श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 418, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३७३ पौलने जो यह कहा है, कि "मुझे सभी बातें (एकही-सी) धर्म्य हैं (१ कारिं. ६. १२; रोम. ८. २), उसका आशय जानके या इस वाक्यका - कि "जो भगवानके पुत्र (पूर्ण भक्त) हो गये, उनके हाथसे कभी पाप हो नहीं सकता" (जा. १. ३. ९)- आशयभी हमारे मतमें ऐसाही है। जो शुद्ध बुद्धिको प्रधानता न देकर केवल ऊपरी कर्मोमेही नीतिका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उन्हें यह सिद्धान्त अद्भुत-सा मालूम होता है; और "विधिनियमोसे परेका", "मनमाना भलाबुरा करनेवाला", ऐसा अपनेही मनका कुतर्कपूर्ण अर्थ करके कुछ लोग उल्लिखित सिद्धान्तका इस प्रकार विपर्यास करते हैं, कि "स्थितप्रज्ञको सभी बुरे कर्म करनेकी स्वतंत्रता है।" पर अंधे- को खंभा न दीख पड़े, तो जिस प्रकार खंभा दोषी नहीं है, उसी प्रकार पक्षाभिमानके अंधे इन आक्षेप-कर्ताओंको उल्लिखित सिद्धान्तका ठीक ठीक अर्थ अवगत न हो, तो उसका दोषभी इस सिद्धान्तके मत्थे नहीं थोपा जा सकता। इसे गीताभी मानती है, कि किसीकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा पहले पहल उसके बाहरी आचरणसेही करनी पड़ती है और जो इस कसौटीपर चौकस सिद्ध होनेमें अभी कुछ कम हैं, उन अपूर्णावस्थाके लोगोंको उक्त सिद्धान्त लागू करनेकी इच्छा अध्यात्मवादीभी नहीं करते। पर जब किसीकी बुद्धिके पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ और निःसीम निष्काम होनेमें तिलभरभी संदेह न रहे, तब उस पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए सत्पुरुषकी बात निराली हो जाती है। उसका एक-आध काम यदि लौकिक दृष्टिसे विपरीत दीख पड़े तोभी तत्त्वतः यही कहना पड़ता है, कि वह काम दीखनेमें कैसाभी क्यों न हो, उसका बीज निर्दोषही होना चाहिये। अथवा वह शास्त्रकी दृष्टिसे किसी योग्य कारणसे ही हुआ होगा, साधारण मनुष्योंके कामोंके समान उसका लोभमूलक या अनीतिका होना संभव नहीं है; क्योंकि उस सत्पुरुषकी बुद्धिकी पूरी शुद्धता और समता पहलेसेही निश्चित रहती है। बाइबलमे लिखा है, कि मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च खत्तिये । रट्ठं सानुचरं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च सोत्थिये । वेय्यग्घपञ्चमं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ प्रकट है, कि धम्मपदमें यह कल्पना कौषीतकी उपनिषदसे ली गई है। किंतु बौद्ध ग्रंथकार प्रत्यक्ष मातृवध या पितृवध अर्थ न करके 'माता'का तृष्णा और 'पिता'का अभिमान अर्थ करते हैं। लेकिन हमारे मतमें इस श्लोकका नीतितत्त्व बौद्ध ग्रंथ कारोंको भली भाँति ज्ञात नहीं हो पाया, इसीसे उन्होंने यह औपचारिक अर्थ लगाया है। कौषीतकी उपनिषदमें 'मातृवधेन पितृवधेन' इत्यादि मंत्रके पहले इंद्रने कहा है, कि "यद्यपि मैने वृत्त अर्थात् ब्राह्मणका वध किया है, तोभी मुझे उससे पाप नही लगता।" इससे स्पष्ट होता है, कि यहाँपर प्रत्यक्ष वधही विवक्षित है। धम्मपदके अंग्रेजी अनुवादमें (S. B. E. Vol. X. pp. 70, 71) मेक्समूलर साहबने श्लोकोंकी जो टीका की है, हमारे मतमें वहभी ठीक नहीं है।