भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 956 में से

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पृष्ठ 413

बारहवाँ प्रकरण सिद्धावस्था और व्यवहार सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः । कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ॥ * – महाभारत, शांति. २६१. ९ जिस मार्गका यह मत है, कि ब्रह्मज्ञान हो जानेसे जब बुद्धि अत्यंत सम और निष्काम हो जावे, तब शेष मनुष्यको आगे कुछभी कर्तव्य नहीं रह जाता; और इसी- लिये ज्ञानी पुरुषको क्षणभंगुर संसारके दुःखमय और शुष्क व्यवहार विरक्त-बुद्धिसे सर्वथा छोड़ देने चाहिये, उस मार्गके पंडित इस बातको कदापि नहीं जान सकते, कि कर्मयोग अथवा गृहस्थाश्रमके बर्तावकाभी कोई विचार करने योग्य शास्त्र है। संन्यास लेनेभी पहले चित्तकी शुद्धि होकर ज्ञानप्राप्ति हो जानी चाहिये, इसीलिये उन्हें मंजूर है, कि संसार गृहस्थीके काम उस धर्मसेही करने चाहिये, कि जिससे चित्तवृत्ति शुद्ध होवे; अर्थात् वह सात्विक बने। इसीलिये वे समझते हैं, कि संसारमेंही सदैव बने रहना पागलपन है और जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी प्रत्येक मनुष्य संन्यास ले ले – यही इस जगतमें उसका परम कर्तव्य है। ऐसा मान लेनेसे कर्मयोगका स्वतंत्र महत्त्व कुछभी नहीं रह जाता; और इसीलिये संन्यासमार्गके पंडित गृहस्थीके कर्तव्योंके विषयमें कुछ थोड़ा-सा प्रासंगिक विचार करके, गार्हस्थ्य- धर्मके, कर्म-अकर्मके विवेचनका इससे अधिक विचार कभी नहीं करते, कि मनु आदि शास्त्रकारोंके बतलाये हुए चार आश्रमरूपी जीनेसे चढ़कर संन्यास आश्रमकी अंतिम सीढ़ी पर जल्दी पहुँच जाओ। इसीलिये कलियुगके संन्यासमार्गके पुरस्कर्ता श्रीशंकराचार्यने अपने गीता-भाष्यमें गीताके कर्मप्रधान वचनोंकी उपेक्षा की है, अथवा उन्हें केवल प्रशंसात्मक (अर्थवाद-प्रधान) कल्पित किया है; और अंतमें गीताका यह फलितार्थ निकाला है, कि कर्म-संन्यास-धर्म ही गीताधर्ममें प्रतिपाद्य है। और यही कारण है, कि दूसरे कितनेही टीकाकारोंने अपने अपने संप्रदायके अनुसार गीताके इस रहस्यका वर्णन किया है, कि भगवानने रणभूमिपर अर्जुनको निवृत्ति-प्रधान अर्थात् निरी भक्ति, या पातंजलयोग अथवा मोक्ष-मार्गकाही उपदेश किया है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि संन्यास-मार्गका अध्यात्मज्ञान निर्दोष है। और इसके द्वारा प्राप्त होनेवाली साम्य-बुद्धि अथवा निष्काम अवस्थाभी गीताको

  • "हे जाजले ! (कहना चाहियेकी) उसीने धर्मको जाना, कि जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे सबका हित करनेमें लगा हुआ है; और जो सभीका नित्य स्नेही है।"
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