श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३६५ याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी ( याज्ञ. ३. ५७; २०५ ) अपनी टीकामें ईशावास्यका ग्यारहवाँ मंत्र देकर, अनंताचार्यके समानही, उसका ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक अर्थ किया है। इससे पाठकोंके ध्यानमें आ जायेगा, कि आज हम नये सिरेसेही ईशावास्योपनिषदके मंत्रका शांकरभाष्यसे भिन्न अर्थ नहीं करते हैं। यह तो हुआ स्वयं ईशावास्योपनिषदके मंत्रके संबंधका विचार। अब शांकर- भाष्यमें "तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते" यह जो मनुका वचन दिया है, उसकाभी थोड़ा-सा विचार करते हैं। मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमें यह १०४ क्रमांका श्लोक है; और मनु. १२. ८६ से विदित होगा, कि वह प्रकरण वैदिक कर्मयोगका है। कर्मयोगके इस विवेचनमें :- तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयस्करं परम् । तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ पहले चरणमें यह बतलाकर, कि "तप और (च) विद्या, ये (अर्थात् दोनों) ब्राह्मणको उत्तम मोक्षदायक हैं," फिर उनमेंसे प्रत्येकका उपयोग दिखलानेके लिये दूसरे चरणमें कहा है, कि "तपसे दोष नष्ट हो जाते हैं और विद्यासे अमृत अर्थात् मोक्ष मिलता है।" इससे प्रकट होता है, कि इस स्थानपर ज्ञान-कर्म-समुच्चयही मनुको अभिप्रेत है; और ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रकाही अर्थ मनुने इस श्लोकमें वर्णन कर दिया है। हारीत-स्मृतिके वचनसेभी यही अर्थ अधिक दृढ़ होता है। यह हारीत-स्मृति स्वतंत्र तो उपलब्ध हैही; इसके सिवा नृसिंहपुराणमेंभी (नृ. पु. ५७-६१) आई है। इस नृसिंहपुराणमें (६१. ९-११) और हारीत- स्मृतिमें (हा. स्मृ. ७. ९-११) ज्ञान-कर्म-समुच्चयके संबंधमें ये श्लोक हैं:- यथाश्वा रथहीनाश्च रथाश्चाश्वैर्विना यथा । एवं तपश्च विद्या च उभावपि तपस्विनः ॥ यथाऽन्नं मधुसंयुक्तं मधु चान्नेन संयुतम् । एवं तपश्च विद्या च संयुक्तं भेषजं महत् ॥ द्वाभ्यामेव हि पक्षाभ्यां यथा वै पक्षिणां गतिः । तथैव ज्ञानकर्माभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ॥ "जिस प्रकार रथके बिना घोड़े और घोड़ोंके बिना रथ (नहीं चलते), उसी प्रकार तपस्वीके तप और विद्याकीभी स्थिति है। जिस प्रकार अन्न शहदसे संयुक्त हो; और शहद अन्नसे संयुक्त हो, उसी प्रकार तप और विद्याके (दोनोंके) संयुक्त होनेसे एक महौषधि बनती है। जैसे पक्षियोंकी गति दोनों पंखोंके योगसेही होती है, वैसेही ज्ञान और कर्मसे (दोनों) शाश्वत ब्रह्म प्राप्त होता है।" हारीत-स्मृतिके उपरोक्त वचन वृद्धात्रेय-स्मृतिके दूसरे अध्यायमेंभी पाये जाते हैं। इन वचनोंसे, और विशेषकर उनमें दिये गये दृष्टान्तोंसे, प्रकट हो जाता है, कि मनुस्मृतिके