भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 411

३६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वचनोंका क्या अर्थ लगाना चाहिये ? यह तो पहलेही कह चुके हैं, कि मनु तप शब्दमेंही चातुर्वर्ण्यके कर्मोंका समावेश करते हैं ( मनु. ११. २३६ ) ; और अब दीख पड़ेगा, कि तैत्तिरीयोपनिषदमें ' तप और स्वाध्याय-प्रवचन ' इत्यादिका जो आचरण करनेके लिये कहा गया है (तै. १. ९), वहभी ज्ञान-कर्म-समुच्चय-पक्षको स्वीकार करही कहा गया है । संपूर्ण योगवासिष्ठ ग्रंथका तात्पर्यभी यही है । क्योंकि इस ग्रंथके आरंभमें सुतीक्ष्णने प्रश्न किया है, कि मुझे बतलाइये, कि मोक्ष कैसे मिलता है ? केवल ज्ञानसे, केवल कर्मसे, या दोनोंके समुच्चयसे ? और उसे उत्तर देते हुए हारीत-स्मृतिके पक्षीके पंखोंवाला, दृष्टान्त लेकर, पहले यह बतलाया है, कि “ जिस प्रकार आकाशमें पक्षीकी गति दोनों पंखोंसेही होती है, उसी प्रकार ज्ञान और कर्म, इन्हीं दोनोंसे मोक्ष मिलता है। केवल एकसेही यह सिद्धि मिल नहीं जाती ।” और आगे इसी अर्थको विस्तारसहित सिद्धकर दिखलानेके लिये संपूर्ण योगवासिष्ठ ग्रंथ कहा गया है (यो. १. १. ६-९) । इसी प्रकार वसिष्ठने रामको मुख्य कथामें स्थान-स्थानपर बार-बार यही उपदेश किया है, कि “ जीवन्मुक्तके समान बुद्धिको शुद्ध रखकर तुम समस्त व्यवहार करो” (यो. ५. १८. १७-२६) ; या मरण- पर्यंत कर्मोंका छोड़ना उचित न होनेके कारण ( यो. ६. उ. २. ४२ ), स्वधर्मके अनुसार प्राप्त राज्यको पालनेका काम करते रहो” ( यो. ५. ५. ५४; ६. उ. २१३. ५० ) । इस ग्रंथका उपसंहार और आगे श्रीरामचंद्रके किये हुए कामभी इसी उपदेशके अनुसार हैं। परंतु योगवासिष्ठके टीकाकार थे संन्यास-मार्गीय, इसलिये पक्षीके दो पंखोंवाली उपमाके स्पष्ट होने परभी, उन्होंने अंतमें अपनी ओर- से यह तुर्रा लगाही दिया, कि ज्ञान और कर्म, दोनों युगपत् अर्थात् एकही समयमें विहित नहीं हैं। परंतु बिना टीकाके मूल ग्रंथ पढ़नेसे किसीकेभी ध्यानमें सहजही आ जावेगा, कि टीकाकारोंका यह अर्थ खींचातानीका है; एवं क्लिष्ट और सांप्रदायिक है। मद्रास प्रांतमें योगवासिष्ठ-सरीखाही 'गुरुज्ञान-वासिष्ठ-तत्त्वसारायण' नामक एक ग्रंथ प्रसिद्ध है और उसके ज्ञानकांड, उपासनाकांड और कर्मकांड - ये तीन भाग हैं। हम पहले कह चुके हैं, कि यह ग्रंथ जितना पुराना बतलाया जाता है, उतना पुराना नहीं दिखता है। वह प्राचीन भलेही न हो; पर जब कि ज्ञान-कर्म-समुच्चय-पक्षही उसमें प्रतिपाद्य है, तब इस स्थानपर उसका उल्लेख करना आवश्यक है। इसमें अद्वैत वेदान्त है और निष्काम कर्मपरही बहुत जोर दिया गया है, इसलिये यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि उसका संप्रदायभी शंकराचार्यके संप्रदायसे भिन्न और स्वतंत्र है। मद्रासकी ओर इस संप्रदायका नाम 'अनुभवाद्वैत' है और वास्तविक देखनेसे ज्ञात होगा, कि गीताके कर्मयोगकी यह एक नकलही है। परंतु केवल भगवद्गीताकेही आधारसे इस संप्रदायको सिद्ध न कर, इस ग्रंथमें कहा है, कि कुल १०८ उपनिषदोंसेभी वही अर्थ सिद्ध होता है। इसमें रामगीता और सूर्यगीता, ये दो नई गीताएँभी दी हैं। कुछ लोगोंकी जो यह समझ है, कि अद्वैत मतको अंगीकार करना मानो