपनिषदमेंही जनक राजाकी कथा है; और उसी जनकका दृष्टान्त कर्मयोगके समर्थनके लिये भगवान्ने गीतामें लिया है (गीता ३. २०)। इससे ईशावास्यका और भगवद्गीताके कर्मयोगका जो संबंध हमने ऊपर दिखलाया है, वही अधिक दृढ़ और निःसंशय सिद्ध होता है। परंतु जिनका सांप्रदायिक सिद्धान्त ऐसा है, कि सभी उपनिषदोंमें मोक्षप्राप्तिका एकही मार्ग प्रतिपाद्य है और वहभी वैराग्यका या संन्यासकाही है; उपनिषदोंमें दो-दो मार्गोंका प्रतिपादन होना शक्य नहीं; उन्हें ईशावास्योपनिषदके स्पष्टार्थक मंत्रोंकाभी, खींचातानी कर, किसी प्रकार निराला अर्थ लगाना पड़ता है। ऐसा न करें, तो ये मंत्र उनके संप्रदायके प्रतिकूल हो जाते हैं; और ऐसा होने देना उन्हें इष्ट नहीं; इसीलिये ग्यारहवें मंत्रपर व्याख्यान करते समय शांकरभाष्यमें 'विद्या' शब्दका अर्थ 'ज्ञान' न कर 'उपासना' किया गया है। यह नहीं, कि विद्या शब्दका