भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

अर्थ उपासना न होता हो। शांडिल्यविद्या प्रभृति स्थानोंमें उसका अर्थ उपासनाही होता है; पर वह मुख्य अर्थ नहीं है ! यहभी नहीं, कि श्रीशंकराचार्यके ध्यानमें यह बात आई न होगी या आई न थी। और तो क्या, उसका ध्यानमें न आना शक्यही न था। दूसरे उपनिषदोंमेंभी ऐसे वचन हैं - “ विद्यया विन्दतेऽमृतम् ” ( केन. २. १२ ), अथवा “ प्राणस्याध्यात्मं विज्ञायामृतमश्नुते ” ( प्रश्न. ३. १२ ) । मैत्र्यु- पनिषदके सातवें प्रपाठकमें “ विद्यां चाविद्यां च ” इत्यादि ईशावास्यका उल्लिखित ग्यारहवाँ मंत्रही अक्षरशः ले लिया है; और उससे सट करही, उसके पूर्व कठ. २. ४ और आगे कठ. २. ५ ये मंत्र दिये हैं। अर्थात् ये तीनों मंत्र एकही स्थानपर एकके पश्चात् एक दिये गये हैं; और बिचला मंत्र ईशावास्यका है; और तीनोंमेंभी 'विद्या' शब्द वर्तमान है। इसलिये कठोपनिषदमें विद्या शब्दका जो अर्थ है, वही ( ज्ञान ) अर्थ ईशावास्यमेंभी लेना चाहिये - मैत्र्युपनिषदका ऐसाही अभिप्राय प्रकट होता है। परंतु ईशावास्यके शांकरभाष्यमें कहा है, कि “ यदि विद्या = आत्म- ज्ञान और अमृत = मोक्ष, ऐसे अर्थही ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रमें लें, तो कहना होगा, कि ज्ञान ( विद्या ) और कर्म ( अविद्या ) का समुच्चय इस उपनिषदमें वर्णित है; परंतु जब कि यह समुच्चय न्यायसे युक्त नहीं है, तब विद्या = देवतोपासना और अमृत = देवलोक, ये गौण अर्थही इस स्थान पर लेने चाहिये । ” सारांश, प्रकट है, कि “ ज्ञान होने पर संन्यास ले लेना चाहिये, कर्म नहीं करने चाहिये; क्योंकि ज्ञान और कर्मका समुच्चय कभीभी न्याय्य नहीं। ” - शांकर-संप्रदायके इस मुख्य सिद्धान्तके विरुद्ध ईशावास्यका मंत्र न होने पावे; इसलिये विद्या शब्दका गौण अर्थ स्वीकारकर, समस्त श्रुति-वचनोंकी अपने संप्रदायके अनुरूप एकवाक्यता करनेके लिये, शांकरभाष्यमें ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रका ऊपर लिखे अनुसार अर्थ किया गया है। सांप्रदायिक दृष्टिसे देखें तो ये अर्थ महत्त्वकेही नहीं; प्रत्युत आवश्यकभी हैं। परंतु जिन्हें यह मूल सिद्धान्तही मान्य नहीं, कि समस्त उपनिषदोंमें एकही अर्थ प्रतिपादित रहना चाहिये, - दो मार्गोंका श्रुतिप्रतिपादित होना शक्य नहीं, - उन्हें उल्लिखित मंत्रमें विद्या और अमृत शब्दके अर्थ बदलनेके लिये कोईभी आवश्यकता नहीं रहती। यह तत्त्व मान लेनेसेभी, कि परब्रह्म 'एकमेवाद्वितीय' है, यह सिद्ध नहीं होता, कि उसके ज्ञानका उपाय एकसे अधिक न रहें। एकही अटारीपर चढ़नेके लिये दो जीने, वा एकही गाँव जानेके लिये जिस प्रकार दो मार्ग 'हो सकते हैं, उसी प्रकार मोक्षप्राप्तिके उपायोंकी या निष्ठाओंकी बात है; और इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें स्पष्ट कह दिया है - “ लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा । ” दो निष्ठाओंका होना संभवनीय कहने पर, कुछ उपनिषदोंमें केवल ज्ञाननिष्ठाका, तो कुछमें ज्ञान- कर्म-समुच्चय-निष्ठाका वर्णन आना कुछ अशक्य नहीं है। अर्थात् ज्ञाननिष्ठाका विरोध होता है, इसीसे ईशावास्योपनिषदके शब्दका सरल, स्वाभाविक और स्पष्ट अर्थ छोड़नेके लियेभी कोई कारण नहीं रह जाता। यह कहनेके लिये, कि श्रीमत्-