श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मूल तत्त्व क्या है ? इसेही कर्मयोगशास्त्र कहते हैं; और ऊपर जो ज्ञानी पुरुष बतलाये गये हैं, उनकी स्थिति और कृतिही इस शास्त्रका आधार है । इस जगतके सभी पुरुष यदि इस प्रकारके आत्मज्ञानी और कर्मयोगी हों, तो कर्मयोगशास्त्रकी जरूरतही न पड़ेगी । नारायणीय धर्ममें एक स्थानपर कहा है :- एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात्कुरुनन्दन ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतै । भवेत् कृतयुगप्राप्तिः आशीः कर्मविवर्जिता ॥ “ एकांतिक अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधान भागवत धर्मका पूर्णतया आचरण करनेवाले अनेक पुरुषोंका मिलना कठिन है । आत्मज्ञानी, अहिंसक और प्राणिमात्रकी भलाईके लिये कर्म करनेवाले एकान्तधर्मके ज्ञानी पुरुषोंसे यदि यह जगतभर जावे, तो आशी : कर्म – अर्थात् काम्य अथवा स्वार्थ-बुद्धिसे किये हुए सारे कर्म – इस जगतसे दूर होकर फिर कृतयुग प्राप्त हो जावेगा ” ( शां. ३४८. ६२, ६३ ) ! क्योंकि ऐसी स्थितिमें सभी पुरुषोंके ज्ञानवान् रहनेसे कोई किसीका नुकसान तो करेगाही नहीं; प्रत्युत प्रत्येक मनुष्य सबके कल्याणपर ध्यान देकर तदनुसारही शुद्ध अंतःकरण और निष्काम बुद्धिसे अपना बर्ताव करेगा । हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि बहुत पुराने समयमें एक वार समाजकी ऐसीही स्थिति थी; और वह फिर कभी-न-कभी प्राप्त होगीही ( मभा. शां. ५९. १४ ) । परंतु पश्चिमी पंडित अर्वाचीन इतिहासके आधारसे कहते हैं, कि पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं थी, किंतु भविष्यमें मानव जातिके सुधारोंके सहारे कभी- न-कभी ऐसी स्थिति प्राप्त होनेकी संभावना है । जो हो; यहाँ इतिहासका विचार इस समय कर्तव्य नहीं है । हाँ, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि समाजकी इस अत्युत्कृष्ट स्थिति अथवा पूर्णावस्थामें प्रत्येक मनुष्य परम ज्ञानी होगा; और वह जो व्यवहार करेगा, उसीको शुद्ध, पुण्यकारक, धम्र्य अथवा कर्तव्यकी पराकाष्ठा मानना चाहिये, इस मतको दोनोंही मानते हैं । प्रसिद्ध अंग्रेज सृष्टिशास्त्र-ज्ञाता स्पेन्सरने इसी मतका अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथके अंतमें प्रतिपादन किया है, और कहा है, कि प्राचीन कालमें ग्रीस देशके तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने यही सिद्धान्त किया था ! * उदाहरणार्थ, यूनानी तत्त्ववेत्ता प्लेटो अपने ग्रंथमें लिखता है, कि तत्त्वज्ञानी पुरुषको जो कर्म प्रशस्त जँचे, वही शुभकारक और न्याय्य है; साधारण मनुष्योंको ये धर्म विदित नहीं होते, इसलिये उन्हें तत्त्वज्ञ पुरुषकेही निर्णयको प्रमाण मान लेना चाहिये । आरिस्टॉटल नामक दूसरा ग्रीक तत्त्वज्ञ अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें ( ३. ४ ) कहता है, कि ज्ञानी पुरुषका निर्णय सदैव अचूक रहता है, कि वह सच्चे तत्त्वको जाने रहता है; और ज्ञानी
- Spencer's Data of Ethics, Chap. XV, pp. 275-278. स्पेन्सरने इसको Absolute Ethics नाम दिया है ।