भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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मान्य है। तथापि गीताको संन्यासमार्गका यह कर्म-विरोधी मत ग्राह्य नहीं है, कि मोक्ष- प्राप्तिके लिये अंतमें कर्मोंका सर्वथा छोड़ही बैठना चाहिये । पिछले प्रकरणमें हमने विस्तारसहित गीताका यह विशेष सिद्धान्त दिखलाया है, कि ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाले वैराग्य अथवा समतासेही ज्ञानी पुरुषको ज्ञान-प्राप्ति हो चुकने परभी सारे व्यवहार करते रहना चाहिये । जगतसे ज्ञानयुक्त कर्मको निकाल डालनेसे तो दुनिया अंधी हुई जाती है; और इससे उसका नाश हो जाता है; जब कि भगवानकीही इच्छा है, कि इस रीतिसे उसका नाश न हो, वह भली भाँति चलती रहे; तब ज्ञानी पुरुष- कोभी जगतके सभी कर्म निष्काम बुद्धिसे करते हुए सामान्य लोगोंको अच्छे बर्तावका प्रत्यक्ष नमूना दिखला देना चाहिये । इसी मार्गको अधिक श्रेयस्कर और ग्राह्य कहें, तो यह देखनेकी जरूरत पड़ती है, कि इस प्रकारका ज्ञानी पुरुष जगतके व्यवहार किस प्रकार करता है ? क्योंकि ऐसे ज्ञानी पुरुषका बर्तावही लोगोंके लिये आदर्श है। उसके कर्म करनेकी रीतिको परख लेनेसे धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य अथवा कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय कर देनेवाला साधन या युक्ति - जिसे हम खोज रहे थे - आप-ही-आप हमारे हाथ लग जाती है। संन्यास-मार्गकी अपेक्षा कर्म-योगमार्गकी यही तो विशेषता है। इंद्रियोंका निग्रह करनेसे जिस पुरुषकी व्यवसायात्मक बुद्धि स्थिर हो कर " सब भूतोंमें एक आत्मा " इस साम्यको परख लेनेमें समर्थ हो जाय, उसकी वासनाभी शुद्धही होनी चाहिये । इस प्रकार वासनात्मक बुद्धिके शुद्ध, सम, निर्मम और पवित्र हो जानेसे फिर वह कोईभी पाप या मोक्षके लिये प्रतिबंधक कर्म करही नहीं सकता, क्योंकि पहले वासना है; फिर तदनुकूल कर्म, जब कि क्रम ऐसा है, तब शुद्ध वासनासे होनेवाला कर्म शुद्धही होना चाहिये; और जो शुद्ध है, वही मोक्षके लिये अनुकूल है। अर्थात् हमारे आगे जो 'कर्म-अकर्म-विचिकित्सा' या 'कार्य-अकार्य- व्यवस्थिति'का बिकट प्रश्न था, कि पारलौकिक कल्याणके मार्गमें आड़े न आकर इस संसारमें मनुष्यमात्रको कैसा बर्ताव करना चाहिये, उसका अपनी करनीसे प्रत्यक्ष उत्तर देनेवाला गुरु अब हमें मिल गया ( तै. १. ११.४; गीता ३. २१) । अर्जुनके आगे ऐसा गुरु श्रीकृष्णके रूपमें प्रत्यक्ष खड़ा था और जब अर्जुनको यह शंका हुई कि " क्या, ज्ञानी पुरुष युद्ध आदि कर्मोंको बंधनकारक समझकर छोड़ दे ? " तब उसको इस गुरुने दूर बहा दिया और अध्यात्मशास्त्रके सहारे अर्जुनको भली भाँति समझा दिया, कि किस युक्तिसे जगतके व्यवहार करते रहनेपर पाप नहीं लगता; और उसे युद्धके लिये प्रवृत्त किया । किंतु ऐसा चोखा ज्ञान देनेवाले गुरु प्रत्येक मनुष्यको जब चाहे तब नहीं मिल सकते और तीसरे प्रकरणके अंतमें, " महाजनो येन गतः स पन्थाः " इस वचनका विचार करते हुए हम बतला चुके हैं, कि ऐसे महापुरुषोंके निरे ऊपरी बर्तावपर सर्वथा अवलंबित रहभी नहीं सकते । अतएव जगतको अपने आचरणसे शिक्षा देनेवाले इन ज्ञानी पुरुषोंके बर्तावकी बड़ी बारीकीसे जाँचकर विचार करना चाहिये, कि इनके बर्तावका यथार्थ रहस्य या गी. र. २४