श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
अर्थ उपासना न होता हो। शांडिल्यविद्या प्रभृति स्थानोंमें उसका अर्थ उपासनाही होता है; पर वह मुख्य अर्थ नहीं है ! यहभी नहीं, कि श्रीशंकराचार्यके ध्यानमें यह बात आई न होगी या आई न थी। और तो क्या, उसका ध्यानमें न आना शक्यही न था। दूसरे उपनिषदोंमेंभी ऐसे वचन हैं - “ विद्यया विन्दतेऽमृतम् ” ( केन. २. १२ ), अथवा “ प्राणस्याध्यात्मं विज्ञायामृतमश्नुते ” ( प्रश्न. ३. १२ ) । मैत्र्यु- पनिषदके सातवें प्रपाठकमें “ विद्यां चाविद्यां च ” इत्यादि ईशावास्यका उल्लिखित ग्यारहवाँ मंत्रही अक्षरशः ले लिया है; और उससे सट करही, उसके पूर्व कठ. २. ४ और आगे कठ. २. ५ ये मंत्र दिये हैं। अर्थात् ये तीनों मंत्र एकही स्थानपर एकके पश्चात् एक दिये गये हैं; और बिचला मंत्र ईशावास्यका है; और तीनोंमेंभी 'विद्या' शब्द वर्तमान है। इसलिये कठोपनिषदमें विद्या शब्दका जो अर्थ है, वही ( ज्ञान ) अर्थ ईशावास्यमेंभी लेना चाहिये - मैत्र्युपनिषदका ऐसाही अभिप्राय प्रकट होता है। परंतु ईशावास्यके शांकरभाष्यमें कहा है, कि “ यदि विद्या = आत्म- ज्ञान और अमृत = मोक्ष, ऐसे अर्थही ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रमें लें, तो कहना होगा, कि ज्ञान ( विद्या ) और कर्म ( अविद्या ) का समुच्चय इस उपनिषदमें वर्णित है; परंतु जब कि यह समुच्चय न्यायसे युक्त नहीं है, तब विद्या = देवतोपासना और अमृत = देवलोक, ये गौण अर्थही इस स्थान पर लेने चाहिये । ” सारांश, प्रकट है, कि “ ज्ञान होने पर संन्यास ले लेना चाहिये, कर्म नहीं करने चाहिये; क्योंकि ज्ञान और कर्मका समुच्चय कभीभी न्याय्य नहीं। ” - शांकर-संप्रदायके इस मुख्य सिद्धान्तके विरुद्ध ईशावास्यका मंत्र न होने पावे; इसलिये विद्या शब्दका गौण अर्थ स्वीकारकर, समस्त श्रुति-वचनोंकी अपने संप्रदायके अनुरूप एकवाक्यता करनेके लिये, शांकरभाष्यमें ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रका ऊपर लिखे अनुसार अर्थ किया गया है। सांप्रदायिक दृष्टिसे देखें तो ये अर्थ महत्त्वकेही नहीं; प्रत्युत आवश्यकभी हैं। परंतु जिन्हें यह मूल सिद्धान्तही मान्य नहीं, कि समस्त उपनिषदोंमें एकही अर्थ प्रतिपादित रहना चाहिये, - दो मार्गोंका श्रुतिप्रतिपादित होना शक्य नहीं, - उन्हें उल्लिखित मंत्रमें विद्या और अमृत शब्दके अर्थ बदलनेके लिये कोईभी आवश्यकता नहीं रहती। यह तत्त्व मान लेनेसेभी, कि परब्रह्म 'एकमेवाद्वितीय' है, यह सिद्ध नहीं होता, कि उसके ज्ञानका उपाय एकसे अधिक न रहें। एकही अटारीपर चढ़नेके लिये दो जीने, वा एकही गाँव जानेके लिये जिस प्रकार दो मार्ग 'हो सकते हैं, उसी प्रकार मोक्षप्राप्तिके उपायोंकी या निष्ठाओंकी बात है; और इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें स्पष्ट कह दिया है - “ लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा । ” दो निष्ठाओंका होना संभवनीय कहने पर, कुछ उपनिषदोंमें केवल ज्ञाननिष्ठाका, तो कुछमें ज्ञान- कर्म-समुच्चय-निष्ठाका वर्णन आना कुछ अशक्य नहीं है। अर्थात् ज्ञाननिष्ठाका विरोध होता है, इसीसे ईशावास्योपनिषदके शब्दका सरल, स्वाभाविक और स्पष्ट अर्थ छोड़नेके लियेभी कोई कारण नहीं रह जाता। यह कहनेके लिये, कि श्रीमत्-
३६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शंकराचार्यका आक्षेप सरल अर्थकी अपेक्षा संन्यासनिष्ठा-प्रधान एकवाक्यताकी ओर विशेष था, एक और दूसरा कारणभी है। तैत्तिरीय उपनिषदके शांकरभाष्यमें (तै. २. ११) ईशावास्य. मंत्रका इतनाही भाग दिया है कि “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते”; और उसके साथही यह मनुवचन भी दे दिया है, कि “तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते” (मनु. १२. १०४); और इन दोनोंही वचनोंमें 'विद्या' शब्दका एकही मुख्यार्थ अर्थात् ब्रह्मज्ञान आचार्यने स्वीकार किया है। परंतु यहाँ आचार्यका कथन है, कि “तीर्त्वा = तैरकर या पारकर”, इस पदसे मृत्युलोकको तैर जानेकी क्रिया पहले पूरी हो जानेपर फिर (एक-साथही नहीं) विद्यासे अमृतत्व प्राप्त होनेकी क्रिया संघटित होती है। किंतु कहना नहीं होगा, कि यह अर्थ पूर्वार्धके 'उभयं सह' शब्दोंके विरुद्ध हो जाता है और प्रायः इसी कारणसे ईशावास्यके शांकरभाष्यमें यह अर्थ छोड़ दिया गया हो। कुछभी हो; ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रका शांकरभाष्यमें निराला व्याख्यान करनेका जो कारण है, वह इससे व्यक्त हो जाता है। यह कारण सांप्रदायिक है; और भाष्य-कर्ताकी सांप्रदायिक दृष्टि स्वीकार न करनेवालोंको प्रस्तुत भाष्यका यह व्याख्यान मान्य न होगा। यह बात हमेंभी मंजूर है, कि श्रीमच्छंकराचार्य जैसे अलौकिक ज्ञानी पुरुषके प्रतिपादन किये हुए अर्थको छोड़ देनेका प्रसंग यदि टले, तो अच्छा है! परंतु सांप्रदायिक दृष्टि त्यागनेसे ये प्रसंग तो आयेंगेही; और इसी कारण हमसे पहलेभी ईशावास्यके मंत्र - अर्थ शांकर- भाष्यसे विभिन्न प्रकारसे अर्थात् जैसे हम कहते हैं, वैसेही अन्य भाष्यकारोंने लगाये हैं। उदाहरणार्थ, वाजसनेयी संहितापर अर्थात् ईशावास्योपनिषदपरभी उवटाचार्यका जो भाष्य है, उसमें “विद्यां चाविद्यां च” इस मंत्रका व्याख्यान करते हुए ऐसा अर्थ दिया है, कि “विद्या = आत्मज्ञान और अविद्या = कर्म; इन दोनोंके एकीकरणसेही अमृत अर्थात् मोक्ष मिलता है।” अनंताचार्यने इस उपनिषदके अपने भाष्यमें इसी ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक अर्थको स्वीकार कर अंतमें साफ लिख दिया है, कि “इस मंत्रका सिद्धान्त और “यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते” (गीता ५. ५), गीताके इस वचनका अर्थ एकही है, एवं गीताके इस श्लोकमें जो 'सांख्य' और 'योग' शब्द हैं, वे क्रमसे 'ज्ञान' और 'कर्म'के द्योतक हैं।”* इसी प्रकार अपरार्कदेवनेभी
- पुणेके आनंदाश्रममें ईशावास्योपनिषदकी जो पुस्तक छपी है, उसमें ये सभी भाष्य हैं; और याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी अपरार्ककी टीकाभी आनंदाश्रममेंही पृथक् छपी है। प्रो. मेक्समुलरने उपनिषदोंका जो अनुवाद किये हैं, उनमें ईशावास्यका भाषांतर शांकरभाष्यके अनुसार नहीं है। उन्होंने भाषांतरके अंतमें इसके कारण बतलाये हैं (Sacred Books of the East Series, Vol. I. pp. 314-320)। अनंताचार्यका भाष्य मेक्समुलर साहबको उपलब्ध नहीं हुआ था; और उनके ध्यानमें यह बातभी आई हुई दीख नहीं पड़ती, कि शांकरभाष्यमें निराले अर्थ क्यों किये गये हैं?
संन्यास और कर्मयोग ३६५ याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी ( याज्ञ. ३. ५७; २०५ ) अपनी टीकामें ईशावास्यका ग्यारहवाँ मंत्र देकर, अनंताचार्यके समानही, उसका ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक अर्थ किया है। इससे पाठकोंके ध्यानमें आ जायेगा, कि आज हम नये सिरेसेही ईशावास्योपनिषदके मंत्रका शांकरभाष्यसे भिन्न अर्थ नहीं करते हैं। यह तो हुआ स्वयं ईशावास्योपनिषदके मंत्रके संबंधका विचार। अब शांकर- भाष्यमें "तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते" यह जो मनुका वचन दिया है, उसकाभी थोड़ा-सा विचार करते हैं। मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमें यह १०४ क्रमांका श्लोक है; और मनु. १२. ८६ से विदित होगा, कि वह प्रकरण वैदिक कर्मयोगका है। कर्मयोगके इस विवेचनमें :- तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयस्करं परम् । तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ पहले चरणमें यह बतलाकर, कि "तप और (च) विद्या, ये (अर्थात् दोनों) ब्राह्मणको उत्तम मोक्षदायक हैं," फिर उनमेंसे प्रत्येकका उपयोग दिखलानेके लिये दूसरे चरणमें कहा है, कि "तपसे दोष नष्ट हो जाते हैं और विद्यासे अमृत अर्थात् मोक्ष मिलता है।" इससे प्रकट होता है, कि इस स्थानपर ज्ञान-कर्म-समुच्चयही मनुको अभिप्रेत है; और ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रकाही अर्थ मनुने इस श्लोकमें वर्णन कर दिया है। हारीत-स्मृतिके वचनसेभी यही अर्थ अधिक दृढ़ होता है। यह हारीत-स्मृति स्वतंत्र तो उपलब्ध हैही; इसके सिवा नृसिंहपुराणमेंभी (नृ. पु. ५७-६१) आई है। इस नृसिंहपुराणमें (६१. ९-११) और हारीत- स्मृतिमें (हा. स्मृ. ७. ९-११) ज्ञान-कर्म-समुच्चयके संबंधमें ये श्लोक हैं:- यथाश्वा रथहीनाश्च रथाश्चाश्वैर्विना यथा । एवं तपश्च विद्या च उभावपि तपस्विनः ॥ यथाऽन्नं मधुसंयुक्तं मधु चान्नेन संयुतम् । एवं तपश्च विद्या च संयुक्तं भेषजं महत् ॥ द्वाभ्यामेव हि पक्षाभ्यां यथा वै पक्षिणां गतिः । तथैव ज्ञानकर्माभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ॥ "जिस प्रकार रथके बिना घोड़े और घोड़ोंके बिना रथ (नहीं चलते), उसी प्रकार तपस्वीके तप और विद्याकीभी स्थिति है। जिस प्रकार अन्न शहदसे संयुक्त हो; और शहद अन्नसे संयुक्त हो, उसी प्रकार तप और विद्याके (दोनोंके) संयुक्त होनेसे एक महौषधि बनती है। जैसे पक्षियोंकी गति दोनों पंखोंके योगसेही होती है, वैसेही ज्ञान और कर्मसे (दोनों) शाश्वत ब्रह्म प्राप्त होता है।" हारीत-स्मृतिके उपरोक्त वचन वृद्धात्रेय-स्मृतिके दूसरे अध्यायमेंभी पाये जाते हैं। इन वचनोंसे, और विशेषकर उनमें दिये गये दृष्टान्तोंसे, प्रकट हो जाता है, कि मनुस्मृतिके
३६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वचनोंका क्या अर्थ लगाना चाहिये ? यह तो पहलेही कह चुके हैं, कि मनु तप शब्दमेंही चातुर्वर्ण्यके कर्मोंका समावेश करते हैं ( मनु. ११. २३६ ) ; और अब दीख पड़ेगा, कि तैत्तिरीयोपनिषदमें ' तप और स्वाध्याय-प्रवचन ' इत्यादिका जो आचरण करनेके लिये कहा गया है (तै. १. ९), वहभी ज्ञान-कर्म-समुच्चय-पक्षको स्वीकार करही कहा गया है । संपूर्ण योगवासिष्ठ ग्रंथका तात्पर्यभी यही है । क्योंकि इस ग्रंथके आरंभमें सुतीक्ष्णने प्रश्न किया है, कि मुझे बतलाइये, कि मोक्ष कैसे मिलता है ? केवल ज्ञानसे, केवल कर्मसे, या दोनोंके समुच्चयसे ? और उसे उत्तर देते हुए हारीत-स्मृतिके पक्षीके पंखोंवाला, दृष्टान्त लेकर, पहले यह बतलाया है, कि “ जिस प्रकार आकाशमें पक्षीकी गति दोनों पंखोंसेही होती है, उसी प्रकार ज्ञान और कर्म, इन्हीं दोनोंसे मोक्ष मिलता है। केवल एकसेही यह सिद्धि मिल नहीं जाती ।” और आगे इसी अर्थको विस्तारसहित सिद्धकर दिखलानेके लिये संपूर्ण योगवासिष्ठ ग्रंथ कहा गया है (यो. १. १. ६-९) । इसी प्रकार वसिष्ठने रामको मुख्य कथामें स्थान-स्थानपर बार-बार यही उपदेश किया है, कि “ जीवन्मुक्तके समान बुद्धिको शुद्ध रखकर तुम समस्त व्यवहार करो” (यो. ५. १८. १७-२६) ; या मरण- पर्यंत कर्मोंका छोड़ना उचित न होनेके कारण ( यो. ६. उ. २. ४२ ), स्वधर्मके अनुसार प्राप्त राज्यको पालनेका काम करते रहो” ( यो. ५. ५. ५४; ६. उ. २१३. ५० ) । इस ग्रंथका उपसंहार और आगे श्रीरामचंद्रके किये हुए कामभी इसी उपदेशके अनुसार हैं। परंतु योगवासिष्ठके टीकाकार थे संन्यास-मार्गीय, इसलिये पक्षीके दो पंखोंवाली उपमाके स्पष्ट होने परभी, उन्होंने अंतमें अपनी ओर- से यह तुर्रा लगाही दिया, कि ज्ञान और कर्म, दोनों युगपत् अर्थात् एकही समयमें विहित नहीं हैं। परंतु बिना टीकाके मूल ग्रंथ पढ़नेसे किसीकेभी ध्यानमें सहजही आ जावेगा, कि टीकाकारोंका यह अर्थ खींचातानीका है; एवं क्लिष्ट और सांप्रदायिक है। मद्रास प्रांतमें योगवासिष्ठ-सरीखाही 'गुरुज्ञान-वासिष्ठ-तत्त्वसारायण' नामक एक ग्रंथ प्रसिद्ध है और उसके ज्ञानकांड, उपासनाकांड और कर्मकांड - ये तीन भाग हैं। हम पहले कह चुके हैं, कि यह ग्रंथ जितना पुराना बतलाया जाता है, उतना पुराना नहीं दिखता है। वह प्राचीन भलेही न हो; पर जब कि ज्ञान-कर्म-समुच्चय-पक्षही उसमें प्रतिपाद्य है, तब इस स्थानपर उसका उल्लेख करना आवश्यक है। इसमें अद्वैत वेदान्त है और निष्काम कर्मपरही बहुत जोर दिया गया है, इसलिये यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि उसका संप्रदायभी शंकराचार्यके संप्रदायसे भिन्न और स्वतंत्र है। मद्रासकी ओर इस संप्रदायका नाम 'अनुभवाद्वैत' है और वास्तविक देखनेसे ज्ञात होगा, कि गीताके कर्मयोगकी यह एक नकलही है। परंतु केवल भगवद्गीताकेही आधारसे इस संप्रदायको सिद्ध न कर, इस ग्रंथमें कहा है, कि कुल १०८ उपनिषदोंसेभी वही अर्थ सिद्ध होता है। इसमें रामगीता और सूर्यगीता, ये दो नई गीताएँभी दी हैं। कुछ लोगोंकी जो यह समझ है, कि अद्वैत मतको अंगीकार करना मानो
संन्यास और कर्मयोग ३६७ कर्म-संन्यास-पक्षको स्वीकार करनाही है, वह इस ग्रंथसे दूर हो जायगी। ऊपर दिये गये प्रमाणोंसे अब स्पष्ट हो जायगा, कि संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद्, धर्मसूत्र, मनु- याज्ञवल्क्य-स्मृति, महाभारत, भगवद्गीता, योगवासिष्ठ और अंतमें तत्त्वसारायण प्रभृति ग्रंथोंमें जो निष्काम कर्मयोग प्रतिपादित है, उसको श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित न मान केवल संन्यास-मार्गकोही श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित कहना सर्वथा निर्मूल है। इस मृत्युलोकके व्यवहार चलनेके लिये या लोकसंग्रहार्थ यथाधिकार निष्काम कर्म और मोक्षकी प्राप्तिके लिये ज्ञान, इन दोनोंका एककालीन समुच्चयही, अथवा महाराष्ट्र कवि शिवदिन-केसरीके वर्णनानुसार - प्रपंच साधुनि परमार्थाचा लाहो ज्याने केला। तो नर भला भला रे भला भला ॥ * यही अर्थ गीतामें प्रतिपाद्य है। कर्मयोगका यह मार्ग प्राचीन कालसे चला आ रहा है; जनक प्रभृतिने इसी का आचरण किया है; और स्वयं भगवानके द्वारा इसका प्रसार और पुनरुज्जीवन होनेके कारण इसेही भागवत-धर्म कहते है। ये सब बाते अच्छी तरह सिद्ध हो चुकीं। अब लोकसंग्रहकी दृष्टिसे यह देखनाभी आवश्यक है, कि इस मार्गके ज्ञानी पुरुष परमार्थयुक्त अपना प्रपंच - जगतके व्यवहार - किस रीतिसे चलाते हैं? परंतु यह प्रकरण बहुत बढ़ गया है, इसलिये इस विषयका स्पष्टीकरण अगले प्रकरणमें करेंगे।
- "वही नर भला है, जिसने प्रपंच साध कर ( संसारके सब कर्तव्योंका यथोचित पालन कर ) परमार्थ याने मोक्षकी प्राप्तिभी कर ली हो।"
बारहवाँ प्रकरण सिद्धावस्था और व्यवहार सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः । कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ॥ * – महाभारत, शांति. २६१. ९ जिस मार्गका यह मत है, कि ब्रह्मज्ञान हो जानेसे जब बुद्धि अत्यंत सम और निष्काम हो जावे, तब शेष मनुष्यको आगे कुछभी कर्तव्य नहीं रह जाता; और इसी- लिये ज्ञानी पुरुषको क्षणभंगुर संसारके दुःखमय और शुष्क व्यवहार विरक्त-बुद्धिसे सर्वथा छोड़ देने चाहिये, उस मार्गके पंडित इस बातको कदापि नहीं जान सकते, कि कर्मयोग अथवा गृहस्थाश्रमके बर्तावकाभी कोई विचार करने योग्य शास्त्र है। संन्यास लेनेभी पहले चित्तकी शुद्धि होकर ज्ञानप्राप्ति हो जानी चाहिये, इसीलिये उन्हें मंजूर है, कि संसार गृहस्थीके काम उस धर्मसेही करने चाहिये, कि जिससे चित्तवृत्ति शुद्ध होवे; अर्थात् वह सात्विक बने। इसीलिये वे समझते हैं, कि संसारमेंही सदैव बने रहना पागलपन है और जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी प्रत्येक मनुष्य संन्यास ले ले – यही इस जगतमें उसका परम कर्तव्य है। ऐसा मान लेनेसे कर्मयोगका स्वतंत्र महत्त्व कुछभी नहीं रह जाता; और इसीलिये संन्यासमार्गके पंडित गृहस्थीके कर्तव्योंके विषयमें कुछ थोड़ा-सा प्रासंगिक विचार करके, गार्हस्थ्य- धर्मके, कर्म-अकर्मके विवेचनका इससे अधिक विचार कभी नहीं करते, कि मनु आदि शास्त्रकारोंके बतलाये हुए चार आश्रमरूपी जीनेसे चढ़कर संन्यास आश्रमकी अंतिम सीढ़ी पर जल्दी पहुँच जाओ। इसीलिये कलियुगके संन्यासमार्गके पुरस्कर्ता श्रीशंकराचार्यने अपने गीता-भाष्यमें गीताके कर्मप्रधान वचनोंकी उपेक्षा की है, अथवा उन्हें केवल प्रशंसात्मक (अर्थवाद-प्रधान) कल्पित किया है; और अंतमें गीताका यह फलितार्थ निकाला है, कि कर्म-संन्यास-धर्म ही गीताधर्ममें प्रतिपाद्य है। और यही कारण है, कि दूसरे कितनेही टीकाकारोंने अपने अपने संप्रदायके अनुसार गीताके इस रहस्यका वर्णन किया है, कि भगवानने रणभूमिपर अर्जुनको निवृत्ति-प्रधान अर्थात् निरी भक्ति, या पातंजलयोग अथवा मोक्ष-मार्गकाही उपदेश किया है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि संन्यास-मार्गका अध्यात्मज्ञान निर्दोष है। और इसके द्वारा प्राप्त होनेवाली साम्य-बुद्धि अथवा निष्काम अवस्थाभी गीताको
- "हे जाजले ! (कहना चाहियेकी) उसीने धर्मको जाना, कि जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे सबका हित करनेमें लगा हुआ है; और जो सभीका नित्य स्नेही है।"
मान्य है। तथापि गीताको संन्यासमार्गका यह कर्म-विरोधी मत ग्राह्य नहीं है, कि मोक्ष- प्राप्तिके लिये अंतमें कर्मोंका सर्वथा छोड़ही बैठना चाहिये । पिछले प्रकरणमें हमने विस्तारसहित गीताका यह विशेष सिद्धान्त दिखलाया है, कि ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाले वैराग्य अथवा समतासेही ज्ञानी पुरुषको ज्ञान-प्राप्ति हो चुकने परभी सारे व्यवहार करते रहना चाहिये । जगतसे ज्ञानयुक्त कर्मको निकाल डालनेसे तो दुनिया अंधी हुई जाती है; और इससे उसका नाश हो जाता है; जब कि भगवानकीही इच्छा है, कि इस रीतिसे उसका नाश न हो, वह भली भाँति चलती रहे; तब ज्ञानी पुरुष- कोभी जगतके सभी कर्म निष्काम बुद्धिसे करते हुए सामान्य लोगोंको अच्छे बर्तावका प्रत्यक्ष नमूना दिखला देना चाहिये । इसी मार्गको अधिक श्रेयस्कर और ग्राह्य कहें, तो यह देखनेकी जरूरत पड़ती है, कि इस प्रकारका ज्ञानी पुरुष जगतके व्यवहार किस प्रकार करता है ? क्योंकि ऐसे ज्ञानी पुरुषका बर्तावही लोगोंके लिये आदर्श है। उसके कर्म करनेकी रीतिको परख लेनेसे धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य अथवा कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय कर देनेवाला साधन या युक्ति - जिसे हम खोज रहे थे - आप-ही-आप हमारे हाथ लग जाती है। संन्यास-मार्गकी अपेक्षा कर्म-योगमार्गकी यही तो विशेषता है। इंद्रियोंका निग्रह करनेसे जिस पुरुषकी व्यवसायात्मक बुद्धि स्थिर हो कर " सब भूतोंमें एक आत्मा " इस साम्यको परख लेनेमें समर्थ हो जाय, उसकी वासनाभी शुद्धही होनी चाहिये । इस प्रकार वासनात्मक बुद्धिके शुद्ध, सम, निर्मम और पवित्र हो जानेसे फिर वह कोईभी पाप या मोक्षके लिये प्रतिबंधक कर्म करही नहीं सकता, क्योंकि पहले वासना है; फिर तदनुकूल कर्म, जब कि क्रम ऐसा है, तब शुद्ध वासनासे होनेवाला कर्म शुद्धही होना चाहिये; और जो शुद्ध है, वही मोक्षके लिये अनुकूल है। अर्थात् हमारे आगे जो 'कर्म-अकर्म-विचिकित्सा' या 'कार्य-अकार्य- व्यवस्थिति'का बिकट प्रश्न था, कि पारलौकिक कल्याणके मार्गमें आड़े न आकर इस संसारमें मनुष्यमात्रको कैसा बर्ताव करना चाहिये, उसका अपनी करनीसे प्रत्यक्ष उत्तर देनेवाला गुरु अब हमें मिल गया ( तै. १. ११.४; गीता ३. २१) । अर्जुनके आगे ऐसा गुरु श्रीकृष्णके रूपमें प्रत्यक्ष खड़ा था और जब अर्जुनको यह शंका हुई कि " क्या, ज्ञानी पुरुष युद्ध आदि कर्मोंको बंधनकारक समझकर छोड़ दे ? " तब उसको इस गुरुने दूर बहा दिया और अध्यात्मशास्त्रके सहारे अर्जुनको भली भाँति समझा दिया, कि किस युक्तिसे जगतके व्यवहार करते रहनेपर पाप नहीं लगता; और उसे युद्धके लिये प्रवृत्त किया । किंतु ऐसा चोखा ज्ञान देनेवाले गुरु प्रत्येक मनुष्यको जब चाहे तब नहीं मिल सकते और तीसरे प्रकरणके अंतमें, " महाजनो येन गतः स पन्थाः " इस वचनका विचार करते हुए हम बतला चुके हैं, कि ऐसे महापुरुषोंके निरे ऊपरी बर्तावपर सर्वथा अवलंबित रहभी नहीं सकते । अतएव जगतको अपने आचरणसे शिक्षा देनेवाले इन ज्ञानी पुरुषोंके बर्तावकी बड़ी बारीकीसे जाँचकर विचार करना चाहिये, कि इनके बर्तावका यथार्थ रहस्य या गी. र. २४
३७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मूल तत्त्व क्या है ? इसेही कर्मयोगशास्त्र कहते हैं; और ऊपर जो ज्ञानी पुरुष बतलाये गये हैं, उनकी स्थिति और कृतिही इस शास्त्रका आधार है । इस जगतके सभी पुरुष यदि इस प्रकारके आत्मज्ञानी और कर्मयोगी हों, तो कर्मयोगशास्त्रकी जरूरतही न पड़ेगी । नारायणीय धर्ममें एक स्थानपर कहा है :- एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात्कुरुनन्दन ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतै । भवेत् कृतयुगप्राप्तिः आशीः कर्मविवर्जिता ॥ “ एकांतिक अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधान भागवत धर्मका पूर्णतया आचरण करनेवाले अनेक पुरुषोंका मिलना कठिन है । आत्मज्ञानी, अहिंसक और प्राणिमात्रकी भलाईके लिये कर्म करनेवाले एकान्तधर्मके ज्ञानी पुरुषोंसे यदि यह जगतभर जावे, तो आशी : कर्म – अर्थात् काम्य अथवा स्वार्थ-बुद्धिसे किये हुए सारे कर्म – इस जगतसे दूर होकर फिर कृतयुग प्राप्त हो जावेगा ” ( शां. ३४८. ६२, ६३ ) ! क्योंकि ऐसी स्थितिमें सभी पुरुषोंके ज्ञानवान् रहनेसे कोई किसीका नुकसान तो करेगाही नहीं; प्रत्युत प्रत्येक मनुष्य सबके कल्याणपर ध्यान देकर तदनुसारही शुद्ध अंतःकरण और निष्काम बुद्धिसे अपना बर्ताव करेगा । हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि बहुत पुराने समयमें एक वार समाजकी ऐसीही स्थिति थी; और वह फिर कभी-न-कभी प्राप्त होगीही ( मभा. शां. ५९. १४ ) । परंतु पश्चिमी पंडित अर्वाचीन इतिहासके आधारसे कहते हैं, कि पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं थी, किंतु भविष्यमें मानव जातिके सुधारोंके सहारे कभी- न-कभी ऐसी स्थिति प्राप्त होनेकी संभावना है । जो हो; यहाँ इतिहासका विचार इस समय कर्तव्य नहीं है । हाँ, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि समाजकी इस अत्युत्कृष्ट स्थिति अथवा पूर्णावस्थामें प्रत्येक मनुष्य परम ज्ञानी होगा; और वह जो व्यवहार करेगा, उसीको शुद्ध, पुण्यकारक, धम्र्य अथवा कर्तव्यकी पराकाष्ठा मानना चाहिये, इस मतको दोनोंही मानते हैं । प्रसिद्ध अंग्रेज सृष्टिशास्त्र-ज्ञाता स्पेन्सरने इसी मतका अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथके अंतमें प्रतिपादन किया है, और कहा है, कि प्राचीन कालमें ग्रीस देशके तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने यही सिद्धान्त किया था ! * उदाहरणार्थ, यूनानी तत्त्ववेत्ता प्लेटो अपने ग्रंथमें लिखता है, कि तत्त्वज्ञानी पुरुषको जो कर्म प्रशस्त जँचे, वही शुभकारक और न्याय्य है; साधारण मनुष्योंको ये धर्म विदित नहीं होते, इसलिये उन्हें तत्त्वज्ञ पुरुषकेही निर्णयको प्रमाण मान लेना चाहिये । आरिस्टॉटल नामक दूसरा ग्रीक तत्त्वज्ञ अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें ( ३. ४ ) कहता है, कि ज्ञानी पुरुषका निर्णय सदैव अचूक रहता है, कि वह सच्चे तत्त्वको जाने रहता है; और ज्ञानी
- Spencer's Data of Ethics, Chap. XV, pp. 275-278. स्पेन्सरने इसको Absolute Ethics नाम दिया है ।
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७१ पुरुषका यह निर्णय या व्यवहारही औरोंको प्रमाणभूत है। एपिक्यूररस नामके एक और ग्रीक तत्त्वशास्त्रवेत्ताने इस प्रकारके प्रामाणिक परम ज्ञानी पुरुषके वर्णनमें कहा है, कि वह "शांत, सम-बुद्धिवाला और परमेश्वरके समान सदा आनंदमय रहता है; तथा उसको लोगोंसे अथवा उससे लोगोंको जरासाभी कष्ट नहीं होता"।* पाठकोंके ध्यानमें आही जावेगा, कि भगवद्गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ, त्रिगुणातीत अथवा परम भक्त या ब्रह्मभूत पुरुषके वर्णनमें इस वर्णनकी कितनी समता है। "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) - जिससे लोक उद्विग्न नहीं होते अथवा जो लोगोंसे उद्विग्न नहीं होता, ऐसेही जो नित्य संतुष्ट है, जो हर्ष-खेद, भय-विषाद, सुख-दुःख आदि द्वंद्वोंसे मुक्त है, सदा अपने आपमेंही संतुष्ट है ("आत्मन्येवात्मना तुष्टः" गीता २.५५) त्रिगुणोंसे जिसका अंतःकरण चंचल नहीं होता ("गुणैर्यो न विचाल्यते" गीता १४. २३), स्तुति या निंदा और मान या अपमान जिसे एक-से हैं; तथा प्राणिमात्रके अंतर्गत आत्माकी एकताको परखकर (गीता १८. ५४), साम्य-बुद्धिसे आसक्ति छोड़कर, धैर्य और उत्साहसे अपना कर्तव्य-कर्म करनेवाला अथवा सम-लोष्ट-अश्म-कांचन (गीता १४. २४) - इत्यादि प्रकारसे भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञके लक्षण तीन-चार बार विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं और इसी अवस्थाको सिद्धावस्था या ब्राह्मी स्थिति कहा गया है। योगवासिष्ठ आदिके प्रणेता इसी स्थितिको जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं। इस स्थितिका प्राप्त हो जाना अत्यंत दुर्घट है, अतएव जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटका कथन है, कि ग्रीक पंडितोंने इस स्थितिका जो वर्णन किया है, वह किसीएक वास्तविक पुरुषका वर्णन नहीं है; बल्कि शुद्ध नीतिके तत्त्वोंको लोगोंके मनमें भर देनेके लिये समस्त नीतिको मूलभूत शुद्ध वासनाकोही मनुष्य-देह देकर उन्होंने परले सिरेके ज्ञानी और नीतिमान् पुरुषका चित्र अपनी कल्पनासे तैयार किया है। लेकिन हमारे शास्त्रकारोंका सिद्धान्त है, कि यह स्थिति काल्पनिक नहीं, बिलकुल सच्ची है; और मनका निग्रह तथा प्रयत्न करनेसे इसी लोकमें प्राप्त हो जाती है और इस बातका प्रत्यक्ष अनुभवभी हमारे देशवालोंको प्राप्त है। तथापि यह बात साधारण नहीं है। गीतामें (गीता ७. ३) स्पष्टही कहा है, कि हजारों मनुष्योंमें कोई एक-आध मनुष्य इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है; और प्रयत्न करनेवालों इन हजारोंमेंसे किसी विरलेकोही अनेक जन्मोंके अनंतर यह परमावधिकी स्थिति अंतमें प्राप्त होती है।
- Epicurus held the virtuous state to be "a tranquil, un- disturbed, innocuous, non-competitive fruition, which approached most nearly to the perfect happiness of the Gods, who "neither suffered vexation in themselves, nor caused vaxation to others." Spencer's Data of Ethics, p. 278, Bain's Mental and Moral Science, Ed. 1875, p. 530 इसीको Ideal Wise Man कहा है।
३७२ . गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्थितप्रज्ञ अवस्था या जीवनमुक्त अवस्था कितनीही दुष्प्राप्य क्यों न हो, पर जिस पुरुषको यह परमावधिकी सिद्धि एक बार प्राप्त हो गयी, उसे कार्य-अकार्यके अथवा नीतिशास्त्रके नियम बतलानेकी कभी आवश्यकता नहीं रहती – ऊपर इसके जो लक्षण बतला दिये हैं, उन्हींसे आगे यह बात वस्तुतः निष्पन्न हो जाती है। क्योंकि परमावधिकी शुद्ध, सम और पवित्र बुद्धिही नीतिका सर्वस्व है, इस कारण ऐसे स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये नीति-नियमोंका उपयोग करना मानो स्वयंप्रकाश सूर्यके समीप अंधकार होनेकी कल्पना करके उसे मशाल दिखलानेके समान असमंजसमें पड़ना है। किसी एक-आध पुरुषके इस पूर्णावस्थामें पहुँचने या न पहुँचनेके संबंधमें शंका हो सकेगी । परंतु जब एकबार निश्चय हो जाय, कि किसीभी रीतिसे क्यों न हो, कोई पुरुष इस पूर्णावस्थामें पहुँच गया है, तब उसके पापपुण्यके संबंधमें, अध्यात्म- शास्त्रके उल्लिखित सिद्धान्तको छोड़ और कोई कल्पनाही नहीं की जा सकती । कितॆक पश्चिमी राजधर्म-शास्त्रियोंके मतानुसार, जिस प्रकार एक स्वतंत्र पुरुषमें या पुरुषसमूहमें राजसत्ता अधिष्ठित रहती है और राजनियमोंसे प्रजाके बँधे रहनेपरभी, राजा उन नियमोंसे मुक्त रहता है, ठीक उसी प्रकार नीतिके राज्यमें स्थितप्रज्ञ पुरुषोंका अधिकार रहता है। उनके मनमें कोईभी काम्य बुद्धि नहीं रहती, अतः केवल शास्त्रसे प्राप्त कर्तव्योंको छोड़ और किसीभी हेतुसे कर्म करनेके लिये वे प्रवृत्त नहीं हुआ करते; अतएव अत्यंत निर्मल और शुद्ध वासनावाले इन पुरुषोंके व्यव- हारको पाप या पुण्य, नीति या अनीति शब्द कदापि लागू नहीं होते । वे तो पाप और पुण्यसे परे, बहुत दूर, पहुँच जाते हैं। श्रीशंकराचार्यने कहा है :- निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः । “जो पुरुष त्रिगुणातीत हो गये, उनको विधिनिषेधरूपी नियम बाँध नहीं सकते ।” और बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी लिखा है, कि “जिस प्रकार उत्तम हीरेको घिसना नहीं पड़ता, उसी प्रकार जो निर्वाणपदका अधिकारी हो गया, उसके कर्मको विधिनियमोंका अडंगा लगाना नहीं पड़ता” (मिलिंदप्रश्न ४. ५. ७)। कौषीतकी उपनिषद (कौषी. ३. १) में इंद्रने प्रतर्दनसे जो यह कहा है कि आत्मज्ञानी पुरुषोंको “मातृहत्या, पितृ- हत्या अथवा भ्रूणहत्या आदि पापभी नहीं लगते ।” अथवा गीता (गी. १८. १७) में जो यह वर्णन है, कि अहंकार-बुद्धिसे सर्वथा विमुक्त पुरुष यदि लोगोंको मारभी डाले, तोभी वह पाप-पुण्यसे सर्वदा अलिप्तही रहता है, उसका तात्पर्यभी यही है (पंचदशी १४. १६, १७) । ‘धम्मपद’ नामक बौद्ध ग्रंथमें इसी तत्त्वका अनुवाद किया गया है (धम्मपद, श्लोक २९४, २९५) ।* नई बाइबलमें ईसाके शिष्य
- कौषीतकी उपनिषद्का वाक्य यह है-“यो मां विजानीयान्नास्य केनचित् कर्मणा लोको मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया ।” और धम्मपदका श्लोक इस प्रकार है -
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७३ पौलने जो यह कहा है, कि "मुझे सभी बातें (एकही-सी) धर्म्य हैं (१ कारिं. ६. १२; रोम. ८. २), उसका आशय जानके या इस वाक्यका - कि "जो भगवानके पुत्र (पूर्ण भक्त) हो गये, उनके हाथसे कभी पाप हो नहीं सकता" (जा. १. ३. ९)- आशयभी हमारे मतमें ऐसाही है। जो शुद्ध बुद्धिको प्रधानता न देकर केवल ऊपरी कर्मोमेही नीतिका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उन्हें यह सिद्धान्त अद्भुत-सा मालूम होता है; और "विधिनियमोसे परेका", "मनमाना भलाबुरा करनेवाला", ऐसा अपनेही मनका कुतर्कपूर्ण अर्थ करके कुछ लोग उल्लिखित सिद्धान्तका इस प्रकार विपर्यास करते हैं, कि "स्थितप्रज्ञको सभी बुरे कर्म करनेकी स्वतंत्रता है।" पर अंधे- को खंभा न दीख पड़े, तो जिस प्रकार खंभा दोषी नहीं है, उसी प्रकार पक्षाभिमानके अंधे इन आक्षेप-कर्ताओंको उल्लिखित सिद्धान्तका ठीक ठीक अर्थ अवगत न हो, तो उसका दोषभी इस सिद्धान्तके मत्थे नहीं थोपा जा सकता। इसे गीताभी मानती है, कि किसीकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा पहले पहल उसके बाहरी आचरणसेही करनी पड़ती है और जो इस कसौटीपर चौकस सिद्ध होनेमें अभी कुछ कम हैं, उन अपूर्णावस्थाके लोगोंको उक्त सिद्धान्त लागू करनेकी इच्छा अध्यात्मवादीभी नहीं करते। पर जब किसीकी बुद्धिके पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ और निःसीम निष्काम होनेमें तिलभरभी संदेह न रहे, तब उस पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए सत्पुरुषकी बात निराली हो जाती है। उसका एक-आध काम यदि लौकिक दृष्टिसे विपरीत दीख पड़े तोभी तत्त्वतः यही कहना पड़ता है, कि वह काम दीखनेमें कैसाभी क्यों न हो, उसका बीज निर्दोषही होना चाहिये। अथवा वह शास्त्रकी दृष्टिसे किसी योग्य कारणसे ही हुआ होगा, साधारण मनुष्योंके कामोंके समान उसका लोभमूलक या अनीतिका होना संभव नहीं है; क्योंकि उस सत्पुरुषकी बुद्धिकी पूरी शुद्धता और समता पहलेसेही निश्चित रहती है। बाइबलमे लिखा है, कि मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च खत्तिये । रट्ठं सानुचरं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च सोत्थिये । वेय्यग्घपञ्चमं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ प्रकट है, कि धम्मपदमें यह कल्पना कौषीतकी उपनिषदसे ली गई है। किंतु बौद्ध ग्रंथकार प्रत्यक्ष मातृवध या पितृवध अर्थ न करके 'माता'का तृष्णा और 'पिता'का अभिमान अर्थ करते हैं। लेकिन हमारे मतमें इस श्लोकका नीतितत्त्व बौद्ध ग्रंथ कारोंको भली भाँति ज्ञात नहीं हो पाया, इसीसे उन्होंने यह औपचारिक अर्थ लगाया है। कौषीतकी उपनिषदमें 'मातृवधेन पितृवधेन' इत्यादि मंत्रके पहले इंद्रने कहा है, कि "यद्यपि मैने वृत्त अर्थात् ब्राह्मणका वध किया है, तोभी मुझे उससे पाप नही लगता।" इससे स्पष्ट होता है, कि यहाँपर प्रत्यक्ष वधही विवक्षित है। धम्मपदके अंग्रेजी अनुवादमें (S. B. E. Vol. X. pp. 70, 71) मेक्समूलर साहबने श्लोकोंकी जो टीका की है, हमारे मतमें वहभी ठीक नहीं है।
३७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अब्राहम अपने पुत्रका बलिदान देना चाहता था; तोभी उसे पुत्रहत्या कर डालनेके प्रयत्नका पाप नहीं लगा; या बुद्धके शापसे उसका ससुर मर गया, तोभी उसे मनुष्य- हत्याका पातक छू तक नहीं गया; अथवा माताको मार डालनेपरभी परशुरामके हाथसे मातृहत्या नहीं हुई; उसका कारणभी यही (तत्त्व) है (जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है)। गीतामें अर्जुनको जो यह उपदेश किया है, कि "तेरी बुद्धि यदि पवित्र और निर्मल हो, तो फलाशा छोड़कर केवल क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धमें भीष्म और द्रोणको मार डालनेसेभी न तो तुझे पितामहके वधका पातक लगेगा और न गुरुहत्याका दोषभी। क्योंकि ऐसे समय ईश्वरी संकेतकी सिद्धिके लिये तू तो केवल निमित्त हो गया है" (गीता ११. ३३) उसमेंभी यही तत्त्व भरा है। व्यवहारमेंभी हम यही देखते हैं, कि यदि किसी लखपतीने किसी भीखमंगेसे दो पैसे छीन लिये हों, तो उस लखपतिको तो कोई चोर कहता नहीं, उलटे यही समझ लिया जाता है, कि भिखारीनेही कुछ अपराध किया होगा, कि जिसका लखपतीने उसको दंड दिया हो। यही न्याय इससेभी अधिक समर्पक रीतिसे या पूर्णतासे स्थितप्रज्ञ, अर्हत और भगवद्भक्तके बर्तावको उपयोगी होता है। क्योंकि लखपतिकी बुद्धि एक बार भलेही डिग जाय; परंतु यह जानीबूझी बात है, कि स्थितप्रज्ञकी बुद्धिको ये विकार कभी स्पर्श तक नहीं कर सकते। सृष्टिकर्ता परमेश्वर सब कर्म करनेपरभी जिस प्रकार पापपुण्यसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार इन ब्रह्मभूत साधु-पुरुषोंकी स्थिति सदैव पवित्र और निष्पाप रहती है। और तो क्या, समय समय पर ऐसे पुरुष स्वेच्छा अर्थात् अपनी मर्जीसे जो व्यवहार करते हैं, उन्हींसे आगे चलकर विधि-नियमोंके निबंध बन जाते हैं, और इसीसे कहते हैं, कि ये सत्पुरुष इन विधि नियमोंके जनक (उपजानेवाले) हैं--वे इनके दास कभी नहीं हो सकते। न केवल वैदिक धर्ममें, प्रत्युत बौद्ध और इसाई धर्ममेंभी यही सिद्धान्त पाया जाता है; तथा प्राचीन ग्रीक तत्त्वज्ञानियोंकोभी यह तत्त्व मान्य हो गया था; और अर्वाचीन कालमें कांटने* अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथमें उपपत्तिसहित यही सिद्ध कर दिखलाया है। इस प्रकार नितनियमोंके कभीभी गंदले न होनेवाले मूल झरने या निर्दोष पाठेका (आदर्श) निश्चय हो चुकनेपर आपही सिद्ध हो जाता है, कि नीतिशास्त्र या कर्मयोगशास्त्रके मूल तत्त्व देखनेकी जिसे अभिलाषा
- "A perfectly good will would therefore be equally subject to objective laws (viz. laws of good), but could not be conceived as obliged thereby to act lawfully, because of itself from its subjective constitution it can only be determined by the conception of good. Therefore no imperatives hold for the Divine will, or in general for a holy will; ought is here out of place, because the volition is already of itself necessarily in unison with the law. Kant's Meta- physic of Morals p. 31. (Abbott's trans. in Kant's Theory of Ethics, 6th Ed.) नित्शे किसीभी आध्यात्मिक उपपत्तिको स्वीकार नहीं करता,
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७५ हो, उसे इन उदार और निष्कलंक सिद्ध पुरुषोंके चरित्रोंकाही सूक्ष्म अवलोकन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें अर्जुनने श्रीकृष्णसे ये प्रश्न पूछे हैं, कि “ स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्” ( गीता २. ५४ ) – स्थितप्रज्ञ पुरुषका बोलना, बैठना और चलना कैसे होता है ? अथवा चौदहवें अध्यायमें, “ कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणान् एतान् अतीतो भवति प्रभो, किमाचारः” (गीता १४. २१ ) – पुरुष त्रिगुणातीत कैसे होता है ? उसका आचार क्या है ? और उसको किस प्रकार पहचानना चाहिये ? किसी सराफ़के पास सोनेका जेवर जँचवानेके लिये ले जानेपर अपनी दूकानमें रखी कसौटीपर उसको परख कर, फिर वह जिस प्रकार उसका खरा-खोटापन बतलाता है, उसी प्रकार कार्य-अकार्य या धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये स्थितप्रज्ञका बर्ताव एक कसौटी है। अतः गीताके उक्त प्रश्नोंमें यही अर्थ गर्भित है, कि मुझे उस कसौटीका ज्ञान करा दीजिये। अर्जुनके उपरोक्त प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवानने स्थितप्रज्ञ अथवा त्रिगुणातीतकी स्थितिके जो वर्णन किये हैं, उन्हें कुछ लोग संन्यास-मार्गवाले ज्ञानी पुरुषोंके बतलाते हैं, उन्हें वे कर्मयोगियोंके नहीं मानते। क्योंकि संन्यासियोंको उद्देश्यकरही 'निराश्रयः' (गीता ४. २०) विशेषणका गीतामें प्रयोग हुआ है, और बारहवें अध्यायमें स्थितप्रज्ञ भगवद्भक्तोंका वर्णन करते समय 'सर्वारंभपरित्यागी' (गीता १२. १६) एवं 'अनिकेतः' (गीता १२. १९), इन स्पष्ट पदोंका प्रयोग किया गया है। परंतु निराश्रय अथवा अनिकेत पदोंका अर्थ “ घरबार छोड़कर जंगलोंमें भटकनेवाला” विवक्षित नहीं है, किंतु इसका अर्थ “ अनाश्रितः कर्मफलं”के ( गीता ६. १) समानार्थकही करना चाहिये – अर्थात् “कर्मफलका आश्रय न करनेवाला” अथवा “जिसके मनमें फलके लिये ठौर नहीं” इस ढंगका हो जायगा। गीताके अनुवादमें इन श्लोकोंके नीचे जो टिप्पणियाँ दी हैं, उनसे यह बात स्पष्ट दीख पड़ेगी। इसके अतिरिक्त स्थितप्रज्ञके वर्णनमेंही कहा है, कि “ इंद्रियोंको अपने वशमें रख कर व्यवहार करनेवाला” अर्थात् वह निष्काम कर्म करनेवाला होता है (गीता २. ६४)। और जिस श्लोकमें उक्त 'निराश्रय' पद आया है, वहाँ यह वर्णन है, कि “कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः” अर्थात् समस्त कर्म करकेभी वह अलिप्त रहता है। बारहवें अध्यायके अनिकेत आदि पदोंके लिये इसी न्यायका उपयोग करना चाहिये। क्योंकि इस अध्यायमें पहले कर्मफलके त्यागकी (कर्मत्यागकी नहीं) प्रशंसा कर चुकनेपर (गीता १२. १२) फलाशा त्यागकर कर्म करनेसे मिलनेवाली शांतिका दिग्दर्शन करनेके लिये आगे भगवद्भक्तके लक्षण बतलाये ह; और ऐसेही अठारहवें अध्यायमेंभी यह दिखलानेके तथापि उसने अपने ग्रंथमें उत्तम पुरुषका ( Superman ) जो वर्णन किया है, उसमें कहा है, कि उल्लिखित पुरुष भले और बुरेसे परे रहता है। उसके एक ग्रंथका नामभी Beyond Good and Evil है।
३७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लिये – कि आसक्तिविरहित कर्म करनेसे शांति कैसे मिलती है – ब्रह्मभूत पुरुषका पुनः वर्णन आया है ( गीता १८. ५० ) । अतएव यह मानना पड़ता है, कि ये सब वर्णन संन्यासमार्गवालोंके नहीं हैं; किंतु कर्मयोगी पुरुषोंकेही हैं। कर्मयोगी स्थित- प्रज्ञ और संन्यासी स्थितप्रज्ञ, दोनोंका ब्रह्मज्ञान, शांति, आत्मौपम्य और निष्काम बुद्धि अथवा नीतितत्त्व पृथक् पृथक् नहीं हैं। दोनों, पूर्ण ब्रह्मज्ञानी हैं, इस कारण दोनोंकी मानसिक स्थिति और शांति एक-सी होती हैं। परंतु इन दोनोंमें कर्म-दृष्टिसे महत्त्वका भेद यह है, कि पहला निरी शांतिमें डूबा रहता है; और किसीकीभी चिंता नहीं करता; तथा दूसरा अपनी शांति एवं आत्मौपम्य बुद्धिका व्यवहारमें यथासंभव नित्य उपयोग किया करता है। अतः यह न्यायसे सिद्ध है, कि व्यावहारिक धर्म-अधर्म-विवेचनके काममें, जिसके प्रत्यक्ष व्यवहारको प्रमाण मानना है, वह स्थितप्रज्ञ कर्म करनेवालाही होना चाहिये; यहाँ कर्मत्यागी साधु अथवा भिक्षुका विवक्षित होना संभव नहीं है। गीतामें अर्जुनको किये गये समग्र उपदेशका सार यह है, कि कर्मोंके छोड़ देनेकी न तो जरूरत है और न वे छूटभी सकते हैं ब्रह्मा- त्मैक्यका ज्ञान प्राप्त कर कर्मयोगीके समान व्यवसायात्मका बुद्धिको साम्यावस्थामें रखना चाहिये, जिससे उसके साथ-ही-साथ वासनात्मक बुद्धिभी सर्वदा शुद्ध, निर्मम और पवित्र रहेगी, एवं कर्मका बंधन न होगा। यही कारण, है, कि इस प्रकरणके आरंभके श्लोकमें यह धर्मतत्त्व बतलाया गया है, कि "केवल वाणी और मनसेही नहीं; किंतु प्रत्यक्ष कर्मसे जो सबका स्नेही और हितकर्ता हो गया, उसेही धर्मज्ञ कहना चाहिये।" जाजलिको यह धर्मतत्त्व बतलाते समय तुलाधारने वाणी और मनके साथही – बल्कि उससेभी पहले – उसमें कर्मकाभी प्रधानतासे निर्देश किया है। कर्मयोगी स्थितप्रज्ञकी अथवा जीवन्मुक्तकी बुद्धिके अनुसार सब प्राणियोंमें जिसकी साम्यबुद्धि हो गई; और जिसके स्वार्थका परार्थमें सर्वथा लय हो गया, उसको आगे विस्तृत नीतिशास्त्र सुनानेकी जरूरत नहीं। वह तो आप ही स्वयंप्रकाश अथवा 'बुद्ध' हो गया। अर्जुनका अधिकार इसी प्रकारका था। अतः उसे इससे अधिक उपदेश करनेकी जरूरतही न थी, कि "तू अपनी बुद्धिको सम और स्थिर कर;" तथा "कर्मको त्याग देनेके व्यर्थ भ्रममें न पड़कर स्थितप्रज्ञकी-सी बुद्धि रख और स्वधर्मके अनुसार प्राप्त सभी सांसारिक कर्म किया कर।" तथापि यह साम्य बुद्धि- रूप योग सभीको एकही जन्ममें प्राप्त नहीं हो सकता, इसीसे साधारण लोगोंके लिये स्थितप्रज्ञके बर्तावका और थोड़ा-सा विवेचन करना चाहिये। परंतु यह विवेचन करते समय भली भाँति स्मरण रहे, कि हम जिस स्थितप्रज्ञका विचार करेंगे, वह कृतयुगके पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए समाजमें रहनेवाला नहीं है; बल्कि जिस समाजके बहुतेरे लोग स्वार्थमेंही डूबे रहते हैं, उसी कलियुगी समाजमें उसे बर्ताव करना है। क्योकि मनुष्यका ज्ञान कितनाही पूर्ण क्यों न हो गया हो और उसकी बुद्धि साम्या-
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७७ वस्थामें कितनीही क्यो न पहुँच गई हो, तोभी उसे ऐसे लोगोंके साथ बर्ताव करना है, जो काम-क्रोध आदिके चक्करमें पड़े हुए हैं; और जिनकी बुद्धि अशुद्ध है। अतएव इन लोगोंके साथ व्यवहार करते समय यदि वह अहिंसा, दया, शांति और क्षमा आदि नित्य एवं परमावधिके सद्गुणोंकोही सब प्रकारसे सर्वदा स्वीकार करें, तो उसका निर्वाह न होगा !* अर्थात् जहाँ सभी स्थितप्रज्ञ हैं, उस समाजकी उन्नत नीति या धर्म-अधर्मसे, उस समाजके धर्म-अधर्म कुछ कुछ भिन्न तो रहेंगेही - कि जिसमें लोभी पुरुषोंकीही भरमार अधिक होगी - वरना साधु पुरुषोंको यह जगत् छोड़ देना पड़ेगा; और सर्वत्र दुष्टोंकाही बोलबाला हो जावेगा। इसका अर्थ यह नहीं है, कि साधु पुरुषको अपनी समता-बुद्धि छोड़ देनी चाहिये। फिरभी समता-समतामेंभी भेद है। गीतामें कहा है, कि "ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (गीता ५. १८) - ब्राह्मण, गाय और हाथीमें पंडितोंकी सम-बुद्धि होती है, इसलिये यदि कोई गायके लिये लाया हुआ चारा ब्राह्मणको और ब्राह्मणके लिये बनाई गई रसोई गायको खिलाने लगे, तो क्या उसे पंडित कहेंगे? संन्यास-मार्गवाले इस प्रश्नका महत्त्व भले न मानें; पर कर्मयोगशास्त्रकी बात ऐसी नहीं है। दूसरे प्रकरणके विवेचनसे पाठक यह जान गयेही होगें, कि कृतयुगी समाजके पूर्णावस्थावाले धर्म-अधर्मके स्वरूपपर ध्यान रखकर स्वार्थपरायण लोगोंके समाजमें स्थितप्रज्ञ यह निश्चय करके बर्ताव है, कि देशकालके अनुसार उसमें कौन कौन फ़र्क़ कर देने चाहिये। और कर्मयोगशास्त्रका यही तो विकट प्रश्न है। साधु पुरुष स्वार्थपरायण लोगोंपर नाराज नहीं होते अथवा उनकी लोभ-बुद्धि देखकर वे अपने मनकी समता डिगने नहीं देते; उलटे इन्हीं लोगोंके कल्याणके लियेही अपने उद्योग केवल कर्तव्य समझ कर वैराग्यसे जारी रखते हैं। इसी तत्त्वको मनमें रखकर श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके पूर्वार्धमें पहले ब्रह्मज्ञान बतलाया है; और फिर ग्यारहवें दशकमें (दास. ११. १०; १२. ८-१०; १५. २) इसका वर्णन आरंभ किया है, कि स्थितप्रज्ञ या उत्तम
- "In the second place, ideal conduct such as ethical theory is concerned with, is not possible for the ideal man in the midst of men otherwise constituted. An absolutely just or perfectly sympathetic person, could not live and act according to his nature in a tribe of cannibals. Among people who are treacherous and utterly without scruple, entire truthfulness and openness must bring ruin." 'Spencer's Data of Ethics, Chap XV, p. 280 स्पेन्सरने इसे Relative Ethics कहा है; और वह कहता है, कि On the evolution- hypothesis, the two ( Abosolute and Relative Ethics ) presuppose one another and only when they co-exist, can there exist that ideal conduct which Absolute Ethics has to formulate, and which Relative Ethics has to take as the standard by which to estimate divergencies from right, or degrees of wrong."
३७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पुरुष साधारण लोगोंको चतुर बनानेके लिये वैराग्यसे अर्थात् निःस्पृहतासे लोक- संग्रहके निमित्त उद्योग किस प्रकार किया करते हैं; और आगे अठारहवें दशकमें (दास. १८.२) कहा है, कि सभीको ज्ञानी पुरुष अर्थात् जानकारके ये गुण- कथा, बातचीत, युक्ति, दाव-पेंच, प्रसंग, साक्षेप, तर्क, चतुराई, राजनीति, सहन- शीलता, तीक्ष्णता, उदारता, अध्यात्मज्ञान, भक्ति, अलिप्तता, वैराग्य, धैर्य, उत्साह, कठोरता, निग्रह, समता और विवेक आदि-सिखने चाहिये। परंतु इस निःस्पृह साधुको लोभी मनुष्योंमेंही बर्तना है, इसलिये अंतमें (दास. १९.९.३०) श्रीसमर्थका यह उपदेश है, कि "लठ्ठका सामना लठ्ठेहीसे करा देना चाहिये। उजड्डके लिये उजड्डही चाहिये; और नटखटके सामने नटखटकीही आवश्यकता है।" तात्पर्य, यह निर्विवाद है, कि पूर्णावस्थासे व्यवहारमें उतरनेपर अत्युच्च श्रेणीके धर्म-अधर्ममें थोड़ा-बहुत अंतर कर देना पड़ता है। इसपर आधिभौतिकवादियोंकी शंका है, कि पूर्णावस्थाके समाजमे नीचे उतरनेपर अनेक बातोंके सार-असारका विचार करके परमावधिके नीति-धर्ममें यदि थोड़ा-बहुत फर्क करनाही पड़ता है, तो नीति-धर्मकी नित्यता कहाँ रह गई ? और भारतसावित्रीमें व्यासने जो यह 'धर्मो नित्यः' तत्त्व बतलाया है, उसकी क्या दशा होगी ? वे कहते हैं, कि अध्यात्म-दृष्टिसे सिद्ध होनेवाला धर्मका नित्यत्व केवल कल्पनाप्रसूत है और प्रत्येक समाजकी स्थितिके अनुसार उस समयमे "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख"-वाले तत्त्वसे जो नीतिधर्म प्राप्त होंगे, वेही चोखे नीति- नियम हैं। परंतु यह युक्तिवाद ठीक नहीं है। भूमितिशास्त्रके नियमानुसार यदि कोई बिना चौड़ाईके सरल रेखा अथवा सर्वांशमें निर्दोष गोलाकार न खींच सके, तो जिस प्रकार इतनेहीसे सरल रेखाकी अथवा शुद्ध गोलाकारकी शास्त्रीय व्याख्या गलत या निरर्थक नहीं हो जाती, उसी प्रकार सरल और शुद्ध नियमोंकी बात है। जबतक किसी बातके परमावधिके शुद्ध स्वरूपका निश्चय पहले न कर लिया जावे, तबतक व्यवहारमें दीख पड़नेवाली उस बातकी अनेक सूरतोंमें सुधार करना अथवा सार-असारका विचार करके अंतमें उसके तारतम्यको पहचान लेनाभी संभव नहीं है। और यही कारण है, कि जो सराफ़ पहलेही निर्णय करता है, कि पूर्ण शुद्ध सोना कौन-सा है ? दिशाप्रदर्शक ध्रुवमत्स्य यंत्र अथवा ध्रुव नक्षत्रकी ओर दुर्लक्षकर अपार महोदधिकी लहरों और वायुकेही तारतम्यको देखकर यदि जहाजके खलासी बराबर अपने जहाजकी पतवार घुमाने लगें, तो उनकी जो स्थिति होगी, वही स्थिति नीति-नियमोंके परमावधिके स्वरूपपर ध्यान न देकर केवल देशकालके अनुसार बर्तनेवाले मनुष्योंकी होनी चाहिये। अतएव यदि निरी आधिभौतिक- दृष्टिसेही विचार करें, तोभी यह पहले अवश्य निश्चित कर लेना पड़ता है, कि ध्रुव जैसा अटल और नित्य नीति-तत्त्व कौन-सा है ? और इस आवश्यकताको एक बार मान लेनेसेही सारा आधिभौतिक पक्ष लँगड़ा हो जाता है। क्योंकि सुखदुःख
सिद्धावस्था और व्यवहार ३७९ आदि सभी विषयोपभोग नामरूपात्मक हैं। अतएव ये अनित्य और विनाशवान् मायाकीही सीमामें रह जाते हैं। इसलिये केवल इन्हीं बाह्य प्रमाणोंके आधारसे सिद्ध होनेवाला कोईभी नीति-नियम नित्य नहीं हो सकता। आधिभौतिक बाह्य सुखदुःखकी कल्पना जैसे जैसे बदलती जावेगी, वैसेही वैसे उसकी बुनियादपर रचे हुए नीतिधर्मोंकोभी बदलते रहना चाहिये। अतः नित्य बदलती रहनेवाली नीति-धर्मकी इस स्थितिको टालनेके लिये माया-सृष्टिके विषयोपभोग छोड़कर नीति-धर्मकी इमारत इस "सब भूतोंमें एक आत्मा"-वाले अध्यात्मज्ञानके मजबूत आधार- परही खड़ी करनी पड़ती है। क्योंकि पीछे नवें प्रकरणमें कह चुके हैं, कि आत्माको छोड़ जगतमें दूसरी कोईभी वस्तु नित्य नहीं है। यही तात्पर्य व्यासजीके इस वचनका है, कि "धर्मो नित्यः सुखदुःख त्वनित्ये" - नीति अथवा सदाचरणके धर्म नित्य हैं; और सुखदुःख अनित्य हैं। यह सच है, कि दुष्ट और लोभियोंके समाजमें अहिंसा एवं सत्य प्रभृति नित्य नीति-धर्म पूर्णतासे पाले नहीं जा सकते; पर उसका दोष इन नित्य नीति-धर्मोंको देना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणोंसे किसी पदार्थकी परछाई चौरस मैदानपर सपाट और ऊँचे-नीच स्थानपर ऊँची-नीची पडती देख जैसे यह अनुमान नहीं किया जा सकता, कि वह परछाई मूलमेंही ऊँची-नीची होगी; उसी प्रकार जब कि दुष्टोंके समाजमें नीति-धर्मका पराकाष्ठाका शुद्ध स्वरूप नहीं पाया जाता, तब यह नहीं कह सकते, कि अपूर्णावस्थाके समाजमें पाया जानेवाला नीति-धर्मका अपूर्ण स्वरूपही मुख्य अथवा मूलका है। यह दोष समाजका है, नीतिका नहीं। इसीसे चतुर पुरुष शुद्ध और नित्य नीति-धर्मोंसे झगड़ा न मचा कर ऐसे प्रयत्न किया करते हैं, कि जिनसे समाज ऊँचा उठता हुआ पूर्णावस्था में जा पहुँचे। लोभी मनुष्योंके समाजमें इस प्रकार बर्तते समय नित्य नीति-धर्मोंके कुछ अपवाद यद्यपि अपरिहार्य मानकर हमारे शास्त्रकारोंने बतलाये हैं, तथापि उसके लिये वे प्राय- श्चित्तभी बतलाते हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक नीतिशास्त्र इन्हीं अपवादोंको मूछोंपर ताव देकर प्रतिपादन करते हैं, एवं इन प्रतिवादोंका निश्चय करते समय, वे उपयोगमें आनेवाले बाह्य फलोंके तारतम्यके तत्वकोही भ्रमसे नीतिका मूल तत्त्व मानते हैं। अब पाठक समझ जायेंगे, कि पिछले प्रकरणोंमें हमने ऐसा भेद क्यों दिखलाया है ? यह बतला दिया, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुषकी बुद्धि और उसका बर्तावही नीतिशास्त्रका आधार है। एवं यहभी बतला दिया, कि उससे निकलनेवाले नीति- नियमोंको - उनके नित्य होनेपरभी - समाजकी अपूर्णावस्थामें थोड़ा-बहुत बदलना पड़ता है; तथा इस रीतिसे बदले जाने परभी नीतिनियमोंकी नित्यतामें उस परि- वर्तनसे कोई बाधा क्यों और कैसे नहीं आती। अब उस पहले प्रश्नका विचार करते हैं, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष अपूर्णावस्थाके समाजमें जो बर्ताव करता है, उसका मूल अथवा बीज-तत्त्व क्या है ? चौथे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि यह विचार दो प्रकारसे
किया जा सकता है। एक तो कर्ताकी बुद्धिको प्रधान मानकर और दूसरा उसके बाहरी बर्तावसे । इनमेंसे यदि केवल दूसरीही दृष्टिसे विचार करें, तो विदित होगा कि, स्थितप्रज्ञ जो जो व्यवहार करते हैं, वे प्रायः सब लोगोंके हितकेही होते हैं। गीतामें दो बार कहा गया है, कि परम ज्ञानी सत्पुरुष "सर्वभूतहिते रताः" - प्राणिमात्रके कल्याणमें निमग्न रहते हैं ( गीता ५. २५; १२.४); और महा- भारतमेंभी यही अर्थ अन्य कई स्थानोंमें आया है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि स्थित- प्रज्ञ सिद्ध पुरुष अहिंसा आदि जिन नियमोंका पालन करते हैं, वही धर्म अथवा सदा- चारका नमूना है। इन अहिंसा आदि नियमोंका प्रयोजन अथवा इस धर्मका लक्षण बतलाते हुए महाभारतमें धर्मका बाहरी उपयोग दिखलानेवाले ऐसे अनेक वचन हैं - "अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम्" ( वन. २०६. ७३ ) - अहिंसा और सत्य भाषण, ये नीति-धर्म प्राणिमात्रके हितके लिये हैं। "धारणाद्धर्ममित्याहुः" ( शां. १०९. १२) - जगतका धारण करनेसे धर्म है। "धर्म हि श्रेय इत्याहुः" ( अनु. १०५. १४) - कल्याणही धर्म है। "प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्" ( शां. १०९. १० ) - लोगोंके अभ्युदयके लियेही धर्म-अधर्मशास्त्र बना है; अथवा "लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः । उभयत्र सुखोदर्कः" ( शां. २५८. ४) - धर्म-अधर्मके नियम इसलिये रचे गये हैं, कि उनसे लोकव्यवहार चले; और दोनों लोकोंमें कल्याण हो । इसी प्रकार कहा है, कि धर्म-अधर्म-संशयके समय ज्ञानी पुरुषकोभी लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च । "लोकव्यवहार, नीतिधर्म और अपना कल्याण - इन बाहरी बातोंका तारतम्यसे विचार करके" ( अनु. ३७. १६; वन २०५. ९० ) फिर जो कुछ करना हो, उसका निश्चय करना चाहिये; और वनपर्वमें राजा शिबीने धर्म-अधर्मके निर्णयार्थ इसी युक्तिका उपयोग किया है ( वन. १३१. ११, १२ ) । इन वचनोंसे प्रकट होता है, कि समाजका उत्कर्षही स्थितप्रज्ञके व्यवहारकी 'बाह्य नीति' होती है। और यदि यह ठीक है, तो आगे सहजही यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि आधिभौतिक- वादियोंके इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख अथवा ( सुख शब्दको व्यापक करके ) हित या कल्याण "वाले नीति-तत्त्वको अध्यात्मवादीभी क्यों नहीं स्वीकार कर लेते ? चौथे प्रकरणमें हमने दिखला दिया हैं, कि इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" सूत्रमें बुद्धिके आत्मप्रसादसे होनेवाले सुखका अथवा उन्नतिका और पार- लौकिक कल्याणका अंतर्भाव नहीं होता, - इसमें यह बड़ा भारी दोष है। किंतु 'सुख' शब्दका अर्थ अधिक व्यापक करके यह दोष अनेक अंशोंमें निकाल डाला जा सकेगा; और नीति-धर्मकी नित्यताके संबंधमें ऊपरही दी हुई आध्यात्मिक उप- पत्तिभी कई लोगोंको विशेष महत्त्वकी जँचेगी। इसलिये नीतिशास्त्रके अध्या- त्मिक और आधिभौतिक मार्गोंमें जो महत्त्वका भेद है, उसका यहाँ और थोड़ासा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है।
सिद्धावस्था और व्यवहार ३८१ नीतिकी दृष्टिसे किसी कर्मकी योग्यता अथवा अयोग्यताका विचार दो प्रकारोंमें किया जाता है :- ( १ ) उस कर्मका केवल बाह्य फल देख कर अर्थात् यह देख कर कि उसका दृश्य परिणाम जगत्पर क्या हुआ है या होगा ? ( २ ) यह देख कर, कि उस कर्मको करनेवालेकी बुद्धि अर्थात् वासना कैसी है ? पहलेको आधिभौतिक मार्ग कहते हैं। दूसरेके फिर दो पक्ष होते हैं; और इन दोनोंके पृथक् पृथक् नाम हैं। ये सिद्धान्त पिछले प्रकरणोंमें बतलाये जा चुके हैं, कि शुद्ध कर्म होनेके लिये वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनी पड़ती है और वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनेके लिये व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली बुद्धिभी स्थिर, सम और शुद्ध रहनी चाहिये। इन सिद्धान्तोंके अनुसार किसीकेभी कर्मोंकी शुद्धता जाँचनेके लिये देखना पड़ता है, कि उसकी वासनात्मक बुद्धि शुद्ध है या नहीं ? और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता जाँचने लगे, तो अंतमें देखनाही पड़ता है, कि व्यवसा- यात्मका बुद्धि शुद्ध है या अशुद्ध ? सारांश, कर्ताकी बुद्धि अर्थात् वासनाकी शुद्धताका निर्णय अंतमें व्यवसायात्मका बुद्धिकी शुद्धतामे करना पड़ता है ( गीता २. ४१ ) । इसी व्यवसायात्मक बुद्धिको सदसद्विवेचन-शक्तिके रूपमें स्वतंत्र देवता मान लेनेसे वह आधिदैविक मार्ग हो जाता है। परंतु यह बुद्धि स्वतंत्र दैवत नहीं है; किंतु आत्माका एक अंतरिंद्रिय है, अतः बुद्धिको प्रधानता न देकर, आत्माको प्रधान मान करके वासनाकी शुद्धताका विचार करनेसे यह नीतिके निर्णयका आध्यात्मिक मार्ग हो जाता है। हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि इन सब मार्गोंमें आध्यात्मिक मार्ग श्रेष्ठ है; और प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने यद्यपि ब्रह्मात्मैक्यका सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे नहीं दिया है, तथापि उसने अपने नीतिशास्त्रके विवेचनका आरंभ शुद्ध-बुद्धिसे अर्थात् एक प्रकारसे अध्यात्म-दृष्टिसेही किया है, एवं उसने इसकी पूर्ण उपपत्तिभी दी है, कि ऐसा क्यों करना चाहिये। * ग्रीनका अभिप्रायभी ऐसाही है; परंतु इस विषयका पूरा विवेचन इस छोटे-से ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। हम चौथे प्रकरणमें दो-एक उदाहरण देकर स्पष्ट दिखला चुके हैं, कि नीति-तत्त्वोंका पूरा निर्णय करनेके लिये कर्मके बाहरी फलकी अपेक्षा कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिपर विशेष ध्यान क्यों देना पड़ता है, और इस संबंधमें अधिक विचार आगे - पंद्रहवें प्रकरणमें पाश्चात्य और पौरस्त्य नीति-मार्गोंकी तुलना करते समय - किया जावेगा। अभी इतनाही कहते हैं, कि कोईभी कर्म तभी होता है, जब कि पहले उस कर्मको करनेकी बुद्धि उत्पन्न हो, इसलिये कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचारभी सभी अंशोंमें बुद्धिकी शुद्धता- अशुद्धताके विचारपरही अवलंबित रहता है। बुद्धि बुरी होगी; तो कर्मभी बुरा होगा, परंतु केवल बाह्य कर्मके बुरे होनेसेही यह अनुमान नहीं किया जा सकता,
* Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. especially Metaphysics of Morals therein.
३८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि बुद्धिभी बुरी होनीही चाहिये। क्योंकि भूलसे, कुछ-का-कुछ समझ लेनेसे अथवा अज्ञानसेभी वैसा कर्म हो सकता है; और फिर उसे नीतिशास्त्रकी दृष्टिसे बुरा नहीं कह सकते । “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख”-वाला नीतिशास्त्र-तत्त्व केवल बाहरी परिणामोंके लियेही उपयोगी होता है; और जब कि इन सुखदुःखात्मक बाहरी परिणामोंको निश्चित रीतिसे मापनेका बाहरी साधन अब तक नहीं मिला है, तब नीति-तत्त्वोंकी इस कसौटीमे सदैव यथार्थ निर्णय होनेका भरोसाभी नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार मनुष्य कितनाही सयाना क्यों न हो जाय, यदि उसकी बुद्धि पूर्ण शुद्ध न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते, कि वह प्रत्येक अवसरपर धर्मसेही बर्तेगा । विशेषतः जहाँ उसका स्वार्थ आ डटा, वहाँ तो फिर कहनाही क्या है ? – “स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः” (मभा. वि. ५१. ४)। सारांश, मनुष्य कितनाही बड़ा ज्ञानी, धर्मवेत्ता और सयाना क्यों न हो, किन्तु यदि उसकी बुद्धि प्राणिमात्रमें सम न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते; कि उसका कर्म सदैव शुद्ध अथवा नीतिकी दृष्टिसे निर्दोषही रहेगा । अतएव हमारे शास्त्रकारोने निश्चित कर दिया है, कि नीतिका विचार करते समय कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिकाही प्रधानतासे विचार करना चाहिये । साम्य-बुद्धिही अच्छे बर्तावका चोखा बीज है। यही भावार्थ भगवद्गीताके इस उपदेशमेंभी है ( गीता २. ४९ ) :- दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ कुछ लोग, इस श्लोकमें, बुद्धिका अर्थ ज्ञान समझकर कहते हैं, कि इसमें कर्म और ज्ञान, इन दोनोंमेंसे ज्ञानकोही श्रेष्ठता दी है। पर हमारे मतमें यह अर्थ ठीक नहीं है। इस स्थलपर शांकरभाष्यमेंभी 'बुद्धियोग'का अर्थ 'समत्व बुद्धियोग' दिया हुआ है; और यह श्लोक कर्मयोगके प्रकरणमें आया है। अतएव वास्तवमें इसका अर्थ कर्मप्रधानही करना चाहिये; और वही सरल रीतिसेही है। कर्म करनेवाले लोग दो प्रकारके होते हैं। पहले प्रकारके फलपर – उदाहरणार्थ, उससे कितने लोगोंको कितना सुख होगा, इसपर – दृष्टि जमा कर कर्म करते हैं; और दूसरे बुद्धिको सम और निष्काम रखकर कर्म करते हैं – फिर कर्मधर्म-संयोगसे उससे जो परिणाम होना हो, सो हुआ करे। इनमेंसे 'फलहेतवः' अर्थात् “फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले” लोगोंको नैतिक दृष्टिसे कृपण अर्थात् कनिष्ठ श्रेणीके बतलाकर, समत्व- बुद्धिसे कर्म करनेवालोंको इस श्लोकमें श्रेष्ठता दी है। इस श्लोकके पहले दो चरणोंमें जो यह कहा है, कि “दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय” – हे धनंजय !
- इस श्लोकका सरल अर्थ यह है – “हे धनंजय ! (सम-) बुद्धिके योगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म बिलकुलही निकृष्ट है। अतएव (सम-) बुद्धिकाही आश्रय कर। फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले (पुरुष) कृपण अर्थात् ओछे दर्जेके है।”