भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

३७२ . गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्थितप्रज्ञ अवस्था या जीवनमुक्त अवस्था कितनीही दुष्प्राप्य क्यों न हो, पर जिस पुरुषको यह परमावधिकी सिद्धि एक बार प्राप्त हो गयी, उसे कार्य-अकार्यके अथवा नीतिशास्त्रके नियम बतलानेकी कभी आवश्यकता नहीं रहती – ऊपर इसके जो लक्षण बतला दिये हैं, उन्हींसे आगे यह बात वस्तुतः निष्पन्न हो जाती है। क्योंकि परमावधिकी शुद्ध, सम और पवित्र बुद्धिही नीतिका सर्वस्व है, इस कारण ऐसे स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये नीति-नियमोंका उपयोग करना मानो स्वयंप्रकाश सूर्यके समीप अंधकार होनेकी कल्पना करके उसे मशाल दिखलानेके समान असमंजसमें पड़ना है। किसी एक-आध पुरुषके इस पूर्णावस्थामें पहुँचने या न पहुँचनेके संबंधमें शंका हो सकेगी । परंतु जब एकबार निश्चय हो जाय, कि किसीभी रीतिसे क्यों न हो, कोई पुरुष इस पूर्णावस्थामें पहुँच गया है, तब उसके पापपुण्यके संबंधमें, अध्यात्म- शास्त्रके उल्लिखित सिद्धान्तको छोड़ और कोई कल्पनाही नहीं की जा सकती । कितॆक पश्चिमी राजधर्म-शास्त्रियोंके मतानुसार, जिस प्रकार एक स्वतंत्र पुरुषमें या पुरुषसमूहमें राजसत्ता अधिष्ठित रहती है और राजनियमोंसे प्रजाके बँधे रहनेपरभी, राजा उन नियमोंसे मुक्त रहता है, ठीक उसी प्रकार नीतिके राज्यमें स्थितप्रज्ञ पुरुषोंका अधिकार रहता है। उनके मनमें कोईभी काम्य बुद्धि नहीं रहती, अतः केवल शास्त्रसे प्राप्त कर्तव्योंको छोड़ और किसीभी हेतुसे कर्म करनेके लिये वे प्रवृत्त नहीं हुआ करते; अतएव अत्यंत निर्मल और शुद्ध वासनावाले इन पुरुषोंके व्यव- हारको पाप या पुण्य, नीति या अनीति शब्द कदापि लागू नहीं होते । वे तो पाप और पुण्यसे परे, बहुत दूर, पहुँच जाते हैं। श्रीशंकराचार्यने कहा है :- निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः । “जो पुरुष त्रिगुणातीत हो गये, उनको विधिनिषेधरूपी नियम बाँध नहीं सकते ।” और बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी लिखा है, कि “जिस प्रकार उत्तम हीरेको घिसना नहीं पड़ता, उसी प्रकार जो निर्वाणपदका अधिकारी हो गया, उसके कर्मको विधिनियमोंका अडंगा लगाना नहीं पड़ता” (मिलिंदप्रश्न ४. ५. ७)। कौषीतकी उपनिषद (कौषी. ३. १) में इंद्रने प्रतर्दनसे जो यह कहा है कि आत्मज्ञानी पुरुषोंको “मातृहत्या, पितृ- हत्या अथवा भ्रूणहत्या आदि पापभी नहीं लगते ।” अथवा गीता (गी. १८. १७) में जो यह वर्णन है, कि अहंकार-बुद्धिसे सर्वथा विमुक्त पुरुष यदि लोगोंको मारभी डाले, तोभी वह पाप-पुण्यसे सर्वदा अलिप्तही रहता है, उसका तात्पर्यभी यही है (पंचदशी १४. १६, १७) । ‘धम्मपद’ नामक बौद्ध ग्रंथमें इसी तत्त्वका अनुवाद किया गया है (धम्मपद, श्लोक २९४, २९५) ।* नई बाइबलमें ईसाके शिष्य

  • कौषीतकी उपनिषद्का वाक्य यह है-“यो मां विजानीयान्नास्य केनचित् कर्मणा लोको मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया ।” और धम्मपदका श्लोक इस प्रकार है -