श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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सिद्धावस्था और व्यवहार ३७१ पुरुषका यह निर्णय या व्यवहारही औरोंको प्रमाणभूत है। एपिक्यूररस नामके एक और ग्रीक तत्त्वशास्त्रवेत्ताने इस प्रकारके प्रामाणिक परम ज्ञानी पुरुषके वर्णनमें कहा है, कि वह "शांत, सम-बुद्धिवाला और परमेश्वरके समान सदा आनंदमय रहता है; तथा उसको लोगोंसे अथवा उससे लोगोंको जरासाभी कष्ट नहीं होता"।* पाठकोंके ध्यानमें आही जावेगा, कि भगवद्गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ, त्रिगुणातीत अथवा परम भक्त या ब्रह्मभूत पुरुषके वर्णनमें इस वर्णनकी कितनी समता है। "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) - जिससे लोक उद्विग्न नहीं होते अथवा जो लोगोंसे उद्विग्न नहीं होता, ऐसेही जो नित्य संतुष्ट है, जो हर्ष-खेद, भय-विषाद, सुख-दुःख आदि द्वंद्वोंसे मुक्त है, सदा अपने आपमेंही संतुष्ट है ("आत्मन्येवात्मना तुष्टः" गीता २.५५) त्रिगुणोंसे जिसका अंतःकरण चंचल नहीं होता ("गुणैर्यो न विचाल्यते" गीता १४. २३), स्तुति या निंदा और मान या अपमान जिसे एक-से हैं; तथा प्राणिमात्रके अंतर्गत आत्माकी एकताको परखकर (गीता १८. ५४), साम्य-बुद्धिसे आसक्ति छोड़कर, धैर्य और उत्साहसे अपना कर्तव्य-कर्म करनेवाला अथवा सम-लोष्ट-अश्म-कांचन (गीता १४. २४) - इत्यादि प्रकारसे भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञके लक्षण तीन-चार बार विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं और इसी अवस्थाको सिद्धावस्था या ब्राह्मी स्थिति कहा गया है। योगवासिष्ठ आदिके प्रणेता इसी स्थितिको जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं। इस स्थितिका प्राप्त हो जाना अत्यंत दुर्घट है, अतएव जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटका कथन है, कि ग्रीक पंडितोंने इस स्थितिका जो वर्णन किया है, वह किसीएक वास्तविक पुरुषका वर्णन नहीं है; बल्कि शुद्ध नीतिके तत्त्वोंको लोगोंके मनमें भर देनेके लिये समस्त नीतिको मूलभूत शुद्ध वासनाकोही मनुष्य-देह देकर उन्होंने परले सिरेके ज्ञानी और नीतिमान् पुरुषका चित्र अपनी कल्पनासे तैयार किया है। लेकिन हमारे शास्त्रकारोंका सिद्धान्त है, कि यह स्थिति काल्पनिक नहीं, बिलकुल सच्ची है; और मनका निग्रह तथा प्रयत्न करनेसे इसी लोकमें प्राप्त हो जाती है और इस बातका प्रत्यक्ष अनुभवभी हमारे देशवालोंको प्राप्त है। तथापि यह बात साधारण नहीं है। गीतामें (गीता ७. ३) स्पष्टही कहा है, कि हजारों मनुष्योंमें कोई एक-आध मनुष्य इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है; और प्रयत्न करनेवालों इन हजारोंमेंसे किसी विरलेकोही अनेक जन्मोंके अनंतर यह परमावधिकी स्थिति अंतमें प्राप्त होती है।
- Epicurus held the virtuous state to be "a tranquil, un- disturbed, innocuous, non-competitive fruition, which approached most nearly to the perfect happiness of the Gods, who "neither suffered vexation in themselves, nor caused vaxation to others." Spencer's Data of Ethics, p. 278, Bain's Mental and Moral Science, Ed. 1875, p. 530 इसीको Ideal Wise Man कहा है।