भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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संन्यास और कर्मयोग ३६७ कर्म-संन्यास-पक्षको स्वीकार करनाही है, वह इस ग्रंथसे दूर हो जायगी। ऊपर दिये गये प्रमाणोंसे अब स्पष्ट हो जायगा, कि संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद्, धर्मसूत्र, मनु- याज्ञवल्क्य-स्मृति, महाभारत, भगवद्गीता, योगवासिष्ठ और अंतमें तत्त्वसारायण प्रभृति ग्रंथोंमें जो निष्काम कर्मयोग प्रतिपादित है, उसको श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित न मान केवल संन्यास-मार्गकोही श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित कहना सर्वथा निर्मूल है। इस मृत्युलोकके व्यवहार चलनेके लिये या लोकसंग्रहार्थ यथाधिकार निष्काम कर्म और मोक्षकी प्राप्तिके लिये ज्ञान, इन दोनोंका एककालीन समुच्चयही, अथवा महाराष्ट्र कवि शिवदिन-केसरीके वर्णनानुसार - प्रपंच साधुनि परमार्थाचा लाहो ज्याने केला। तो नर भला भला रे भला भला ॥ * यही अर्थ गीतामें प्रतिपाद्य है। कर्मयोगका यह मार्ग प्राचीन कालसे चला आ रहा है; जनक प्रभृतिने इसी का आचरण किया है; और स्वयं भगवानके द्वारा इसका प्रसार और पुनरुज्जीवन होनेके कारण इसेही भागवत-धर्म कहते है। ये सब बाते अच्छी तरह सिद्ध हो चुकीं। अब लोकसंग्रहकी दृष्टिसे यह देखनाभी आवश्यक है, कि इस मार्गके ज्ञानी पुरुष परमार्थयुक्त अपना प्रपंच - जगतके व्यवहार - किस रीतिसे चलाते हैं? परंतु यह प्रकरण बहुत बढ़ गया है, इसलिये इस विषयका स्पष्टीकरण अगले प्रकरणमें करेंगे।

  • "वही नर भला है, जिसने प्रपंच साध कर ( संसारके सब कर्तव्योंका यथोचित पालन कर ) परमार्थ याने मोक्षकी प्राप्तिभी कर ली हो।"